वर्चस्ववादी विचारधाराएं भी पत्रकारिता पर दबाव बना रही हैं
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इस अतिवाद का ही असर है कि अब प्रेस का नाम लेते ही पाठक, दर्शक, श्रोता बता देता है कि फलां का मतलब राष्ट्रवाद, फलां का मतलब राष्ट्र और भारतीयता विरोध और फलां का मतलब मध्यमार्ग। पत्रकारिता को एक गुमान रहता है कि वह नैरेटिव गढ़ने, लोकतांत्रिक समाज में लोक मानस तैयार करने में बड़ी भूमिका निभाता है। लेकिन यह आंशिक रूप से सत्य है। आज तीव्र गति से सूचनाओं की इतनी बाढ़ आ रही है कि पाठक, दर्शक या स्रोता, किसी एक माध्यम, प्रकाशन या प्रसारण तक सीमित नहीं है। बहुविध सूचनाओं की बाढ़ के बीच वह राय बनाता है और जरूरी नहीं कि वह किसी एक विचारधारा या सोच को बढ़ावा देने वाले प्रकाशन या प्रसारण से प्रभावित रहे। वह अपनी अलग राय बनाता है। इसलिए प्रेस को कम से कम खुद पर गुमान करना छोड़ देना चाहिए।
विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर प्रेस कर्मियों की चर्चा ना करना बेमानी है। वैचारिकता के संघर्ष के बीच सबसे ज्यादा वह पत्रकार पिस रहा है, जो वैचारिकता के आवरण में बंधा नहीं रहना चाहता, वह 'जस की तस धरि दीन्हीं खबरिया' के सिद्धांत पर काम करना चाहता है। वैचारिकता की खोल ओढ़े पत्रकारिता के कालनेमि के बीच सहज पत्रकार ज्यादा जूझ रहा है। राजनीति, प्रशासन और पुलिस तो हर काल से चाहती रही है कि पत्रकार और मीडिया हाउस उसके मनमुताबिक बातें करें। इसमें एक और तबका जुड़ गया है, विचारधारा का। अब वर्चस्ववादी विचारधाराएं भी पत्रकारिता पर दबाव बना रही हैं।
पत्रकारों के रोजगार का सवाल अपने देश में कहीं ज्यादा विकराल रूप से खड़ा हुआ है। पत्रकारिता तो सबको अच्छी चाहिए, प्रकाशन और प्रसारण की कमाई भी होनी चाहिए, लेकिन पत्रकारीय हितों को ठेंगे पर रखा जाए, यह मानसिकता भारत में कहीं ज्यादा गहरी हुई है। लोकतांत्रिक व्यवस्था की ताकतें पत्रकार और पत्रकारिता का अपने लिए बेहतर इस्तेमाल की आकांक्षी तो हैं, लेकिन उनके सामने पत्रकारीय हित के सवालों का कोई महत्व ही नहीं है। विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस के मौके पर पत्रकारों की स्वतंत्रता की बात तो होती है, लेकिन वह रस्मी ज्यादा रह जाती है। बेहतर हो कि जताई गई चिंताओं के आलोक में पत्रकारों की बुनियादी चुनौतियों, मुश्किलों और सवालों से संजीदगी से विचार किया जाए। तभी विश्व प्रेस स्वतंत्रता सही मायने में जमीन पर उतर सकेगी।
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