दुनिया की पहली तस्वीर 1826 या 1827 में फ्रेंच अविष्कारक जोसेफ नाइसफोर नीपेस ने ली थी।
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दुनिया की पहली तस्वीर कहां ली गई थी?
कैमरे से बनी दुनिया की पहली तस्वीर 1826 या 1827 में फ्रेंच अविष्कारक जोसेफ नाइसफोर नीपेस ने ली थी। यह फोटो फ्रांस के बरगंडी क्षेत्र में नीपेस के घर की ऊपरी मंजिल की खिड़कियों से क्लिक की गई थी। खिड़की से लिए गए इस चित्र को शीर्षक दिया गया ‘ले ग्रास की खिड़की से दृश्य’ (View from the Window at Le Grass)। दावा किया जाता है कि ये दुनिया की पहली जीवित तस्वीर है। बात करें दुनिया की पहली रंगीन फोटो की तो ये उपलब्धि गणितीय भौतिक विज्ञानी जेम्स क्लर्क मैक्सवेल (James Clerk Maxwell) के नाम है।
ये सच है कि नाईसफोर के नाम पहली फोटो लेने का श्रेय है। लेकिन एक खराब गुणवत्ता वाली फोटो थी, ऐसा होना स्वाभाविक भी था। इसके एक्सपोजर में भी लगभग आठ घंटे का समय जाया हुआ था। फ्रांसीसी चित्रकार और भौतिक विज्ञानी लुई जैक्स मांडे डागुएरे फोटोग्राफी की प्रेक्टीकल प्रक्रिया का अविष्कारक माने जाते हैं। उन्होंने जो प्रोसेस विकसित की उसमें केवल 20 से 30 मिनिट का समय लगा। इसे डागुएरियोटाईप के नाम से पुकारा गया। ये भी जान लें कि जब नाइसफोर ने पहला फोटो लिया तब इसे प्रक्रिया को फोटोग्राफी के नाम से नहीं जाना जाता था। उन्होंने इस प्रोसेस को हेलियोग्राफी, फोटोजेनिक ड्राइंग, टैलबोटाइप, कैलोटाइप (टैलबोट) के रूप में संदर्भित किया था।
दुनिया की पहली ‘सेल्फी’
बात पहली फोटो क्लिक करने की चल रही है तो ये भी बताते चलें कि दुनिया की सबसे पहली सेल्फी जुलाई 1839 में रॉबर्ट कोर्नोलियस ने ली थी। ये सेल्फी उन्होंने अपने कैमरे के सामने खड़े होकर ली थी। उन्होंने ये सेल्फी फिलोडेल्फिया, पेनसिल्वेनिया, यूएसए में ली थी। रॉबर्ट को ऐसा करने के लिए लगभग 10-15 मिनिट तक तैयारी करनी पड़ी थी। बता दें कुछ और लोगों का दावा है कि दुनिया की पहली सेल्फी 1850 में ली गई थी। यह सेल्फी स्वीडिश आर्ट फोटोग्राफर ऑस्कर गुस्तेव रेंजलेंडर ने ली थी।
अब रॉबर्ट या गुस्तेव ने क्या किया था, पता नहीं। लेकिन हम लोगों को जब सेल्फी लेने का मौका मिला तब हम क्या करते थे, कैसे करते थे। वैसे बता दें सेल्फी तभी ली जाती थी जब ग्रूप फोटो लेना हो और कैमरा क्लिक करने वाला दूसरा मौजूद नहीं हो। पहले कैमरे के सामने खड़े होकर पोज़ीशन तय कर ली जाती थी। फिर ग्रूप में से एक व्यक्ति सामने रखे कैमरे का शटर ऑन कर देता था, उसमें टाइमर होता था, 30 सेकंड्स या एक मिनिट। तय समय के बाद कैमरा क्लिक होता था और फोटो खिंच जाती थी। इतना टीडियस जॉब होता था, सेल्फी लेना उस दौर में।
फोटोग्राफी की बात कर क्यों रहे हैं?
फोटोग्राफी की इतनी बात हो रही है तो ये जानते चलें कि बात की क्यों जा रही है। दरअसल 19 अगस्त को हर साल विश्व फोटोग्राफी डे के रूप में मनाया जाता है। यह दिन उन लोगों के लिए खास मायने रखता है जो किसी खूबसूरत चीज़ या सुंदर दृश्य को अपने कैमरे में कैद करना चाहते हैं। वर्तमान की बात करें तो कैमरे की जगह मोबाइल यूज़ करना पड़ेगा। वैसे खूबसूरत नजारे या सुंदर चीजों से ज्यादा खुद के फोटो (सेल्फी) क्लिक करना, आज के दौर का सबसे पसंदीदा शगल है।
सेल्फी वीरों की बात छोड़ दें तो कह सकते हैं कि ये दिन उन सभी फोटोग्राफर्स को समर्पित किया जाता है जिन्होंने इसे एक कलाकार के रूप में एडॉप्ट किया और दुनिया के कुछ बहुत खूबसूरत दृश्यों को अपने कैमरे में कैद किया है। उन्हें लोगों तक पहुंचाया है। मशीनों ने बेशक फोटोग्राफी का स्वरूप बदल दिया है। लेकिन ये अभी भी कला की दुनिया का ही हिस्सा है। कैमरा क्लिक करना भले ही आसान है लेकिन क्या क्लिक करना है और किस एंगल से कैमरे की आंख से झांककर इसे इमेज में परिवर्तित करना है, इस मामले में हरेक का नज़रिया अलग है। जिसका नज़रिया लोगों को भा जाए वही कलात्मक दृष्टि से बेहतरीन फोटोग्राफ्स माना जाएगा।
फोटोग्राफी कई तरह की होती हैं। लैंडस्केप फोटोग्राफी, वाइल्डलाइफ फोटोग्राफी, पोट्रेट फोटोग्राफी, फूड फोटोग्राफी, वेडिंग फोटोग्राफी और फैशन फोटोग्राफी आदि। बहरहलाल, फोटोग्राफी डे की आधिकारिक शुरूआत 2010 मे हुई थी।
भारत में फोटोग्राफी कब आई थी?
कहा जाता है कि ये देश में फोटोग्राफी की शुरूआत 16वीं शताब्दी में हो चुकी थी। कहा यह भी जाता है कि कैमरा आधिकारिक रूप से 1855 में भारत पहुंचा। ये अलग बात है कि यहां बहुत समय बाद फोटोग्राफी को एक कैरियर या वैकल्पिक कला के रूप चुना गया। 20वीं सदी की शुरूआत में जब प्रमुख भारतीय नगरों में स्टुडियो खोले गए, तो वो इसलिए कि इन दिनों पोट्रेट फोटोग्राफी की व्यावसायिक मांग बहुत बढ़ चुकी थी। रंगीन फोटो की शुरूआत 1970 के दशक की शुरूआत में हुई। रघुवीर सिंह ने कई दृश्यों को अपने कैमरे में कैद करने के लिए रंगीन फिल्म का उपयोग किया। दूरदर्शन पर 25 अप्रेल 1982 को रंगीन प्रसारण प्रारम्भ हुआ।
तब से अब तक दूर का दर्शन पूरी तरह बदल चुका है, फोटोग्राफी में तो अद्भुत क्रांति हुई है।
फोटोग्राफी के बारे भारत के मशहूर फोटोग्राफर रघु राय कहते हैं...
हुनर सिखाया नहीं जाता है, हासिल किया जाता है। मैं आपको कैमरा तो दे सकता हूं, अंदर लेकिन आपके अंदर का विजन (नजर) पैदा नहीं कर सकता।
बेरेनिस अबोट कहते हैं ‘ फोटोग्राफी देखने का हुनर सिखाती है।’
बात तस्वीरों की हो रही है तो जगजीत की गायी, कैफ भोपाली की गज़ल का एक शेर याद आ रहा है...
‘एक कमी थी ताज महल मे, हमने तेरी तस्वीर लगा दी’
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