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विश्व फोटोग्राफी दिवस विशेष: ‘एक कमी थी ताजमहल में, हमने तेरी तस्वीर लगा दी ’

सार

आज की डेट में कोई फॉर्म भरना हो नौकरी के लिए, कहीं दाखिले के लिए या किसी और कारण से। वहां अगर फोटो भेजनी है तो हम क्लिक करेंगे लोड करेंगे और फोटो पहुंच गई मुकाम पर, लेकिन अगर नौजवानों को ये बताया जाए कि पहले पासपोर्ट फोटो मिलना तक आसान नहीं था, तो हो सकता है वो भरोसा ही न करे।
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पहले अगर फॉर्म भरना है और पासपोर्ट फोटो नहीं है तो स्टुडियो जाइए फोटो क्लिक करवाइए। (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Pixabay
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विस्तार
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कल्लू भाई कबाड़ी पढ़े-लिखे भले ही नहीं थे, पर धन-दौलत की कमी नहीं थी। कुछ दोस्त विदेश में भी रहते थे। उनसे बातचीत होती रहती थी। ऐसे ही एक बार कल्लू विदेश में बैठे अपने दोस्त से बात कर रहे थे। दोस्त ने ‘कहा क्या कर रहे हो।’ कल्लू भाई ठहरे नए जमाने वाले, जवाब दिया ‘अभी बताता हूं।’ बात करते-करते मोबाइल से फोटो क्लिक की और भेज दी, कहा ‘ये कर रहा हूं।’ उधर से कहा गया ‘मजा नहीं आया।’ कल्लू बोले ‘अच्छा, रुक दोबारा कॉल करता हूं।’ कल्लू अब वीडियो कॉल पर थे, दोस्त को हाथ हिलाते हुए बोले ‘अब आया मजा।’ उधर से जवाब मिला ‘हां ये हुई न बात, अब आया मजा।’

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पता नहीं किसी विज्ञान लेखक ने अपने किसी उपन्यास या कथानक में इसकी कल्पना कुछ साल पहले की थी या नहीं। कुछ साल से गरज ये कि मोबाइल आने से पहले या फिर कहें मोबाइल पर ‘नेट’ आने से पहले। मोबाइल विहीन दौर में भले ही इसे कपोल कल्पना कह कर खारिज कर दिया जाता, लेकिन आज ये सच्चाई इतनी कॉमन है, कोई रोमांच नहीं जगाती। जिन लोगों ने डिजिटल फोटोग्राफी से पहले का, बहुत पहले का दौर देखा है उन्हें सही मायने में फोटोग्राफी की हैसियत का,  उसकी वैल्यू का एहसास है। इसमें कोई शक नहीं कि फोटोग्राफ्स बहुत कीमती और उपयोगी है, लेकिन हर किसी के हाथ में कैमरे ने इसकी हैसियत जरूर कम कर दी है।

फोटोग्राफी अब और तब!

आज की डेट में कोई फॉर्म भरना हो नौकरी के लिए, कहीं दाखिले के लिए या किसी और कारण से। वहां अगर फोटो भेजनी है तो हम क्लिक करेंगे लोड करेंगे और फोटो पहुंच गई मुकाम पर, लेकिन अगर नौजवानों को ये बताया जाए कि पहले पासपोर्ट फोटो मिलना तक आसान नहीं था, तो हो सकता है वो भरोसा ही न करे, पर पहले अगर फॉर्म भरना है और पासपोर्ट फोटो नहीं है तो स्टुडियो जाइए फोटो खिचाइए। तीन दिन बाद आपको मिलेगी, क्योंकि रोल पूरा होने के बाद ही डार्क रूम में धुलेगा। फिर प्रिंट होगा, डार्क रूम में कपड़े टांगने वाले क्ल्पि के सहारे डोरी में लटकाकर सुखाया जाएगा। एक खास तरह के कटर पर उसे काटा जाएगा, फिर कहीं जाकर आपको पासपोर्ट साइज का फोटो आवेदन में लगाने के लिए नसीब होगा।

खुदा न खास्ता अगर आपको फोटो की तत्काल जरूरत है तो (उसी दौर की बात हो रही है), तो फिर ज्यादा चार्ज देना पड़ेगा। फोटोग्राफर को इसके लिए जो मेहनत करना पड़ती थी उसके लिहाज से ये ज्यादा पैसे मायने नहीं रखते थे।

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फोटोग्राफर पहले फोटो खींचेगा, फिर कैमरे को डार्क रूम में लेकर जाएगा। न के बराबर रौशनी में कैमरे को कॉले कपड़े से ढंक कर रोल बाहर निकालेगा। जहां आपका फोटो है वहां तक रोल कट करेगा। कटी हुई रील बाहर निकालकर बाकी हिस्सा वापस कैमरे पर लोड करेगा। फिर चिमटी के सहारे सिल्वर ब्रोमाईड के साल्युशन में डालकर उसे डेवलप करेगा। अब फोटोग्राफ सूखेगा। तब आपके हाथ में पासपोर्ट फोटो आ पाएगा।

फोटोग्राफी है क्या? काम कैसे करती है?

 

शाब्दिक अर्थ की बात करें तो कहेंगे ‘लाइट के साथ चित्र निर्माण’। फोटोग्राफी दो ग्रीक शब्दों से मिलकर बना है। फॉस (जेनेटिव फोटोस) जिसका मतलब है ‘प्रकाश’ और ग्राफे जिसका अर्थ है ‘ड्रॉइग या लेखन।’ कहा जाता है कि ब्रिटिश वैज्ञानिक सर जॉन हर्शेल द्वारा इस शब्द का इस्तेमाल पहली बार 1839 में किया गया था।


लैंस कैमरे का वह पार्ट होता है, जो असल में इमेज कैप्चर करता है। सामान्य शब्दों में समझना चाहें तो कह सकते हैं कि कैमरा लैंस पहले प्रकाश इकट्ठा करता है फिर इसे लाइट डिटेक्ट करने वाली सतह, फिल्म या डिजिटल सेंसर पर प्रोजेक्ट करता है। फिर प्रोसेसिंग के भिन्न तरीकों से कैमरामेन या फोटोग्राफर को एक फाइनल इमेज मिलती है।

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दुनिया की पहली तस्वीर 1826 या 1827 में फ्रेंच अविष्कारक जोसेफ नाइसफोर नीपेस ने ली थी। - फोटो : Pixabay

दुनिया की पहली तस्वीर कहां ली गई थी?

कैमरे से बनी दुनिया की पहली तस्वीर 1826 या 1827 में फ्रेंच अविष्कारक जोसेफ नाइसफोर नीपेस ने ली थी। यह फोटो फ्रांस के बरगंडी क्षेत्र में नीपेस के घर की ऊपरी मंजिल की खिड़कियों से क्लिक की गई थी। खिड़की से लिए गए इस चित्र को शीर्षक दिया गया ‘ले ग्रास की खिड़की से दृश्य’ (View from the Window at Le Grass)। दावा किया जाता है कि ये दुनिया की पहली जीवित तस्वीर है। बात करें दुनिया की पहली रंगीन फोटो की तो ये उपलब्धि गणितीय भौतिक विज्ञानी जेम्स क्लर्क मैक्सवेल (James Clerk Maxwell) के नाम है।

ये सच है कि नाईसफोर के नाम पहली फोटो लेने का श्रेय है। लेकिन एक खराब गुणवत्ता वाली फोटो थी, ऐसा होना स्वाभाविक भी था। इसके एक्सपोजर में भी लगभग आठ घंटे का समय जाया हुआ था। फ्रांसीसी चित्रकार और भौतिक विज्ञानी लुई जैक्स मांडे डागुएरे फोटोग्राफी की प्रेक्टीकल प्रक्रिया का अविष्कारक माने जाते हैं। उन्होंने जो प्रोसेस विकसित की उसमें केवल 20 से 30 मिनिट का समय लगा। इसे डागुएरियोटाईप के नाम से पुकारा गया। ये भी जान लें कि जब नाइसफोर ने पहला फोटो लिया तब इसे प्रक्रिया को फोटोग्राफी के नाम से नहीं जाना जाता था। उन्होंने इस प्रोसेस को हेलियोग्राफी, फोटोजेनिक ड्राइंग, टैलबोटाइप, कैलोटाइप (टैलबोट) के रूप में संदर्भित किया था।


दुनिया की पहली ‘सेल्फी’

बात पहली फोटो क्लिक करने की चल रही है तो ये भी बताते चलें कि दुनिया की सबसे पहली सेल्फी जुलाई 1839 में रॉबर्ट कोर्नोलियस ने ली थी। ये सेल्फी उन्होंने अपने कैमरे के सामने खड़े होकर ली थी। उन्होंने ये सेल्फी फिलोडेल्फिया, पेनसिल्वेनिया, यूएसए में ली थी। रॉबर्ट को ऐसा करने के लिए लगभग 10-15 मिनिट तक तैयारी करनी पड़ी थी। बता दें कुछ और लोगों का दावा है कि दुनिया की पहली सेल्फी 1850 में ली गई थी। यह सेल्फी स्वीडिश आर्ट फोटोग्राफर ऑस्कर गुस्तेव रेंजलेंडर ने ली थी।

अब रॉबर्ट या गुस्तेव ने क्या किया था, पता नहीं। लेकिन हम लोगों को जब सेल्फी लेने का मौका मिला तब हम क्या करते थे,  कैसे करते थे। वैसे बता दें सेल्फी तभी ली जाती थी जब ग्रूप फोटो लेना हो और कैमरा क्लिक करने वाला दूसरा मौजूद नहीं हो। पहले कैमरे के सामने खड़े होकर पोज़ीशन तय कर ली जाती थी। फिर ग्रूप में से एक व्यक्ति सामने रखे कैमरे का शटर ऑन कर देता था,  उसमें टाइमर होता था, 30 सेकंड्स या एक मिनिट।  तय समय के बाद कैमरा क्लिक होता था और फोटो खिंच जाती थी। इतना टीडियस जॉब होता था, सेल्फी लेना उस दौर में।

फोटोग्राफी की बात कर क्यों रहे हैं?

फोटोग्राफी की इतनी बात हो रही है तो ये जानते चलें कि बात की क्यों जा रही है। दरअसल 19 अगस्त को हर साल विश्व फोटोग्राफी डे के रूप में मनाया जाता है। यह दिन उन लोगों के लिए खास मायने रखता है जो किसी खूबसूरत चीज़ या सुंदर दृश्य को अपने कैमरे में कैद करना चाहते हैं। वर्तमान की बात करें तो कैमरे की जगह मोबाइल यूज़ करना पड़ेगा। वैसे खूबसूरत नजारे या सुंदर चीजों से ज्यादा खुद के फोटो (सेल्फी) क्लिक करना, आज के दौर का सबसे पसंदीदा शगल है।

सेल्फी वीरों की बात छोड़ दें तो कह सकते हैं कि ये दिन उन सभी फोटोग्राफर्स को समर्पित किया जाता है जिन्होंने इसे एक कलाकार के रूप में एडॉप्ट किया और दुनिया के कुछ बहुत खूबसूरत दृश्यों को अपने कैमरे में कैद किया है। उन्हें लोगों तक पहुंचाया है। मशीनों ने बेशक फोटोग्राफी का स्वरूप बदल दिया है। लेकिन ये अभी भी कला की दुनिया का ही हिस्सा है। कैमरा क्लिक करना भले ही आसान है लेकिन क्या क्लिक करना है और किस एंगल से कैमरे की आंख से झांककर इसे इमेज में परिवर्तित करना है, इस मामले में हरेक का नज़रिया अलग है। जिसका नज़रिया लोगों को भा जाए वही कलात्मक दृष्टि से बेहतरीन फोटोग्राफ्स माना जाएगा।

फोटोग्राफी कई तरह की होती हैं। लैंडस्केप फोटोग्राफी, वाइल्डलाइफ फोटोग्राफी, पोट्रेट फोटोग्राफी, फूड फोटोग्राफी, वेडिंग फोटोग्राफी और फैशन फोटोग्राफी आदि। बहरहलाल, फोटोग्राफी डे की आधिकारिक शुरूआत 2010 मे हुई थी।

भारत में फोटोग्राफी कब आई थी?

कहा जाता है कि ये देश में फोटोग्राफी की शुरूआत 16वीं शताब्दी में हो चुकी थी। कहा यह भी जाता है कि कैमरा आधिकारिक रूप से 1855 में भारत पहुंचा। ये अलग बात है कि यहां बहुत समय बाद फोटोग्राफी को एक कैरियर या वैकल्पिक कला के रूप चुना गया। 20वीं सदी की शुरूआत में जब प्रमुख भारतीय नगरों में स्टुडियो खोले गए, तो वो इसलिए कि इन दिनों पोट्रेट फोटोग्राफी की व्यावसायिक मांग बहुत बढ़ चुकी थी। रंगीन फोटो की शुरूआत 1970 के दशक की शुरूआत में हुई। रघुवीर सिंह ने कई दृश्यों को अपने कैमरे में कैद करने के लिए रंगीन फिल्म का उपयोग किया। दूरदर्शन पर 25 अप्रेल 1982 को रंगीन प्रसारण प्रारम्भ हुआ।  

तब से अब तक दूर का दर्शन पूरी तरह बदल चुका है, फोटोग्राफी में तो अद्भुत क्रांति हुई है।

फोटोग्राफी के बारे भारत के मशहूर फोटोग्राफर रघु राय कहते हैं...
 
हुनर सिखाया नहीं जाता है, हासिल किया जाता है। मैं आपको कैमरा तो दे सकता हूं, अंदर लेकिन आपके अंदर का विजन (नजर) पैदा नहीं कर सकता।

बेरेनिस अबोट कहते हैं ‘ फोटोग्राफी देखने का हुनर सिखाती है।’

बात तस्वीरों की हो रही है तो जगजीत की गायी, कैफ भोपाली की गज़ल का एक शेर याद आ रहा है...
 
‘एक कमी थी ताज महल मे,  हमने तेरी तस्वीर लगा दी’

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw।co।in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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