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विश्व साहित्य का आकाश: देखा जाए कैसे गुजरी है, अब तलक

सार

सीमा कपूर की आत्मकथा, ‘यूं गुजरी है अब तलक’। ये किताब जितनी सीमा-ओम पुरी को खोलती है, उससे अधिक इतिहास दिखाती है। 
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किताबों की दुनिया - फोटो : Freepik.com
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विस्तार
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मेरे एक मित्र, वैसे तो इतिहास के अध्येता हैं, लेकिन साहित्य में भी रुचि रखते हैं, साहित्य-इतिहास को मिला कर अध्ययन करते हैं, उनसे मुझे एक किताब उपहार स्वरूप प्राप्त हुई। मिलते मैंने उसे पढ़ना शुरू किया और पढ़ती चली गई। पढ़ते हुए सोचती जाती, एक व्यक्ति में कैसे इतनी जिजीविषा हो सकती है? जीवन के विभिन्न थपेडों, उतार-चढ़ाव के बावजूद उसकी सकारात्मकता बची रह सकती है, यह किसी वरदान से कम नहीं है।

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इस सकारात्मकता के बचे रहने के कई कारण हैं। पालन-पोषण, आसपास के लोगों का जीवट, उनका प्रेम, कुछ अपनी खुद की प्रकृति-आस्था, कुछ मधुर-कटु अनुभव और बहुत सारा ओशो यानि आचार्य रजनीश का प्रभाव (जिनका प्रवेश जीवन में काफी समय बाद होता है)। नकारात्मकता के सामने दृढ़ता से खड़े रहना आसान काम नहीं हैं।

मुझे कथेतर गद्य पढ़ना अच्छा लगता है, उसमें भी खासकर आत्मकथा। अब तक हिन्दी की कई आत्मकथाएं पढ़ी हैं। इंग्लिश के माध्यम से कई अहिन्दी भाषी और विश्व के कई लोगों की आत्मकथाएं पढ़ने का, कुछ पर लिखने का अवसर मिला है। जिस किताब की ऊपर चर्चा की है, वह भी करीब 400 पन्नों में समाई हुई डेढ़ सौ से ऊपर छोटे-छोटे खंडों में बंटी (भूमिका, उपसंहार, पुनश्च: अतिरिक्त) आत्मकथा है।
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‘यूं गुजरी है अब तलक’

मैं बात कर रही हूं, सीमा कपूर की आत्मकथा, ‘यूं गुजरी है अब तलक’ की। वे मेरी फेसबुक मित्र सूचि में हैं, मगर मैं उन्हें इस किताब को पढ़ने के पहले नहीं जानती थी। वे मुझे जानती होंगी, मुझे शक है। किताब से पता चला, सीमा कपूर वरिष्ठ रंगकर्मी रंजीत कपूर और लोकप्रिय अभिनेता अन्नू कपूर की छोटी बहन हैं।

वे एक कुशल पपेटीयर रहीं हैं। उन्होंने नाटक में भूमिकाएं की हैं। स्क्रीनप्ले लिखे और दूरदर्शन, टी वी सीरियल का निर्देशन किया है। डॉक्यूमेंट्री बनाई है। साथ ही वे अभिनेता ओम पुरी की पहली पत्नी हैं। सीमा अंत तक ओम पुरी का भावनात्मक सहारा बनी रहीं, जबकि दोनों की शादी कुछ ही दिन चली थी।

जब भी उन्हें तकलीफ होती, वे सीमा के पास आते। ओम कैमरे के सामने एवं मंच पर मात्र किरदार होते हैं, मगर कैमरे के सामने से हटते और मंच से उतरने के बाद एक भिन्न व्यक्ति होते थे। इतने सफल अभिनेता अपना निजी जीवन भी सफलता से संभाल सकते तो कितना अच्छा होता। काश! ऐसा होता।

आत्मकथा में अगर पाठक केवल ओम पुरी की पत्नी देखना चाहेंगे, तो यह पाठक की एकांगी दृष्टि होगी। क्योंकि ‘यूं गुजरी है अब तलक’ जितनी सीमा-ओम पुरी को खोलती है, उससे अधिक इतिहास दिखाती है। हमारे यहां इतिहास के दस्तावेजीकरण की परम्परा नहीं रही है। कुछ ही नाम यहां दर्ज होते हैं इसीलिए जब भी पारसी थियेटर की बात चलती है, तो बस पृथ्वीराज कपोर के थियेटर पर बात समाप्त हो जाती है।

इस आत्मकथा में एक और पारसी थियेटर विस्तार से चित्रित है, संयोग से वह भी कपूर थियेटर है। मगर यह पृथ्वीराज कपूर का न होकर, मदनलाल कपूर का है, मदनलाल कपूर रंजीत, अन्नु, सीमा और उनके छोटे भाई नोनी के पिता थे। सीमा की मां कमल चटर्जी कवयित्री/गायिका और मुशायरों की शान थीं।

इस किताब में बॉलीवुड के कुछ व्यक्तियों की झलक भी मिलती है। जहां अच्छे कम, बुरे लोग अधिक हैं। ओम पुरी के शव के पास तमाम लोगों को देख सीमा सोचती हैं, ये लोग तब कहां थे जब ओम को इनकी जरूरत थी। इस कठिन समय में शबाना आजमी का फोन एक बहुत बड़ी राहत है सीमा के लिए एवं पाठक केलिए भी। शबाना ही सीमा को अपनी कार में श्मशान लाती-लेजाती हैं।

इस आत्मकथा में मदनलाल कपूर के पारसी थियेटर की दुनिया का आंतरिक परिदृश्य है, साथ ही समाज का मनोरंजन करने वालों (उस समय मनोरंजन के साधन नाममात्र को थे) का थियेटर कंपनी के लोगों के प्रति नजरिया है। गरीबी में सिर उठा कर जीने वालों की दास्तान है, दाम्पत्य प्रेम है। छोटे-छोटे पारिवारिक सुख-दु:ख हैं।

कंपनी के मालिक का अपने यहां काम करने वालों के प्रति संरक्षणात्मक दायित्व है, जिसका पालन वह करता है। यह वृहतर कपूर परिवार की कहानी है, जिसमें न केवल परिवार के सदस्यों बल्कि कम्पनी के लोगों और-तो-और तमाम पशु-पक्षियों की समाई है। निवाले में सबका हिस्सा शामिल है।

स्त्री का एक गुण है क्षमा करना जिसका अक्सर बेजा फायदा भी उठाया जाता है। कभी जान कर इसका लाभ लिया जाता है, कभी हक से और कभी पश्चाताप करके। सीमा कपूर मे यह गुण नजर आता है, इसीलिए वे बार-बार ओम पुरी को माफ करती हैं। उन्हें मालूम है ओम को भावनात्मक सहारा चाहिए। वे ओम पुरी को प्यार करती हैं, उम्र में बड़े होने एवं उत्तम अभिनेता होने के कारण उनका सम्मान करती हैं।

एक और कारण है सीमा किसी का दिल नहीं दुखाना चाहती हैं। इसी कारण ओम पुरी को माफ करती हैं, और अपना दु:ख भीतर-भीतर पीती हैं, ताकि मां, भाइयों तथा आसपास के लोगों को कष्ट न हो।

मां-बेटे का काल्पनिक पत्र किताब का सर्वादिक मार्मिक हिस्सा है। इसमें प्रकाशित हस्तलिपि में पत्र, कानूनी कागजात इस आत्मकथा को ऑथेंटिक बनाते हैं। इसमें दिए ढ़ेर सारे फोटोग्राफ इसे खूबसूरती प्रदान करते हैं। वे उनके जीवन के कई पलों के साक्षी हैं। पाठक को ओम पुरी-सीमा कपूर के खुशहाल चित्रों को देख कर अच्छा लगता है।

पति-पत्नी का रिश्ता बहुत नाजुक, जटिल होता है। इसे लिख कर समझाना कठिन है। राजकमल समूह प्रकाशन से आई आत्मकथा में इसे देखा जा सकता है। करीब एक दशक से ऊपर संबंध के बाद दोनों की शादी हुई, रिश्ता मात्र दो-ढ़ाई साल चला। लेकिन बाद में करीब 25 साल ओम पुरी और सीमा कपूर का नाता रहा। कहते हैं आदमी के मुंह खोलते उसके खानदान का पता चलता है।

इस किताब के कथ्य की विशेषता है तमाम परेशानियों, कठिनाइयों के बीच रहते हुए सीमा कपूर कहीं कटु नहीं होती हैं। दूसरी स्त्री को अपशब्द नहीं कहती हैं। उन्हें विरासत में सभ्यता-संस्कृति मिली है। भाषा का संस्कार मिला है।

आत्मकथा ‘यूं गुजरी है अब तलक’ स्त्री-पुरुष की प्रकृति को समझने में मददगार है। इसमें सीमा कपूर का बचपन है, युवावस्था है, प्रौढ़ता है, खट्टे-मीठे अनुभव हैं। वे अपनी कमजोरियों का बार-बार जिक्र करती हैं। सरल-सहज भाषा में कही गई रोचक आत्मकथा को हाथ में लेने पर पूरा किए बिना छोड़ना कठिन है।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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