आदिवासियों को पशुपालन से अलग किया गया
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उन्होंने विकास के संदर्भ में बात करते हुए बताया की चक्रीय विकास का मतलब विकास का चक्र है। पश्चिमी सोच के अनुसार विकास रैखिक होता है यानी एक रेखा पर लगातार बढ़ता है लेकिन यह विकास कभी भी सस्टेनेबल नहीं होता है। इसमें कहीं न कहीं ब्रेक लग जाता है और विकास अवरुद्ध हो जाता है।
चक्रीय विकास से विकास की निरंतरता बनी रहती है। परशुराम मिश्रा ने अपने जीवन में कई प्रकार के प्रयोग किए। रांची के पास ओरमांझी में उन्होंने स्थानीय ग्रामीणों को एकत्रित कर लगभग 400 एकड़ में निजी जंगल का निर्माण करवाया। जंगल के माध्यम से उन्होंने हजार से अधिक ग्रामीणों को लाह की खेती का प्रशिक्षण दिया।
आज ग्रामीण लाह की खेती करके बहुत ही बढ़िया पैसा कमा रहे हैं। जहां मिश्रा ने काम प्रारंभ किया था आज वह स्थान बेहद विकसित हो चुका है। उस इलाके में लाह की खेती करने वाले किसान जो कल तक किसी दूसरे के खेत में जाकर या रांची में जाकर मजदूरी करते थे उनके बच्चे बहुत ही बढ़िया स्कूल और कॉलेज में पढ़ रहे हैं।
परशुराम मिश्रा ने जिस जिस को लाह की खेती का ट्रेनिंग दिया वह सारे के सारे कृषक आज दूसरे को ट्रेनिंग दे रहे हैं। सब के पक्के मकान हैं। सब के पास अपनी चार चक्के की गाड़ी है। यहां सकारात्मक परिवर्तन साफ दिखता है। इस प्रकार का परिवर्तन बड़े पैमाने पर किया जा सकता है। दरअसल, परशुराम मिश्रा मिट्टी जांच पदाधिकारी रहे।
चंडीगढ़ में मिट्टी जांच इंस्टिट्यूट में निदेशक थे। उनके जिम्मे शिवालिग पहाड़ से मिट्टियों के कटाव और सुखना लेक में निक्षेप के जमाव से छुटकारा दिलाने का काम लगाया गया था। उसी क्रम में उन्होंने सुखो माजरी नामक गांव को विकसित किया था।
वहां उन्होंने सतत विकास यानी सस्टेनेबल डेवलपमेंट के कई प्रयोग किए। हालांकि बाद में चलकर स्थानीय लोगों और प्रशासन की उपेक्षा के कारण मिश्रा का प्रयोग अब निष्प्रभावी हो गया है लेकिन लंबे समय तक वह प्रयोग एक मॉडल के रूप में काम करता रहा है। बाद में मिश्रा ने इसी प्रकार के ग्राम विकास के छोटे-छोटे कई प्रयोग झारखंड में किए। वह प्रयोग फलीभूत हो रहा है।
आदिवासी चिंतन की अवधारणा है दुनिया भर के लिए खुशी की कामना करना
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इस विषय को लेकर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य परिषद के सदस्य उमेश नजीर उक्त दोनों प्रयोग और उसे स्थापित करने वाले दोनों व्यक्तियों के चिंतन से तो सहमत हैं लेकिन बेहद गंभीरता के साथ कहते हैं कि सतत विकास की अवधारणा सचमुच भारतीय अवधारणा है।
उनका यह भी कहना है कि चाहे इस विकास की अवधारणा को लेकर जिन लोगों ने काम किया है या तो वह अशोक भगत हो या परशुराम मिश्रा हो या कोई अन्य हो उस काम की स्वीकार्यता समाज में भी है और हम लोग भी इस बात को लेकर सहमत हैं कि अगर सचमुच में भारत जैसे देश का विकास करना है तो उसका रास्ता यही होना चाहिए लेकिन औपनिवेशिक शोषण जो साम्राज्यवादी सोच का हिस्सा है उसके शोषण में इस देश में सतत् विकास की अवधारणा को कभी परिपक्व होने ही नहीं दिया गया।
नजीर बताते हैं इस अवधारणा को परिपक्वता तक पहुंचाने की जरूरत है और राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में स्थापित करने की आवश्यकता है। नजीर एक नई अवधारणा प्रस्तुत करते हैं।
नजीर कहते हैं कि जिस प्रकार भारत की आजादी के समय सभी चिंतन, सभी पार्टी, संगठन के लोगों ने मिलकर के इस देश को आजाद कराया, उसी प्रकार आज हम ऐसे चौराहे पर आकर खड़े हो गए हैं जहां हम सब को मिलकर विकास की नई और देसी अवधारणा विकसित करनी पड़ेगी।
दुनिया भर में कई प्रयोग हुए हैं। साम्यवादी प्रयोग हुए, पूंजीवादी प्रयोग हुए, साम्राज्यवादी प्रयोग हुए। साम्राज्य का निर्माण हुआ लेकिन विकास की जो अवधारणा होनी चाहिए वह कहीं नहीं दिखता है।सतत विकास पर दुनिया में कहीं काम नहीं हो पाया। इसलिए सच में यदि हमको विकास करना है और मानवीय सभ्यता को बचाना है तो हमें अपने विकास की अवधारणा को बदलना पड़ेगा।
उन्होंने बताया कि भारतीय आधुनिक शिक्षा पद्धति व्यक्ति को नौकर बनाती है। शिक्षा पद्धति जिस माध्यम से जिस चिंतन के लोगों के द्वारा भारत आई है उनके यहां कृषि पशुपालन और हस्तशिल्प जैसी परंपरा खत्म कर दिया। अंग्रेज विकास के उस रथ पर चढ़कर के आए जो शोषण और पराधीनता का द्योतक था।
आज भी हमने उसमें कोई संशोधन नहीं किया। लकीर के फकीर बने रहे। सारी व्यवस्थाएं अंग्रेजों के द्वारा खड़ी की गई है। यह व्यवस्था हमें मुकम्मल इंसान नहीं एक सामाजिक प्राणी बना देता है। यूरोप में प्रकृति पर कब्जा करने और ज्यादा से ज्यादा सुख-सुविधाओं को एकत्रित करने का चिंतन विकसित हुआ जो हमारे भारतीय चिंतन से मेल नहीं खाता है इसलिए यदि साम्राज्यवादी शोषण से मुक्ति प्राप्त करना है तो देसी पद्धति विकसित करनी ही पड़ेगी।
इस विषय पर कई जगह कई ढंग से काम हो रहे हैं। हिंदू चिंतन को मानने वाले अब इस बात को लेकर एकमत हो रहे हैं की विविधता से ही भारत का विकास संभव है। इस बात को लेकर आदिवासी जनजातीय समाज में भी जबरदस्त तरीके से लोग सोचने लगे है।
आदिवासी चिंतन यह कहता है की प्रकृति जिसमें वृक्ष, नदी, तालाब, सूर्य, चंद्रमा, यह जो प्रकृति के प्रत्यक्ष रूप है, जिसके द्वारा हमें भोजन मिलता है, संरक्षण मिलता है, यही हमारा भगवान और इस पर अगर किसी प्रकार का कोई आक्रमण होता है तो हमारी जीवन पद्धति पर, हमारे जीवन जीने की शैली पर आक्रमण होता है।
आदिवासी चिंतन की सबसे पहली अवधारणा है कम खर्च में अधिक से अधिक खुश रहना। दूसरी अवधारणा है प्रकृति के (चर-अचर) के साथ एकात्म भाव विकसित करना। तीसरी अवधारणा, अगली पीढ़ी को बेहतर पृथ्वी प्रदान करना और चौथी अवधारणा है दुनिया भर के लिए खुशी की कामना करना।
यदि सचमुच प्रकृति को और पर्यावरण को बचाना है तो हमें देसी एवं भारतीय चिंतन को आत्मसात करना पड़ेगा। आधुनिकता जरूरी है विज्ञान भी जरूरी है लेकिन प्रकृति पर कब्जा करने का विज्ञान मानवीय सभ्यता को विनाश की ओर ले जाएगा इसलिए कोरोना महामारी ने हमें सतर्क होने के लिए कहा है नहीं सतर्क हुए तो विनाश अवश्यंभावी है।
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