विश्व सामाजिक न्याय दिवस 2022
- फोटो : Rohit Srivastava
कोरोना काल में जरूरतमंदों के लिए वरदान बनीं अर्चना
एक तरफ जब कोरोना काल में लोग अपने जीवन के लिए संघर्ष कर रहे थे, चारों तरफ अफरातफरी और संशय का माहौल था। ऐसे दौर में अर्चना का अपने लोगों के प्रति लगाव और समर्पण उन्हें समाज के लिए एक आदर्श बना गया। जब अर्चना ने अपने गांव के लोगों को महामारी से जूझते और मास्क खरीदने पर पैसे खर्च करने में असमर्थ देखा, तो उसने कुछ करने की ठानी। अपनी नियमित ऑनलाइन स्कूल कक्षाएं समाप्त करने के बाद मास्क सिलना शुरू कर दिया।
उन्होंने घर पर सिलाई सीखी थी। अपनी सिलाई पर ही कपड़े का प्रबंध करके सिलाई शुरू कर दी। 100 से अधिक मास्क खुद ही सिल दिए और घर-घर बांटना शुरू कर दिया। लेकिन जो बात इस कहानी को और खास बनाती है, वह यह है कि जल्द ही, उसके जैसे कई अन्य बच्चे उसके जुनून को देखकर प्रेरित हुए।
अर्चना की प्रेरणा से, यह उन बच्चों में करुणा भाव का जागृत होना ही था कि बाल पंचायत के सदस्यों के एक समूह द्वारा पिपलाई में 3000 से अधिक मास्क सिले गए और जरूरतमंदों को दिये गए। यह अर्चना की करुणा भावना ही थी कि उसने महसूस किया कि वह उन लोगों के लिए कुछ कर सकती है जो पीड़ित थे और कठिन समय में जिन्हें उसकी जरूरत थी। उसने लोगों को नियमित भोजन पाने के लिए संघर्ष करते देखा और वह जानती थी कि उनके लिए मास्क खरीदना संभव नहीं होगा।
कभी बाल श्रमिक थे राजेश, अब शिक्षा से रोशन है भविष्य
कभी चिलचिलाती गर्मी में 8 वर्ष की उम्र में भट्ठा मजदूरी करने को मजबूर रहे राजेश कुमार जाटव, आज दिल्ली विश्वविद्यालय से फ़िज़िकल साइन्स और इलेक्ट्रॉनिक्स में स्नातक कर रहे हैं। हाईस्कूल में अच्छे प्रदर्शन के लिए वह राजस्थान के मुख्यमंत्री से सम्मानित भी हो चुके हैं। राजेश को 'बचपन बचाओ आंदोलन' द्वारा मुक्त कराया गया। जिसके बाद उन्हें दीर्घकालीन पुनर्वास केंद्र बाल आश्रम भेज दिया गया।
वहीं से राजेश ने अपनी पढ़ाई पूरी की। राजेश के परिवार में सात सदस्य हैं। राजेश के साथ उसके परिवार के सभी लोग आजीविका के लिए एक ईंट भट्ठा पर काम करने के लिए विवश थे। भाई-बहनों में सबसे बड़े, राजेश को अक्सर मालिकों द्वारा शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जाता था और ज्यादा देर तक काम करने के लिए मजबूर किया जाता था। इस दौरान राजेश का शारीरिक और मानसिक शोषण किया गया।
विश्व सामाजिक न्याय दिवस 2022
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बाल विवाह को मिटाने का संकल्प लिए आगे बढ़ती कविता
कविता का जब 14 वर्ष की उम्र में बाल विवाह होने जा रहा था तो उसने अपने माँ बाप से पूछा “मैं तो अभी बच्ची हूँ”.....लेकिन उनका जवाब था “बच्ची नहीं हो तुम, बड़ी हो गई हो और लड़की हो ...तो पढ़ लिखके क्या करोगी”? कविता की तमाम कोशिशों के बाद भी उसका बाल विवाह हो गया, लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी थी। अभी भी उसके अंदर शिक्षा पाने की ललक बची हुई थी। वो मानती थी बेशक पारिवारिक दबाव में उसका बाल विवाह हो गया हो लेकिन हर सूरत में वो स्कूल जाएगी।
उसने ससुराल जाने से मना कर दिया था और माँ-बाप के घर से ही रोजाना 14 किलोमीटर साईकिल चला कर स्कूल जाती थी। वास्तव में उसके इस कदम ने उन सामाजिक कुरीतियों की बेड़ियों को तोड़ने का काम किया था जिसने वर्षों से हमारी देश की बच्चियों को अभी भी कैद किए रखा है। कविता कहती हैं कि शुरू में तो मुझे डर लगता था। लेकिन आज मुझे पता है कि मुझे क्या करना है।
मैं वकील बनना चाहती हूं और जो सही है उसके लिए खड़ी होना चाहती हूं। एक वकील के रूप में मैं यह सुनिश्चित करना चाहती हूं कि सभी बच्चों के अधिकारों की रक्षा की जाए और बाल विवाह की प्रथा को हमेशा के लिए मिटा दिया जाए।
यह महज प्रेरणादायक कहानियाँ नहीं हैं। असल में यह बच्चे एक ऐसे सामाजिक परिवर्तन की आधारशिला को मजबूती के साथ रख रहे हैं जो आगे चल कर सामाजिक ढांचे में क्रांतिकारी परिवर्तन का आधार बनेगी। भविष्य में सभी बच्चों को न्याय सुनिश्चित हो पाएगा और आने वाली पीढ़ियों में इसका असर नजर आएगा।
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