राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले दोगुने से भी अधिक हुए हैं। पिछले दशक के आंकड़ों के मुताबिक भारत में हर घंटे महिलाओं के खिलाफ अपराध के 26 मामले दर्ज होते है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार महिलाओं के प्रति की जाने वाली क्रूरता में वृद्धि हुई है।
स्वतंत्रता प्राप्ति के 73 वर्ष बाद भी भारत में 70 प्रतिशत महिलाएं अकुशल कार्यों में लगी हैं जिस कारण उनको काम के बदले मजदूरी भी कम मिलती है। पुरुषों की तुलना में महिलाएं औसतन हर दिन छह घंटे ज्यादा काम करती हैं। चूल्हा-चौका, खाना बनाना, सफाई करना, बच्चों का पालन पोषण करना तो महिलाओं के कुछ ऐसे कार्य हैं जिनकी कहीं गणना ही नहीं होती है। दुनिया में काम के घंटों में 60 फीसदी से भी अधिक का योगदान महिलाएं करती हैं जबकि उनका संपत्ति पर मात्र पांच फीसदी ही मालिकाना हक हैं।
कहने को तो सम्पूर्ण विश्व की महिलाएं एकजुट होकर महिला दिवस को मनाती हैं। मगर हकीकत में यह सब बातें सरकारी दावों और कागजों तक ही सिमट कर रह जाती है। देश की अधिकांश महिलाओं को तो आज भी इस बात का पता नहीं है कि महिला दिवस का मतलब क्या होता है, महिला दिवस कब आता है, कब चला जाता है। भारत में अधिकतर महिलाएं अपने घर-परिवार में इतनी उलझी होती है कि उन्हे बाहरी दुनिया से मतलब ही नहीं होता है। लेकिन इस स्थिति को बदलने का बीड़ा महिलाओं को स्वयं उठाना होगा। जब तक महिलाएं स्वयं अपने सामाजिक स्तर और आर्थिक स्थिति में सुधार नहीं करेगी तब तक समाज में उनका स्थान गौण ही रहेगा।
बड़े दुख की बात है कि नारी सशक्तीकरण की बातें और योजनाएं केवल शहरों तक ही सिमटकर रह गई हैं। एक ओर शहरों में रहने वाली महिलाएं शिक्षित, आर्थिक रुप से स्वतंत्र हैं, जो पुरुषों के अत्याचारों का मुकाबला करने में सक्षम है। वहीं दूसरी तरफ गांवों में रहने वाली महिलाओं को तो अपने अधिकारो का भी पूरा ज्ञान नहीं हैं। वे चुपचाप अत्याचारों सहती रहती है और सामाजिक बंधनों में इस कदर जकड़ी है कि वहां से निकल नहीं सकती हैं।
बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान का जरूर कुछ असर दिखने लगा है
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान का जरूर कुछ असर दिखने लगा है। इस अभियान से अब देश में महिलाओं के प्रति सम्मान बढ़ने लगा है, जो इस बात का अहसास करवाता है कि आने वाले समय में महिलाओं के प्रति समाज का नजरिया सकारात्मक होने वाला होगा। विकसित देशों की तुलना में हमारे देश में महिलाओं की स्थिति अपेक्षाकृत अच्छी नहीं है। आज भी महाराष्ट्र के बीड़, गुजरात के सूरत, भुज में घटने वाली महिला उत्पीड़न की घटनाएं सभ्य समाज पर एक बदनुमा दाग लगा जाती है।
देश में आज भी सबसे ज्यादा उत्पीड़न महिलाओं का ही होता है। आए दिन महिलाओं के साथ बलात्कार, हत्या, प्रताड़ना की घटनाओं से समाचार पत्रों के पन्ने भरे रहते हैं। महिलाओं के साथ आज के युग में भी दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता है। बाल विवाह की घटनाओं पर पूर्णतया रोक ना लग पाना एक तरह से महिलाओं का उत्पीड़न ही है। कम उम्र में शादी कर देने से और कम उम्र में मां बनने से लड़की का पूर्णरूपेण शारीरिक और मानसिक विकास नहीं हो पाता है। आज हम 'बेटा-बेटी एक समान' की बातें तो करते हैं, मगर बेटी होते ही उसके पिता को बेटी की शादी की चिंता सताने लग जाती है। समाज में जब तक दहेज लेने और देने की प्रवृति नहीं बदलेगी तब तक कोई भी मां-बाप बेटी पैदा होने पर सच्चे मन से खुशी नहीं मना सकेंगे।
महिला दिवस पर देश भर में अनेकों स्थान पर कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। मगर अगले ही दिन उन सभी बातों को भुला दिया जाता है। समाज में अभी पुरूषवादी मानसिकता मिट नहीं पाई है। समाज में अपने अधिकारों और सम्मान पाने के लिए अब महिलाओं को स्वयं आगे बढऩा होगा। देश में जब तक महिलाओं का सामाजिक, वैचारिक एवं पारिवारिक तौर पर उत्थान नहीं होगा, तब तक महिला सशक्तीकरण की बातें करना बेमानी होगी।
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