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मंजिलें और भी हैं: सुंदरवन में विकास के साथ पर्यावरण का भी ध्यान रखा

फीचर डेस्क, अमर उजाला Published by: अजय सिंह Updated Tue, 02 Apr 2019 02:18 PM IST
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सुंदरवन (फाइल)

मैं पश्चिम बंगाल का हूं और रवींद्रनाथ से बेहद प्रभावित हूं। ज्यादातर लोग रवींद्रनाथ की कविताओं, कला और संगीत की चर्चा करते हैं। वे इस तथ्य की अनदेखी कर देते हैं कि शांतिनिकेतन की स्थापना करने के दौरान उन्होंने पास के तीन गांव गोद लिए थे और उन्हें श्रीनिकेतन नाम दिया था। मैं एक घुमक्कड़ हूं। मैंने देश को पूरी तरह जानने के लिए कई बार भ्रमण किया। उसी दौरान मेरे दिमाग में एक पिछड़े गांव को गोद लेकर उसका विकास करने का आइडिया आया। सुंदरवन के एक द्वीप में मुझे रांगाबालिया नाम का एक ऐसा ही अत्यंत पिछड़ा गांव मिला। कुछ दशक पहले जब मैं इस गांव में पहुंचा, तो वहां न तो पक्की सड़क थी, न ही पेयजल की कोई व्यवस्था। 



उस गांव तक पहुंचने के लिए पैदल ही जाना पड़ता था। स्कूल या चिकित्सा सुविधा की तो खैर वहां उम्मीद भी नहीं की जा सकती थी। उस गांव का विकास करने के लिए मैंने सुंदरवन में ही बस जाने का फैसला किया। सबसे पहले मुझे उस गांव के लोगों का भरोसा जीतना था, क्योंकि मैं उनके लिए बाहरी आदमी था। मैंने सड़क निर्माण और पेयजल की व्यवस्था के साथ साफ-सफाई के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए सबसे पहले गांव के लोगों के साथ एक बैठक की। जब लोगों ने लगातार उनके गांव की बेहतरी के लिए मुझे काम करते देखा, तो वे मुझ पर भरोसा करने लगे। लेकिन वहां विकास के लिए कदम उठाना भी चुनौती से कम नहीं था, क्योंकि सुंदरवन में विकास का मॉडल वही नहीं हो सकता था, जो देश के दूसरे इलाके में है। 


इसलिए हमने कच्ची सड़क को ही विकसित रूप दिया, उसके दोनों ओर पौधरोपण हुआ। उसके बाद प्रशासन के सहयोग से पेयजल, स्कूल और स्वास्थ्य सुविधाओं की शुरुआत वहां की गई, हालांकि इसमें बहुत समय लगा। मैंने वहां के किसानों को खेती में भी परंपरा का पालन करने के लिए कहा, क्योंकि सुंदरवन की दलदली जमीन में आप आधुनिकता और तकनीक के इस्तेमाल के बारे में सोच नहीं सकते। जहां कच्चे घरों के लंबे समय तक टिके रहने की संभावना नहीं होती, वहां खेती में फूंक-फूंककर कदम उठाने की जरूरत तो है ही, पर्यावरण के अनुकूल टिकाऊ खेती पर भी जोर देने की आवश्यकता है। 


जैसे दूसरे क्षेत्रों में, वैसे ही खेती में भी लोगों ने मेरे सुझावों पर अमल किया। मैंने अपने अभियान के तहत कई बार कृषि विशेषज्ञों को भी बुलाया, जिन्होंने किसानों को खेती के तरीके के बारे में विस्तार से समझाया। अच्छी बात यह है कि सरकार और प्रशासन ने सुंदरवन में टिकाऊ विकास की दिशा में किए गए मेरे काम का महत्व समझा। हालांकि कई बार सरकार का सहयोग मुझे समय पर नहीं मिला। लेकिन इससे विकास कार्यों की दिशा नहीं रुकी। मैंने खुद काम करने के अलावा स्थानीय लोगों का समूह भी बनाया, जो लगातार मेरे काम को आगे बढ़ा रहे हैं। 


आज मैं खुद अस्सी साल का हूं। पिछले बावन साल में मैंने सुंदरवन में अनेक उतार-चढ़ाव देखे हैं। मैं कह नहीं सकता कि अगले पचास साल में सुंदरवन का स्वरूप क्या होगा। लेकिन मुझे इस बात का संतोष जरूर है कि मैंने अपनी क्षमता के अनुरूप काम किया है। मैंने न केवल स्थानीय लोगों को टिकाऊ विकास के बारे में बताया है, जिसमें मनुष्य के साथ-साथ रॉयल बेंगॉल टाइगर का होना भी जरूरी है, बल्कि बाहर के लोगों और संस्थाओं को भी सुंदरवन के मौजूदा स्वरूप को बनाए रखने के लिए मदद करने के लिए कहा है।

(विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित)  

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