संसदीय बहस में प्रियंका गांधी का भाषण
संविधान पर चली संसदीय बहस में प्रियंका गांधी 32 मिनट तक बोलीं। इस दौरान उनके चेहरे पर कई बार हल्की मुस्कुराहट तो कभी कटाक्ष के भाव दिखे। बातों का दोहराव बहुत कम था। जबकि राहुल गांधी ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष होने के बाद भी अपनी बात 26 मिनट में ही समेट दी। वो चाहते तो यह विस्तार से बता सकते थे कि कांग्रेस ने ही देश की आत्मा के अनुरूप संविधान दिया है और इसके लिए हर संभव कोशिश की है। लेकिन राहुल संविधान बचाने, जातिगणना, अल्पसंख्यक, पिछड़ो, दलित व आदिवासियों को न्याय की ही बात करते रहे, जो वो कुछ समय से लगातार कहते आ रहे हैं। शास्त्रीय संगीत में दोहराव एक गुण है, लेकिन सियासत में वो जनता के कान पकने का कारण भी बन सकता है।
यही नहीं, राहुल संसद में भी केज्युअल अंदाज में टी शर्ट पहन कर आते हैं। यह उनका स्टाइल स्टेटमेंट हो सकता है। इम्फॉर्मल दिखने और महसूस कराने की कोशिश हो सकती है। इसके विपरीत सदन में गंभीर चर्चा को वक्तृत्व के मान्य पैमानों पर ही आगे बढ़ाना होता है। वहां इम्फार्मल होना, इनकाॅम्पिटेंट होना भी हो सकता है। जज्बात के साथ भाषा की सहज जुगलबंदी, सही शब्द चयन, ठोस मुद्दे और बात आपके दिल से निकली है, यह संदेश जाना भी जरूरी है।
मोदी का जवाब
संविधान पर समूची बहस का जवाब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 110 मिनट के अपने भाषण में दिया। मोदी का भाषण अकादमिक पैमाने पर भले उतना प्रभावी न लगे, लेकिन आम लोगों तक अपनी बात प्रभावी ढंग से पहुंचाने की कला उनके पास है। उन्होंने विपक्ष के प्रत्येक हमले का तथ्यों के आधार पर जवाब दिया। मोदी के भाषण का लुब्बोलुआब यही था कि कांग्रेस और उसके कर्णधार संविधान कैसे बचाना है, यह हमे न सिखाएं।
उन्होंने संविधान के प्रति कांग्रेस के ‘पाप’ गिनाते हुए कहा कि देश में आपात काल लगाना और मौलिक अधिकारों को निलंबित करना सबसे बड़ा पाप था। हमने तो दस साल में वैसा कुछ भी नहीं किया। फिर भी हमारी नीयत पर प्रश्नचिन्ह क्यों?
इस परस्पर आरोप प्रत्यारोप में पगी संविधान पर विशेष चर्चा को संविधान निर्माता बाबा साहब अंबेडकर द्वारा संविधान सभा की अंतिम बैठक में दिए भाषण के आलोक में देखना होगा। डाॅ. अंबेडकर ने कहा था कि संविधान का भविष्य इस बात पर निर्भर है कि उस पर अमल करने वाले लोग कैसे होंगे।
संसद में हुई रस्मी बहस में भी इस संदर्भ में कोई बात नहीं हुई कि हमे संविधान के आलोक में देश को किस दिशा में और कैसे ले जाना है। अपनी कमीज प्रतिद्वंद्वी के मुकाबले ज्यादा उजली होने की मुग्धता भविष्य के प्रति बहुत आश्वस्त नहीं करती।
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