राजनीतिक गलियारों में इन दिनों एक संभावना को लेकर चर्चा तेज है। कहा जा रहा है कि ममता बनर्जी कांग्रेस में शामिल हो सकती हैं। हालांकि चर्चा केवल उनके या अभिषेक बनर्जी के व्यक्तिगत रूप से कांग्रेस में जाने की नहीं है, बल्कि यह संभावना भी जताई जा रही है कि तृणमूल कांग्रेस का कांग्रेस में विलय कराया जा सकता है।
कल्पना कीजिए, राजनीति का कितना विचित्र परिहास है! जिसने न केवल कांग्रेस से अलग होकर अपनी राह बनाई थी, बल्कि गर्व के साथ कहा करती थीं कि उन्होंने पश्चिम बंगाल में कांग्रेस को महज एक साइन बोर्ड बनाकर छोड़ दिया है, वही आज सांसद, विधायक, पार्षद, राज्य की सत्ता और मुख्यमंत्री की कुर्सी, सब कुछ खोने के बाद कथित तौर पर उसी कांग्रेस के साइन बोर्ड के नीचे आश्रय तलाश रही हैं।
पहले भी हो चुका ऐसा
हालांकि, इस मामले में भी पश्चिम बंगाल में यह पहला होने का श्रेय तृणमूल कांग्रेस को नहीं दिया जा सकता। यदि कांग्रेस से अलग होकर बने किसी दल का अंततः फिर कांग्रेस में विलय हो जाता है, तो यह कोई नई राजनीतिक घटना नहीं होगी। इससे पहले अजय मुखोपाध्याय की 'बांग्ला कांग्रेस' और प्रणब मुखर्जी द्वारा स्थापित 'राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस' भी कांग्रेस से अलग होकर बनी थीं, लेकिन बाद में कांग्रेस की मुख्यधारा में वापस शामिल हो गई थीं। इसलिए ऐसा घटनाक्रम भारतीय राजनीति, विशेषकर पश्चिम बंगाल की राजनीति, में पहले भी देखा जा चुका है।
खैर, यदि ऐसा होता है, तो इसके दूरगामी राजनीतिक और कानूनी प्रभाव हो सकते हैं। किसी राजनीतिक दल का विलय केवल सांसदों या विधायकों की इच्छा से नहीं होता। इसके लिए पार्टी के संगठनात्मक ढांचे के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना पड़ता है। कांग्रेस के संविधान की तर्ज पर बने तृणमूल कांग्रेस के संविधान में भी ऐसी व्यवस्था मौजूद है।
विलय का प्रस्ताव
यदि पार्टी के प्रतिनिधि (डेलिगेट्स), जिनकी संख्या लगभग एक हजार बताई जाती है, बैठक में बहुमत से विलय का प्रस्ताव पारित कर देते हैं, तो नियमों के अनुसार तृणमूल कांग्रेस के सभी निर्वाचित जनप्रतिनिधि स्वतः कांग्रेस के जनप्रतिनिधि माने जाएंगे। ऐसी स्थिति में पश्चिम बंगाल विधानसभा में तृणमूल के 80 और कांग्रेस के 2 विधायक मिलकर कांग्रेस की संख्या 82 तक पहुंचा सकते हैं।
स्वाभाविक रूप से, तृणमूल कांग्रेस के असंतुष्ट सांसद और विधायक इस निर्णय को स्वीकार नहीं भी कर सकते हैं। विधानसभा में उनके पास यदि दो-तिहाई बहुमत मौजूद है, तो वे अलग समूह बनाकर राजनीतिक रास्ता चुन सकते हैं। 82 विधायकों की संख्या में दो-तिहाई का आंकड़ा 55 होता है, और यदि असंतुष्ट खेमे के पास इससे अधिक विधायक हैं, तो उनके लिए अलग राह चुनना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है।
लोकसभा में बदलेगी स्थिति
लेकिन लोकसभा में स्थिति अलग होगी। यदि तृणमूल के 28 सांसद कांग्रेस सांसद माने जाने लगें, तो कांग्रेस की कुल संख्या 127 तक पहुंच सकती है। ऐसी स्थिति में दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा 85 सांसद होगा, जिसे हासिल करना असंतुष्टों के लिए कठिन साबित हो सकता है। परिणामस्वरूप वे दल-बदल विरोधी कानून की बाधाओं में फंस सकते हैं। उनके पास इस्तीफा देने का विकल्प तो रहेगा, लेकिन वे तृणमूल कांग्रेस के नाम, चुनाव चिन्ह या संगठनात्मक संसाधनों पर दावा नहीं कर पाएंगे।
इस चर्चा का एक महत्वपूर्ण पहलू पार्टी की संपत्ति और संसाधनों से भी जुड़ा है। यदि तृणमूल कांग्रेस का कांग्रेस में विधिवत विलय होता है, तो पार्टी की संपत्ति, कोष और संगठनात्मक ढांचा भी नए राजनीतिक ढांचे का हिस्सा बन सकते हैं। ऐसे में अलग होने वाले नेताओं को नया दल बनाना पड़ सकता है, लेकिन वे पुराने संगठन की पहचान और संसाधनों का उपयोग नहीं कर सकेंगे।
विभाजन से बचाने की रणनीति
यही कारण है कि इस संभावित कदम को केवल राजनीतिक पुनर संरेखण के रूप में नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे एक ऐसी रणनीति के रूप में भी देखा जा रहा है जो तृणमूल कांग्रेस के भीतर उभर रहे असंतोष और संभावित विभाजन को नियंत्रित करने का माध्यम बन सकती है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह राजनीतिक प्रतिशोध की चाल होगी, अस्तित्व बचाने का प्रयास, या फिर अपनी राजनीतिक विरासत और आत्मसम्मान की रक्षा के लिए अपनाई गई एक रणनीति? आने वाले समय में इसका जवाब पश्चिम बंगाल की राजनीति की नई दिशा तय कर सकता है।
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