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मृणाल सेन: सामाजिक चेतना के प्रतिबद्ध फिल्मकार जो अपने आप में एक संस्थान हैं 

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मृणाल सेन ने भारत सरकार की छोटी सी सहायता राशि से ‘भुवन शोम’ बनाई थी
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भारतीय सिनेमा में मृणाल सेन का योगदान अद्वितीय है। उन्होनें सत्यजित रे और ऋत्विक घटक की कलात्मक सर्जना को मानवीय वैचारिकी के आधार पर आगे बढ़ाया। उनकी लगभग सभी फिल्में आज भी प्रासंगिकता को लिए हुए हैं जिनमें  रातभोर, नील आकाशेर नीचे, बाइशे श्रावण, पुनश्च, अवशेष, प्रतिनिधि ,अकाश कुसुम, मतीरा मनीषा, भुवन शोम, इच्छा पुराण, कोरस, मृगया, परसुराम, एक दिन प्रतिदिन,  आकालेर सन्धाने, चलचित्र, खंडहर, एक दिन अचानक, महापृथ्वी, अन्तरीन, 100 ईयर्स ऑफ सिनेमा,आमार भुवन आदि।  

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सिनेमा की दुनिया में उन्हें मृणाल दा के नाम से प्रसिद्धि और सम्बोधन मिला। उन्होनें 1969 में 'भुवन शोम' नामक बनाई थी जिसे हिंदी में समानांतर सिनेमा की शुरुआत माना जाता है।  कुल 28 फीचर फिल्मों का निर्देशन करने वाले मृणाल दा के खाते में 'एक अधूरी कहानी', 'मृगया', 'खंडहर', 'जेनेसिस' और 'एक दिन अचानक' जैसी श्रेष्ठ हिंदी फिल्में भी हैं। 

दिलचस्प यह है कि मृणाल दा को हिंदी नहीं आती थी, फिर भी फिल्म निर्देशन में उनके समक्ष भाषा की समस्या कभी आड़े नहीं आई। जिस भाषा में उन्होंने फिल्म बनाई तो वहां की स्थानीय लोकोक्तियों और मुहावरों का प्रयोग किया। मृणाल दा फिल्म का निर्माण करते समय स्थानीयता के देशज मुहावरे और लोक व्यवहार की सूक्ष्मता के प्रति संवेदनशील और सावधान रहते थे। 
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वैसे भी जब एक भाषा की लोकोक्तियां दूसरी भाषा में आती हैं तो जाहिर है कि दूसरी भाषा भी समृद्ध होती है। स्थानीय लोक व्यवहार पर जोर देने के अलावा मृणाल दा हमेशा अपनी हर फिल्म को तीन कसौटियों पर कसते रहे हैं। पहला, टेक्स्ट जिस पर फिल्म आधारित होती है। दूसरा, सिनेमा का फार्म, जिसमें कलाकारों के प्रदर्शन पर ध्यान दिया जाता है और तीसरा, समय जब फिल्म अपनी समकालीनता से जुड़ती है तभी प्रासंगिक बनती है। 

कदाचित इन कसौटियों पर कसने के कारण ही मृणाल दा 28 श्रेष्ठ कला फिल्में, तीन गंभीर वृत्त चित्र और दो टेली फिल्में दे सके । इनकी अधिकतर फिल्में बांग्ला भाषा में रही हैं।  उन्हें अक्सर वैश्विक मंच पर बंगाली समानांतर सिनेमा के सबसे बड़े राजदूतों में से एक माना जाता रहा है। 1955 में मृणाल सेन ने अपनी पहली फिल्म ‘रातभोर’ बनाई। उनकी अगली फिल्म ‘नील आकाशेर नीचे’ ने उनको स्थानीय पहचान दी और उनकी तीसरी फिल्म ‘बाइशे श्रावण’ ने उनको अंतरराष्ट्रीय प्रसिद्धि दिलाई। 

पांच और फिल्में बनाने के बाद मृणाल सेन ने भारत सरकार की छोटी सी सहायता राशि से ‘भुवन शोम’ बनाई थी, जिसने उनको बड़े फिल्मकारों की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया और उनको राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्रदान की। भुवन शोम ने भारतीय फिल्म जगत में क्रांति ला दी और कम बजट की यथार्थपरक फिल्मों का 'नया सिनेमा' या 'समांतर सिनेमा' दौर शुरू हो गया । 

भुवन शोम में उत्पल दत्त ने भुवन शोम नामक बड़े रेल अधिकारी और सुहासिनी मुले गौरी नामक ग्रामीण लड़की के चरित्र का अभिनय किया है। यह एक बंगाली कहानी पर आधारित है, जिसके रचनाकार बलाइ चंद ‘बनफूल’हैं।  यह फिल्म आधुनिक भारतीय सिनेमा में एक मील का पत्थर मानी जाती है। सुहासिनी मुले ने अपना फिल्मी सफर इसी फिल्म से शुरू किया था। 

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मृणाल दा की फिल्में आज के हिंसा-प्रतिहिंसा के भयावह परिवेश में मनुष्य को बचाने की चिंता पूरी शिद्दत से करती हैं।
भुवन शोम फिल्म के निर्देशन और अभिनय को जब हम देखते हैं तो पाते हैं कि जब ट्रेन चलती है तो ट्रेन नहीं बल्कि ट्रेन की पटरी मात्र ही कैमरे से दिखती है या बाहर का पूरा लैंड स्केप। पर्दे पर पात्र के आत्मालाप के समय ऊपर और नीचे से दो काली पट्टियों का सहारा लिया जाता है जो बहुत सचेत सम्पादन की तरफ इशारा करता है। उत्त्पल दत्त मुख्य पात्र का अभिनय करते हुए उसके चरित्र में एकाकार या परकाया प्रवेश नहीं करते हैं बल्कि हमेशा एक निरपेक्ष भाव को बनाए रखते हैं। 

मृणाल दा के निर्देश के अनुसार वह कैमरे की आंखों में आंखे डालकर या दृश्य से अलग आत्मालाप का अभिनय करते हैं। जैसे कह रहे हों की मैं ‘भुवन शोम’ नहीं हूं , मैं उसका अभिनय करते हुए उसके चरित्र से दूरी बनाकर अभिनय कर रहा हूं। उनका यह स्वाभाविक सचेतनता ‘ब्रेख्त’ का अभिनय संबंधी ‘अलगाव सिद्धांत’ (alienation theory) का अनूठा प्रयोग साबित होता है। 

इस सिद्धांत का निर्वाह रंगमंच पर तो सावधानी से किया जा सकता है लेकिन सिनेमा में बहुत ही चुनौती भरा हो जाता है। यह जोखिम हमें फिल्म के आरंभ से दिखाई देता है । जब वे  गांव में  गौरी से मिलते हैं तो अपने हर दूसरे संवाद को कैमरे की आँख में देख कर हर भाव के गहन प्रभाव को तोड़ते रहते हैं और दर्शको को यह एहसास दिलाते हैं कि वे महज दृश्य देखते हुये उस चरित्र के भाव से दूर खड़े हैं। 

विश्व सिनेमा पर ब्रेख्त के प्रभाव की दस मुख्य फिल्मों की गिनती में ‘भुवन शोम’ को भी रखा गया है। भुवन शोम एक ऐसा चरित्र है जो परंपरा से हटकर समाज की प्रक्रिया को देखता है जहां से समस्याएं पैदा होती हैं। इस फिल्म में ब्रेख्त की महत्वपूर्ण वैचारिकी दिखती है कि “मनुष्य में ही बदलाव की संभावना है” । 

एक खूसट, अकड़ू भुवन शोम गांव से वापस आने के बाद जीवन को बहुत ही सहजता और खुशी से जीना आरंभ करता है । स्वयं उत्पल दत्त ब्रेख्त से बहुत प्रभावित थे और यही कारण है कि उनके हर नाटक, फिल्म में ब्रेख्त के अलगाववादी अभिनय की छाप हमें दिखाई देती है। उनके द्वारा ही निर्देशित पृथ्वी के दृश्य दिखाने के बाद फिल्म दर्शकों को उस लोक में ले जाती है, जहां हिंसा नहीं है, प्रतिहिंसा नहीं है, विद्वेष नहीं है, वातावरण विषाक्त नहीं है। उस लोक में ममत्व है, प्यार है, संवेदना है और एक-दूसरे को समझने की इच्छा बची हुई है। वहां बड़े भाई के हाथों 'मानुष' हुए नूर अली हैं। 

14वीं शताब्दी में चंडीदास ने कहा था-'सुनो हे मानुष भाई/ सबार ऊपोरे मानुष सत्य/ ताहार ऊपोरे नाई।' यानी मनुष्य से ऊपर कोई सत्य नहीं है। बंगाल में हम रोज किसी न किसी माता-पिता के मुंह से सुनते हैं 'छेले-मे के मानुष कोरते होबे।' यानी सिर्फ पढ़ाना-लिखाना पर्याप्त नहीं, मनुष्य  बनाना जरूरी है। 

उदाहरण के लिए उनकी  फिल्म 'आमार भुवन' को ही लें तो उस फिल्म के आरंभ में ही युद्ध, दंगे और असहाय बच्चे की तस्वीर आंखों के सामने तैर जाती है। यह दृश्य सिर्फ दो मिनट का होता है किंतु बहुत विचारणीय और बेचैन करने वाला है।

मृणाल दा की फिल्में आज के हिंसा-प्रतिहिंसा के भयावह परिवेश में मनुष्य को बचाने की चिंता पूरी शिद्दत से करती हैं। यह चिंता एक मानवीय मूल्य भी बन जाती है जो एक वैश्विक जरूरत है। उनकी द्वारा बनी सभी फिल्में सामाजिक चेतना से प्रतिबद्ध हैं और हर तबके की समस्या के प्रभावित हैं जो आज भी प्रासंगिक बनी हुई हैं। इसलिए आज भी मृणाल सेन का भारतीय सिनेमा में योगदान एक जरूरी स्कूल की तरह है जो सदैव प्रयोग का प्रेरणा स्रोत बना रहेगा।  


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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