बीस की उम्र में युवा अपने जीवन के उस पड़ाव पर होते हैं, जहां उनके सामने भविष्य का एक बहुत लंबा रास्ता खुला होता है, जो कई बार अवसर से ज्यादा दबाव जैसा महसूस होने लगता है। उन्हें लगातार यह तय करना होता है कि वे आगे क्या करेंगे, किस तरह का कॅरिअर चुनेंगे। हर फैसला महत्वपूर्ण लगता है और हर विकल्प के साथ एक डर जुड़ा होता है कि कहीं उन्होंने गलत रास्ता तो नहीं चुन लिया। एक और दबाव होता है-दूसरों की नजरों में खुद को सही साबित करने का।
युवा उम्र में हम इस बात को लेकर ज्यादा चिंतित रहते हैं कि दूसरे हमारे बारे में क्या सोचते हैं। लेकिन, उम्र बढ़ने के साथ यह नजरिया बदलने लगता है। यही कारण है कि युवाओं की तुलना में उम्रदराज लोग अपने जीवन से अधिक संतुष्ट रहते हैं। ऐसा इसलिए नहीं कि उम्र बढ़ने के साथ जिंदगी की सभी मुश्किलें खत्म हो जाती हैं, बल्कि इसलिए कि इन्सान धीरे-धीरे यह सीखने लगता है कि किन चीजों को महत्व देना है और किन चीजों को छोड़ देना है।
उम्र बढ़ने के साथ मिलने वाले अनुभव हमें सिखाते हैं कि हर सवाल का जवाब तुरंत मिलना जरूरी नहीं है। हर अवसर को हासिल करना जरूरी नहीं है और हर गलती जिंदगी की हार नहीं होती। साथ ही, बुजुर्ग व्यक्ति वर्तमान को ज्यादा महत्व देने लगते हैं। युवावस्था में संभावनाएं बहुत होती हैं, पर उलझन भी उतनी ही होती है। उम्र बढ़ने के साथ संभावनाओं की संख्या भले कम दिखाई दे, लेकिन जीवन में क्या महत्वपूर्ण है, इसकी समझ ज्यादा स्पष्ट हो जाती है।