किसी वस्तु के घूमने की मात्रा को कोणीय संवेग कहते हैं। बाहरी बल का प्रभाव न होने पर यह स्थिर रहता है, लेकिन वस्तु का आकार बदलने से उसकी घूमने की गति बदल सकती है। मसलन, कुर्सी पर बैठे व्यक्ति के पैर फैलाने पर घूमने की रफ्तार धीमी और उन्हें समेटने पर तेज हो जाती है। बर्फ पर स्केटिंग करने वाले खिलाड़ी भी बाहें समेटकर तेजी से घूमते हैं। यही सिद्धांत आकाशगंगाओं के निर्माण को समझने में भी अहम है।
आकाशगंगाओं में तारे, ग्रह, गैस और धूल जैसे सामान्य पदार्थों के साथ डार्क मैटर भी होता है। ब्रह्मांड के शुरुआती दौर में डार्क मैटर के गुरुत्वाकर्षण ने गैस और धूल के बादलों को एकत्र होने में मदद की। ये बादल एक-दूसरे से टकराते हैं और गुरुत्वाकर्षण खिंचाव के कारण घूमते हुए करीब आने लगते हैं। इनके आपस में मिलने पर शुरुआती कोणीय संवेग नए और विशाल बादलों की घूमने की गति में बदल जाता था। हालांकि, बादलों के द्रव्यमान, गति और टकराने के कोण के आधार पर आकाशगंगा की घूमने की रफ्तार में परिवर्तन या उसकी दिशा भी बदल सकती है। इस तरह धीरे-धीरे एक विशाल घूमती हुई आकाशगंगा का निर्माण होता है।
बनावट और घूमने के तरीके के आधार पर आकाशगंगाएं तीन प्रकार की होती हैं। पहली, अनियमित आकाशगंगाओं की कोई निश्चित संरचना नहीं होती। दूसरी, सर्पिल आकाशगंगाएं चपटी डिस्क जैसी होती हैं और इनके अधिकतर तारे, गैस व धूल एक दिशा में घूमते हैं। हमारी मिल्की वे इसी श्रेणी में आती है। तीसरी, दीर्घवृत्ताकार आकाशगंगाओं में तारे अधिक और गैस-धूल कम होती है। इनका घूमना दूसरी आकाशगंगाओं के साथ हुए इनके विलय पर निर्भर करता है।
ब्रह्मांड में घूमना केवल ग्रहों और तारों की गति नहीं, बल्कि आकाशगंगाओं के निर्माण की भी एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। दिलचस्प यह है कि लगभग सभी आकाशगंगाएं घूमती हैं, लेकिन उनकी संरचना, गति व घूमने का तरीका एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हो सकता है।