एक कार्यक्रम में नीतीश ने बिना नाम लिए सबकुछ कह दिया।
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दरअसल भगवा परिवार (संघ और बीजेपी) की राष्ट्रवादी और राम मंदिर की राजनीति ने ओबीसी वर्ग में एक बहुत बड़ा तबका पैदा कर दिया जो अपने आपको हिंदू पहले मानने लगा और ओबीसी बाद में। इसी तबके ने 2019 के लोकसभा चुनावों में क्षेत्रीय दलों को नुकसान पहुंचाया। ऊपर से मोदी की शख्सियत ने भी, खासकर उत्तर भारत के एमबीसी तबके को बीजेपी के लिए वोट करने पर मजबूर किया।
ऐसे में क्षेत्रीय पार्टियों को लगता है कि 2024 में जब राम मंदिर अयोध्या में बनकर तैयार होगा तो बीजेपी के हिंदुत्व कार्ड का काट केवल जातीय जनगणना के आंकड़े ही कर पाएंगे, तभी बाबा साहेब अंबेडकर की बात नीतीश और उनके साथी रह-रहकर याद दिला रहे है-
जिसकी जितनी हिस्सेदारी, उसकी उतनी साझेदारी!
1881 में पहली बार अंग्रेजों ने देश में सेंसेस करवाई जोकि हर दस साल में होनी तय हुई। 1931 में पहली बार जाति आधारित जनगणना हुई। उस वक्त के आंकड़ों के हिसाब से ही आज जातीय वर्गीकरण चला आ रहा है और उसी हिसाब से अलग-अलग जातियों के लिए सरकारें योजनाएं बनाती रही हैं।
जाति आधारित जनगणना को लेकर थी आशंका
देश आजाद होने के बाद नेहरू और पटेल की कैबिनेट ने तय किया था कि जाति आधारित जनगणना से देश में हालात चिंताजनक हो सकते हैं तो केवल जनगणना के एससी-एसटी के आंकड़े ही जारी होते रहे। यहां तक की 70-80 के दशक की राजनीति में जाति व्यवस्था को खत्म करने के नाम पर लोहिया और उनके तमाम प्रशंसकों ने अपने सरनेम (टाइटेल) लगाने तक बंद कर दिए थे।
इन शख्सियतों में लालू प्रसाद और मुलायम सिंह जैसे नेता भी थे। इन्हीं नेताओं ने ही 1990 के दौर में वीपी सिंह की सरकार में मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करवाया और ओबीसी को आरक्षण दिलवाया। मंडल कमीशन के जरिए आरक्षण लागू कराने का फायदा एसपी- बीएसपी को यूपी में और आरजेडी और जनता दल को बिहार-कर्नाटक जैसे राज्यों में मिला। इन सूबों में कांग्रेस और बीजेपी जैसी राष्ट्रीय पार्टी की साख और संख्या दोनों में कमी आई।
बाद में इन्हीं लोगों (लालू, मुलायम और शरद यादव जैसे ओबीसी नेताओं) ने दबाव बनाकर 2010 में यूपीए सरकार के राज में जातीय जनगणना का बिल पास कराया। जनगणना के लिए बजट सेन्क्शन कराया। 2011 में जनगणना हुई भी पर आंकड़े सार्वजनिक नहीं हुए।
मंडल-2 का दौर
अब जब बिहार में जाति आधारित जनगणना चल रही है तो इसे मंडल -2 का दौर कहा जा रहा है।
मंडल-वन के दौर में बीजेपी 1996 से लेकर 2009 तक ओबीसी वोटों के मामले में जूझती ही रही, लेकिन 2014 और फिर 2019 में इस हिंदुत्ववादी पार्टी ने ओबीसी वोटों में जो जबरदस्त प्रदर्शन किया उससे क्षेत्रीय दलों के अस्तित्व पर संकट छाने लगा, खासकर लोकसभा चुनावों में, इसलिए नीतीश के इस कदम को मंडल-टू कहा जा रहा है, क्योंकि कुछ लोगों को ये डर है कि ये आंकड़े अगड़ों और पिछड़ों में और खाई पैदा कर देंगे, देश में नया बवाल खड़ा हो सकता है।
बीजेपी और कांग्रेस दोनों राष्ट्रीय दलों पर ये इल्जाम लगता है कि वो अपने अगड़े और सवर्णों को वोटबैंक को नाराज नहीं करना चाहती, तो ही वो देश में जातीय जनगणना कराने के लिए उत्साहित नहीं दिखती। मुंह पर विरोध भी नहीं करेगी, लेकिन ये काम पूरा हो उसमें मदद भी नहीं करेगी।
ऐसे में एक सुझाव जो शायद सबकी मदद कर दे- राष्ट्रीय दलों को ही जातीय जनगणना कराने में आगे आना चाहिए, इससे क्षेत्रीय और छोटे दलों का भरोसा जीत पाएंगे। छोटे व क्षेत्रीय दलों को ये वादा देश से करना चाहिए कि वो जातीय जनगणना के आंकड़े राष्ट्रीय स्तर पर जनसंख्या के आंकड़े के आने के बाद ही मानेंगे। राष्ट्रव्यापी सभी दलों को तय कर लेना चाहिए कि 2047 तक जाति आधारित असमानता को देश से खत्म करने में सब मिलकर प्रयास करेंगे।
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