17 दुर्लभ तत्व तकनीकी क्षेत्रों में किसी भी देश की उपलब्धियों को बनाते या बिगाड़ते हैं। भारत के पास इनकी कमी नहीं है, फिर भी चुनौती है। दुर्लभ धातुओं के बिना, कोई इलेक्ट्रिक वाहन, मोटर, कोई पवन टरबाइन, कोई उन्नत रडार व कोई स्मार्टफोन चल नहीं सकता। ओडिशा से लेकर तमिलनाडु व केरल के तटीय विस्तार तक, देश के पास दुनिया के दुर्लभ धातु भंडार का छह से सात फीसदी हिस्सा है। फिर भी वैश्विक उत्पादन में मात्र दो फीसदी योगदान करता है।
इलेक्ट्रिक वाहनों, रक्षा प्रणालियों, ऊर्जा ग्रिडों, अंतरिक्ष, विज्ञान के क्षेत्रों में एक प्रौद्योगिकी महाशक्ति बनने की भारत की पदयात्रा गंभीर रूप से उन दुर्लभ धातुओं पर निर्भर करती है, जिनके बारे में अधिकांश लोगों ने कभी नहीं सुना है। ये 17 दुर्लभ तत्व हैं, जो तकनीकी क्षेत्रों में किसी भी देश की उपलब्धियों को बनाते या बिगाड़ते हैं। भारत के पास इनकी कमी नहीं है। ओडिशा की समुद्री रेत से लेकर तमिलनाडु और केरल के तटीय विस्तार तक, देश के पास दुनिया के दुर्लभ धातु भंडार का लगभग छह से सात फीसदी हिस्सा है। फिर भी यह वैश्विक उत्पादन में मात्र दो फीसदी का योगदान करता है।
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चीन दुनिया के लगभग दो-तिहाई उत्पादन, और लगभग 90 फीसदी शोधन सुविधाओं को नियंत्रित करता है। भारत की मोनाजाइट-समृद्ध रेत का प्रबंधन बड़े पैमाने पर परमाणु ऊर्जा विभाग के तहत ‘इंडियन रेयर अर्थ्स लिमिटेड’ (आईआरईएल) द्वारा किया जाता है, लेकिन दशकों तक परमाणु संवेदनशीलता की चिंताओं के कारण निजी खनन प्रतिबंधित था। दुर्लभ धातुओं के बिना, कोई इलेक्ट्रिक वाहन, मोटर, कोई पवन टरबाइन, कोई उन्नत रडार व कोई स्मार्टफोन चल नहीं सकता। दुर्लभ धातुओं में आत्मनिर्भरता की ओर भारत के हालिया अभियान ने गति जरूर पकड़ी है।
सरकार ने घरेलू शोधन और चुंबक निर्माण को आकर्षित करने के लिए नए प्रोत्साहन जारी किए हैं, जबकि स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण संभालने के लिए इंडियन रेयर अर्थ्स लिमिटेड नेटवर्क को मजबूत किया है। यह बदलाव तब आया है, जब चीन, दुनिया के प्रभुत्वशाली दुर्लभ धातु की आपूर्तिकर्ता ने, एक सोची-समझी चाल चली है- भारत को इस शर्त पर सीमित आपूर्ति फिर से शुरू करने का प्रस्ताव दिया है कि सामग्री को किसी तीसरे देश में फिर से निर्यात नहीं किया जाएगा। इशारा अमेरिका के लिए है, जो अपनी आपूर्ति शृंखलाओं को सुरक्षित करने के लिए संघर्ष कर रहा है।
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भारत अब अवसर और सावधानी के बीच फंसा हुआ है, अपने दो सबसे बड़े व्यापारिक भागीदारों की प्रतिद्वंद्विता में न शामिल होने को लेकर सतर्क है। भारत की समस्या भूगर्भीय कमी नहीं बल्कि शोधन और प्रसंस्करण क्षमता की कमी है। भले ही भारत आक्रामक रूप से खनन करे, अयस्कों को अब भी पृथक्करण के लिए विदेश भेजा जाना होगा-ज्यादातर चीन। असली बाधा वहीं है। बाहर निकलने के लिए, भारत को एक राष्ट्रीय दुर्लभ धातु मिशन की आवश्यकता है: सख्त सुरक्षा उपायों के तहत निजी निवेश के लिए खनन खोलें, घरेलू शोधन क्लस्टर स्थापित करें, और डाउनस्ट्रीम नवाचार के लिए विश्वविद्यालयों और रक्षा प्रयोगशालाओं को जोड़ें। जब तक भारत अपनी दुर्लभ रेत को रणनीतिक ताकत में नहीं बदलेगा, वह उधार के तत्वों पर निर्माण करना जारी रखेगा और चीन पर निर्भर भी।