अधिकांश गर्म रेगिस्तान भूमध्य रेखा के उत्तर व दक्षिण में 30 डिग्री अक्षांश पर स्थित हैं। हालांकि, अंटार्कटिका जैसे बेहद ठंडे रेगिस्तान भी हैं। भूमध्य रेखा पर सूर्य की सीधी किरणों से हवा गर्म होकर ऊपर उठती है। 30 डिग्री अक्षांश पर यही हवा ठंडी व शुष्क होकर नीचे उतरती है। नमी की कमी के कारण वर्षा नहीं होती और यहां रेगिस्तानी परिस्थितियां बन जाती हैं।
रेगिस्तान का नाम सुनते ही आंखों के सामने तपती धूप, दूर-दूर तक फैले रेत के टीले और झुलसा देने वाली गर्मी की तस्वीर उभर आती है-जैसे सहारा रेगिस्तान। पृथ्वी पर दर्ज किए गए सबसे अधिक तापमान भी रेगिस्तानी इलाकों में मिले हैं। कैलिफोर्निया की डेथ वैली में हवा का तापमान 56.7 डिग्री सेल्सियस व ईरान के लुट रेगिस्तान की सतह का ताप 80.8 डिग्री सेल्सियस तक दर्ज किया जा चुका है। हालांकि, रेगिस्तान की पहचान केवल गर्मी से नहीं होती।
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जलवायु वैज्ञानिकों के अनुसार, किसी क्षेत्र को रेगिस्तान तब कहा जाता है, जब वहां सालभर 250 मिलीमीटर (10 इंच) से कम वर्षा या बर्फबारी हो। यानी, रेगिस्तान गर्म भी हो सकते हैं और बेहद ठंडे भी। इसका सबसे बड़ा उदाहरण अंटार्कटिका है, जिसे दुनिया का सबसे बड़ा रेगिस्तान माना जाता है। यहां तापमान माइनस 60 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है, पर अत्यंत कम बर्फबारी होने के कारण यह रेगिस्तान की श्रेणी में आता है।
दुनिया के अधिकांश गर्म रेगिस्तान भूमध्य रेखा के उत्तर व दक्षिण में लगभग 30 डिग्री अक्षांश पर स्थित हैं। दरअसल, भूमध्य रेखा पर सूर्य की किरणें सबसे ज्यादा सीधी पड़ती हैं, जिससे हवा गर्म होकर ऊपर उठती है। वहीं 30 डिग्री अक्षांश के आसपास यही हवा ठंडी होकर नीचे उतरती है और उसमें नमी लगभग समाप्त हो जाती है। इसलिए, यहां वर्षा नहीं होती और शुष्क रेगिस्तानी परिस्थितियां बन जाती हैं। रेगिस्तानों की भीषण गर्मी के पीछे तीन प्रमुख कारण हैं। पहला, यहां बादल लगभग नहीं बनते। बादल सामान्यतः सूर्य की किरणों का कुछ हिस्सा रोक लेते हैं, पर रेगिस्तान में शुष्क हवा के कारण ऐसा नहीं हो पाता।
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नतीजतन, सूर्य की अधिकांश ऊर्जा सीधे जमीन तक पहुंचती है और सतह तेजी से गर्म हो जाती है। दूसरा कारण रेत व चट्टानों का स्वभाव है। ये बहुत जल्दी गर्म हो जाते हैं। सूर्यास्त के बाद इनमें संचित गर्मी भी तेजी से निकल जाती है। इसी वजह से रेगिस्तान में दिन में भीषण गर्मी हो सकती है और रात को कड़ाके की ठंड। तीसरा कारण वाष्पीकरण से मिलने वाली प्राकृतिक ठंडक (इवैपोरेटिव कूलिंग) का अभाव है। सामान्य क्षेत्रों में पौधे वातावरण में जलवाष्प छोड़कर आसपास का तापमान कम करते हैं। पर, रेगिस्तान में नमी और वनस्पति, दोनों ही बहुत कम होती हैं। इसलिए, यह प्राकृतिक शीतलन लगभग समाप्त हो जाता है और गर्मी जमीन के पास ही बनी रहती है। - द कन्वर्सेशन