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बात 1969 की: दल टूटा तो ‘निशान’ किसका हुआ? फ्रीज से फैसले तक का सियासी इतिहास

सार

1969 में कांग्रेस के ऐतिहासिक विभाजन से शुरू हुई चुनाव चिन्ह की सियासी जंग अब 2026 में तृणमूल कांग्रेस तक पहुंच गई है। कांग्रेस, एआईएडीएमके, समाजवादी पार्टी, लोक जनशक्ति पार्टी, शिवसेना और एनसीपी जैसे दलों में टूट के दौरान कभी मूल चुनाव चिन्ह किसी एक गुट को मिला, तो कभी विवाद सुलझने तक उसे फ्रीज कर दोनों पक्षों को अलग-अलग निशान दिए गए। सवाल आज भी वही है- दल टूटने के बाद असली पार्टी कौन और चुनाव चिन्ह का असली हकदार कौन?
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राहुल गांधी। - फोटो : ANI
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विस्तार
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किसी राजनीतिक दल में विभाजन के बाद लड़ाई केवल नेतृत्व और संगठन पर कब्जे की नहीं होती। पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह भी उतनी ही बड़ी राजनीतिक पूंजी होते हैं। वर्षों में मतदाताओं के बीच बनी पहचान एक निशान से जुड़ी होती है। इसलिए पार्टी टूटते ही दोनों गुट पुराने नाम और चुनाव चिन्ह पर दावा करते हैं।

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भारत में ऐसे विवादों का लंबा इतिहास रहा है और इसी इतिहास ने यह तय करने की एक व्यवस्था विकसित की है कि आखिर चुनाव चिन्ह किसे मिलेगा।

1969 में कांग्रेस से शुरू हुई बड़ी लड़ाई

चुनाव चिन्ह विवाद का सबसे महत्वपूर्ण शुरुआती उदाहरण 1969 का कांग्रेस विभाजन है। राष्ट्रपति चुनाव को लेकर कांग्रेस में मतभेद गहरा गया, इंदिरा गांधी और पार्टी के पुराने संगठनात्मक नेतृत्व यानी ‘सिंडिकेट’ के टकराव को खुली लड़ाई में बदल दिया। कांग्रेस ने सिंडिकेट के पसंदीदा नीलम संजीव रेड्डी को आधिकारिक उम्मीदवार बनाया, जबकि इंदिरा गांधी ने स्वतंत्र उम्मीदवार वीवी गिरि का समर्थन किया और कांग्रेस सांसदों से ‘अंतरात्मा की आवाज पर वोट’ करने की अपील की। 

16 अगस्त 1969 को गिरि चुनाव जीत गए। इसके बाद इंदिरा गांधी और कांग्रेस संगठन के बीच टकराव इतना बढ़ा कि नवंबर 1969 में कांग्रेस औपचारिक रूप से दो गुटों में बंट गई—कांग्रेस (R), जिसका नेतृत्व इंदिरा गांधी के पास था, और कांग्रेस (O), जिसमें निजलिंगप्पा, कामराज और मोरारजी देसाई जैसे नेता थे। चुनाव चिन्ह भी दोनों गुटों के बीच विवाद का विषय बना। पुराना ‘दो बैलों की जोड़ी’ कांग्रेस (O) के पास रहा, जबकि इंदिरा गांधी के कांग्रेस (R) को नया चिन्ह ‘गाय-बछड़ा’ मिला। आगे चलकर यही चिन्ह इंदिरा गांधी की कांग्रेस की पहचान बन गया।
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1978 की टूट और ‘गाय-बछड़ा’ से ‘हाथ’

1977 में सत्ता से बाहर होने के बाद कांग्रेस के भीतर फिर बड़ा विभाजन हुआ। 1978 में इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाला गुट और के ब्रह्मानंद रेड्डी के नेतृत्व वाला विरोधी गुट अलग हो गए। पुराने ‘गाय-बछड़ा’ चिन्ह को लेकर विवाद के बाद चुनाव आयोग ने दोनों गुटों के लिए अलग-अलग चुनाव चिन्ह तय किए।

इंदिरा गांधी के गुट को ‘हाथ’ यानी हाथ का पंजा मिला, जबकि उनके विरोधी कांग्रेस गुट को ‘चरखा’ चुनाव चिन्ह मिला। इसके बाद ‘हाथ’ धीरे-धीरे कांग्रेस की स्थायी चुनावी पहचान बन गया और 1980 के लोकसभा चुनाव से कांग्रेस ने इसी चिन्ह के साथ चुनाव लड़ा।

इससे एक बात स्पष्ट हुई- चुनाव चिन्ह किसी नेता की निजी संपत्ति नहीं है और केवल संस्थापक या वरिष्ठ नेता होने से उस पर स्वतः अधिकार नहीं मिल जाता।

चुनाव चिन्ह कब होता है फ्रीज?

हर विवाद में आयोग तुरंत किसी एक गुट को पुराना चुनाव चिन्ह नहीं देता। यदि तत्काल यह तय करना मुश्किल हो कि असली राजनीतिक दल कौन है, तो आयोग पुराने चुनाव चिन्ह को फ्रीज कर सकता है।

इसका अर्थ है कि विवाद के दौरान दोनों गुट उस निशान का इस्तेमाल नहीं कर सकते। दोनों को अलग-अलग नाम और चुनाव चिन्ह देकर चुनाव प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा सकती है। खासकर चुनाव नजदीक होने पर यह व्यवस्था मतदाताओं के बीच भ्रम रोकने के लिए महत्वपूर्ण होती है। इसलिए फ्रीज को अक्सर अंतिम फैसला नहीं, बल्कि अंतरिम व्यवस्था के रूप में समझना चाहिए।

एआईएडीएमके में ‘दो पत्तियों’ पर विवाद

एमजी रामचंद्रन के निधन के बाद एआईएडीएमके में विभाजन हुआ। एक ओर उनकी पत्नी जानकी रामचंद्रन का गुट था, दूसरी ओर जयललिता का।
दोनों ने पार्टी और लोकप्रिय ‘दो पत्तियों’ चुनाव चिन्ह पर दावा किया। चुनाव आयोग ने विवाद के दौरान इस निशान को फ्रीज कर दिया और दोनों गुटों को अलग-अलग चुनाव चिन्ह दिए।

बाद में राजनीतिक परिस्थितियां बदलीं और पार्टी एकजुट हुई तो ‘दो पत्तियां’ फिर एआईएडीएमके की चुनावी पहचान बन गई। यह उदाहरण बताता है कि किसी निशान का फ्रीज होना उसका हमेशा के लिए खत्म होना नहीं है।

सपा में जंग और ‘साइकिल’ का फैसला

2016-17 में समाजवादी पार्टी में मुलायम सिंह यादव और उनके बेटे अखिलेश यादव के बीच ही नेतृत्व और संगठन पर नियंत्रण को लेकर संघर्ष खुलकर सामने आया। यह पारिवारिक मतभेद से आगे बढ़कर पार्टी के संगठन और नेतृत्व की लड़ाई बन गया। दोनों खेमों ने खुद को असली समाजवादी पार्टी बताया और ‘साइकिल’ चुनाव चिन्ह पर दावा किया।

मामला चुनाव आयोग पहुंचा। आयोग ने पार्टी के संगठनात्मक ढांचे और निर्वाचित प्रतिनिधियों के समर्थन से जुड़े पहलुओं पर विचार किया। 16 जनवरी 2017 को आयोग ने अखिलेश यादव के नेतृत्व वाले गुट को समाजवादी पार्टी का नाम और ‘साइकिल’ चुनाव चिन्ह देने का फैसला किया। सपा का उदाहरण महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे स्पष्ट हुआ कि पार्टी का संस्थापक या सबसे वरिष्ठ नेता होना अपने आप में पुराने चुनाव चिन्ह पर अधिकार की गारंटी नहीं है। संगठन और निर्वाचित प्रतिनिधियों का समर्थन भी अहम हो सकता है।

लोक जनशक्ति पार्टी में ‘बंगला’ हुआ फ्रीज

रामविलास पासवान के निधन के बाद लोक जनशक्ति पार्टी में चिराग पासवान और पशुपति कुमार पारस के बीच संघर्ष हुआ। दोनों पक्षों ने पार्टी के नाम और ‘बंगला’ चुनाव चिन्ह पर दावा किया।

आयोग ने विवाद के दौरान ‘बंगला’ चुनाव चिन्ह को फ्रीज कर दिया और दोनों पक्षों को अलग-अलग नाम और निशान दिए। यह उदाहरण बताता है कि चुनावी प्रक्रिया के करीब होने वाले विवादों में आयोग पहले मतदाताओं के बीच संभावित भ्रम को रोकने की कोशिश कर सकता है।

शिवसेना में पहले फ्रीज, फिर ‘धनुष-बाण’

शिवसेना विवाद चुनाव चिन्ह की राजनीति का सबसे चर्चित हालिया उदाहरण है। उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे के गुटों ने शिवसेना के नाम और ‘धनुष-बाण’ पर दावा किया। आयोग ने शुरुआती चरण में ‘शिवसेना’ नाम और ‘धनुष-बाण’ को फ्रीज कर दिया। दोनों गुटों को अलग-अलग नाम और निशान मिले। उद्धव ठाकरे गुट को ‘मशाल’ चुनाव चिन्ह दिया गया।

बाद में आयोग ने एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गुट को शिवसेना का नाम और ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिन्ह दे दिया। इस मामले से साफ हुआ कि अंतरिम तौर पर मिला नया निशान अंतिम पहचान जरूरी नहीं है। अंतिम फैसला आने पर मूल चुनाव चिन्ह किसी एक गुट को मिल सकता है।

एनसीपी में ‘घड़ी’ का फैसला

2023 में एनसीपी में शरद पवार और अजित पवार के गुट अलग हुए। दोनों ने पार्टी के नाम और ‘घड़ी’ चुनाव चिन्ह पर दावा किया। फरवरी 2024 में चुनाव आयोग ने अजित पवार के नेतृत्व वाले गुट को असली एनसीपी माना और ‘घड़ी’ चुनाव चिन्ह उसके पक्ष में कर दिया। शरद पवार गुट को अलग नाम और नया चुनाव चिन्ह मिला। शिवसेना और एनसीपी दोनों मामलों में मूल सवाल यही था कि विभाजन के बाद किस गुट को राजनीतिक दल की निरंतरता का प्रतिनिधि माना जाए।

क्या बागी गुट को हमेशा नया निशान मिलता है?

नहीं। फैसला केवल इस आधार पर नहीं होता कि कौन ‘बागी’ है और कौन ‘मूल’। आयोग पार्टी के संविधान, संगठनात्मक ढांचे, संबंधित गुट के समर्थन और निर्वाचित प्रतिनिधियों की स्थिति जैसे पहलुओं को देखता है। इसलिए केवल संस्थापक होने या पुराने नेतृत्व का हिस्सा होने का दावा पर्याप्त नहीं होता। इसी तरह केवल विधायकों या सांसदों की संख्या को भी हर मामले में स्वतः अंतिम कसौटी नहीं माना जा सकता। फैसला पूरे मामले और उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर होता है।

2026 में अब वही सवाल, टीएमसी के सामने

चुनाव चिन्ह की यह लंबी कहानी अब 2026 में तृणमूल कांग्रेस के विवाद तक पहुंच गई है। चुनाव आयोग के सामने दोनों पक्षों के दावों की प्रक्रिया जारी है। ममता बनर्जी की ओर से और दस्तावेज या अपना पक्ष रखने के लिए 16 सितंबर की दोपहर तीन बजे तक का समय दिया गया है। जरूरत पड़ने पर 17 सितंबर को दिल्ली में सुनवाई भी हो सकती है। इसलिए अभी किसी अंतिम फैसले की भविष्यवाणी करना जल्दबाजी होगी। लेकिन पिछले विवादों का इतिहास कुछ संभावनाएं जरूर सामने रखता है।

अगर आयोग उपलब्ध संगठनात्मक और प्रतिनिधिक रिकॉर्ड के आधार पर किसी एक गुट को मूल पार्टी मानता है, तो पुराने नाम और चुनाव चिन्ह पर फैसला उसी के पक्ष में जा सकता है। दूसरी स्थिति में, यदि तत्काल फैसला संभव न हो और चुनावी प्रक्रिया सामने हो, तो पुराने चुनाव चिन्ह को फ्रीज कर दोनों पक्षों को अलग-अलग निशान देने जैसी अंतरिम व्यवस्था भी संभव हो सकती है।

यह फिलहाल केवल संभावना है, कोई घोषित फैसला नहीं। लेकिन विधानसभा उपचुनाव की प्रक्रिया को देखते हुए समय बेहद महत्वपूर्ण है। आने वाले दिनों में आयोग की सुनवाई और उसके बाद का फैसला यह तय कर सकता है कि तृणमूल की चुनावी पहचान पुराने नाम और निशान के साथ आगे बढ़ती है या विवाद के समाधान तक कोई अंतरिम रास्ता अपनाया जाता है।

इतिहास का सबसे बड़ा सबक

कांग्रेस से लेकर एआईएडीएमके, सपा, लोक जनशक्ति पार्टी, शिवसेना और एनसीपी तक के विवाद बताते हैं कि चुनाव चिन्ह किसी नेता की निजी संपत्ति नहीं है। कहीं मूल निशान एक गुट को मिला, कहीं पहले फ्रीज हुआ और बाद में फैसला हुआ। हर मामले की परिस्थितियां अलग थीं, लेकिन मूल सवाल एक ही रहा—कौन-सा गुट उस राजनीतिक दल की वास्तविक संगठनात्मक और राजनीतिक निरंतरता साबित कर सकता है?

यही कारण है कि पार्टी टूटते ही नेताओं की नजर विधायकों, सांसदों और संगठन पर होती है, जबकि चुनाव आयोग की नजर उन रिकॉर्ड और दावों पर होती है, जो यह तय कर सकें कि पुराने नाम और पुराने निशान का हकदार आखिर कौन है। दल टूट सकता है, गुट बन सकते हैं, नेतृत्व बदल सकता है—लेकिन चुनावी मैदान में सबसे बड़ा सवाल अक्सर यही रहता है: ‘निशान किसका?’

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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