लेकिन अब सवाल उठता है कि क्या भारत के लिए वर्ल्ड कप में पाकिस्तान का बॉयकॉट करना इतना आसान होगा। सवाल का जवाब मिलता है दिग्गज टेस्ट बल्लेबाज रहे, भाजपा नेता और अब उत्तर प्रदेश में खेल मंत्री का दायित्व संभाल रहे चेतन चौहान से। चौहान के मुताबिक एक अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट में किसी मुकाबले का बहिष्कार आसान नहीं है। खेल के मैदान में राजनीति का बल्ला भांज रहे लोगों को चौहान चेताते हैं, 'वैश्विक स्पर्द्धाओं के अपने कुछ नियम होते हैं और इनमें कई देश हिस्सा लेते हैं। अगर हम ऐसा करते हैं, तो इसके परिणाम भी हमें भुगतने होंगे। इसके चलते हम पर प्रतिबंध या जुर्माना भी लगाया जा सकता है। मैं मानता हूं कि सरकार और बीसीसीआई इसे भी ध्यान में रखेगी।'
चौहान के उलट केंद्रीय विधि मंत्री रविशंकर प्रसाद ने पाकिस्तान के खिलाफ तय विश्व कप मैच के बहिष्कार के लिए उठ रही आवाजों में अपना सुर भी जोड़ दिया है। प्रसाद का कहना था कि इस मांग में कुछ दम तो है। आप देख रहे हैं कि फिल्म, शो और कंसर्ट आदि रद्द किए जा रहे हैं। इन दिनों हालात सामान्य नहीं है। मंत्री जी के बयान से सरकार के मूड का इशारा तो मिलता ही है। उधर, राजीव शुक्ला ने भी तो जता ही दिया है कि सरकार कहे तो बीसीसीआई भी पाकिस्तान के खिलाफ मैच खेलने से इंकार करने को तैयार है।
वैसे हम खेल भावना की कितनी भी दुहाई दे लूं लेकिन यह सच है कि राजनीति और जंगों ने ओलंपिक जैसे आयोजनों को भी समय-समय पर न केवल रोका है बल्कि राजनीतिक आधार पर राष्ट्र विशेष के खिलाड़ियों को इन में भाग लेने से रोका गया और कई देश इनका बहिष्कार भी कर चुके हैं। प्रथम विश्व युद्ध के कारण 1916 के बर्लिन ओलंपिक रद्द करने पड़े तो इस जंग में बुरी तरह मुंह की खाने वाले जर्मनी को 1920 और 1924 के आयोजनों से बाहर ही कर दिया गया। खेल में राजनीति का सिलसिला कोई थमना तो था नहीं, सो जंग की तैयारी कर रहे जापान ने 1940 का ओलंपिक कराने से मना कर दिया।
हेलसिंकी नए मेजबान के तौर पर चुना गया तो द्वितीय विश्व युद्ध ने इस खेल को भी खत्म कर दिया। 1944 के लंदन ओलंपिक का भी इसी महायुद्ध ने काम तमाम कर दिया। ईश्वर की दया से तीसरा विश्व युद्ध तो कभी हुआ नहीं लेकिन इन आयोजनों पर दुनिया की दो महाशक्तियों अमेरिका और रूस के शीत युद्ध की छाया जरूर पड़ती रही। 1980 के मॉस्को ओलंपिक का अमेरिका समेत अधिकतर पश्चिमी देशों ने बहिष्कार किया तो 1984 के लास एंजेलिस ओलंपिक में न जाकर सोवियत ब्लॉक के देशों ने हिसाब चुकता कर लिया।
हम रंगभेदी युग के दक्षिण अफ्रीका के बॉयकॉट को भी तो नहीं भूल सकते। लगभग हर खेल संघ ने 1950 के दशक से 1991 तक दक्षिण अफ्रीका को कभी न कभी अपने कैलेंडर से अलग ही रखा। क्रिकेट में ही 1970 से शुरू दक्षिण अफ्रीका का बहिष्कार 1991 में भारतीय टीम के दौरे के साथ ही खत्म हुआ था। अब भी सुरक्षा कारणों से कई देशों के इंकार की वजह से पाकिस्तान, अफगानिस्तान, इराक और सीरिया जैसे अशांत देशों में कोई बड़ा अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजन लंबे समय से संभव नहीं हुआ है। स्पष्ट ही कोई भी खेल संघ खिलाड़ियों की सुरक्षा दांव पर लगाने की कीमत पर किसी टीम को कहीं भी खेलने को बाध्य तो नहीं कर सकता।
...लेकिन ...लेकिन ...लेकिन, क्या हम इंग्लैंड में होने जा रहे क्रिकेट विश्व कप में किसी टीम के खिलाफ न खेलने के लिए राजनीतिक तनाव या सुरक्षा को कारण बता सकते हैं? लगता तो नहीं। आईसीसी ने दो टूक कह दिया है कि 30 मई से शुरू विश्व कप के कार्यक्रम में किसी तरह के बदलाव की कोई गुंजाइश नहीं है। आईसीसी के मुख्य कार्यकारी डेविड रिचर्डसन के मुताबिक ऐसा कोई संकेत या संभावना नहीं है कि विश्व कप का कोई मैच तय कार्यक्रम के मुताबिक नहीं होगा।
मतलब साफ है कि 16 जून को भारत को पाकिस्तान के खिलाफ मैच तो खेलना ही पड़ेगा। ऐसे में स्पष्ट है कि पाकिस्तान के खिलाफ मैच न खेलने की सूरत में भारत को दिक्कत तो होने ही वाली है। कोई सदस्य देश भले कितना ही दबंग हो, विश्व क्रिकेट निकाय को मुंह दिखाने के लिए ही सही कोई कार्रवाई तो करनी ही पड़ेगी। जाहिर है भारत को इस संबंध में कोई भी कदम बेहद समझबूझ के साथ ही उठाना चाहिए।