फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

‘मांझी’ और ‘चिराग’ के बीच क्या मोड़ लेगा ‘क्रीमी लेयर’ का संघर्ष ?

सार

इसके विरोध में लोक जनशक्ति पार्टी के नेता और केन्द्रीय मंत्री चिराग पासवान ने चुनौती के अंदाज में कहा कि अगर मांझी दलित आरक्षण में क्रीमी लेयर लाना चाहते हैं तो पहले पद से इस्तीफा दें।
विज्ञापन
चिराग पासवान और जीतन राम मांझी। - फोटो : Amar Ujala
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

देश में जातिवार जनगणना कैसी हो रही है, इसके अंतिम आंकड़े केन्द्र सरकार जारी करेगी या नहीं या फिर इसके राजनीतिक लाभ-हानि के मद्देनजर ‘उचित समय’ पर करेगी,  ये तमाम बातें अभी अटकलों के दायरे में ही हैं, लेकिन जातिवाद का गढ़ समझे जाने वाले बिहार में दलितों में सरकारी नौकरियों के लिए ‘क्रीमी लेयर’ की शर्त लागू करने अथवा न करने को लेकर नया राजनीतिक संघर्ष शुरू हो गया है।

विज्ञापन


इसे नियम को लागू करने की मांग और विरोध करने वाले दोनो ही दल सत्तारूढ़  एनडीए के घटक हैं और दोनो के ही नेता दलित हैं। हिंदुस्तानी अवाम पार्टी (सेक्युलर) के नेता और केन्द्रीय मंत्री जीतनराम मांझी ने अनुसूचित जाति श्रेणी में आरक्षण के लिए ओबीसी की तर्ज पर क्रीमी लेयर की शर्त जोड़ने की मांग की है ताकि आरक्षण का लाभ उन दलित जातियों तक भी पहुंचे, जो अब तक इससे वंचित रही हैं।

इसके विरोध में लोक जनशक्ति पार्टी के नेता और केन्द्रीय मंत्री चिराग पासवान ने चुनौती के अंदाज में कहा कि अगर मांझी दलित आरक्षण में क्रीमी लेयर लाना चाहते हैं तो पहले पद से इस्तीफा दें।
विज्ञापन


उन्होंने बिहार सरकार में मंत्री और जीतनराम के बेटे संतोष सुमन पर भी हमला बोलते हुए कहा कि आरक्षण का आधार सामाजिक भेदभाव और छुआछूत है, न कि आर्थिक। अगर क्रीमी लेयर जैसे मुद्दे पर बात करनी है तो चर्चा संसद में हो। उधर संतोष सुमन का तर्क है कि उनकी मांग आरक्षण समाप्त करने की नहीं, बल्कि कोटे में कोटा लागू करने और आरक्षण का लाभ सर्वाधिक वंचित समुदायों तक पहुंचाने की है।

इसके पहले संतोष सुमन ने सवाल उठाया था कि अगर पिछड़े वर्ग में ‘अति पिछड़ा’ और सामान्य वर्ग में ‘ईडब्लूएस’ की अलग व्यवस्था है तो एससी वर्ग के भीतर सबसे वंचित समूहों की पहचान क्यों नहीं की जा सकती?

क्रीमी लेयर पर मचे इस घमासान पर एनडीए की सबसे बड़ी घटक पार्टी भाजपा खामोश है। अलबत्ता इस विवाद में कूदते हुए राजद नेता तेजस्वी यादव ने कहा कि नीतीश कुमार, उपेंद्र कुशवाहा, चिराग पासवान और जीतन राम मांझी की पार्टियों की आरक्षण को लेकर स्पष्ट विचारधारा क्या है, यह कोई नहीं जानता। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा आरक्षण खत्म करने के विचार की पब्लिक टेस्टिंग कर रही है।

लंबे अर्से बाद में देश में आरक्षण खत्म करने या उसकी समीक्षा करने तथा आरक्षित श्रेणियों में भी क्रीमी लेयर नियम लागू करने का मुद्दा नए सिरे से गरमा रहा है। इसमें पेंच यह है कि क्रीमी लेयर पर आरक्षित जातियों में ही इस बात पर तलवारें खिंची हैं कि आरक्षण का लाभ किस जाति को कितना मिला और कौन कितना वंचित रहा। उधर ‘हिंदू एकता’ की बात करने वाली भाजपा के सामने यह सिर्फ आरक्षण के औचित्य पर बहस भर नहीं बल्कि जटिल राजनीतिक चुनौती है। इस मामले में वह असमंजस की स्थिति में है। 

सवाल है कि जीतनराम मांझी ने आरक्षित अनुसूचित जाति वर्ग में भी ‘क्रीमी लेयर’ का मुद्दा क्यों उछाला? इसके पीछे राजनीतिक मकसद क्या है? क्या यह सिर्फ आरक्षित जातियों में समाजार्थिक समता तक सीमित है अथवा यह आरक्षित वर्ग में ही वर्चस्व की लड़ाई है? इस लड़ाई के दूरगामी परिणाम क्या होंगे? क्या इसकी गूंज अन्य राज्यों में भी होगी? आरक्षण में निहित मूल भाव सामाजिक समता और अवसरों की समानता का क्या होगा? कहीं यह संघर्ष राजनीतिक छीना झपटी में तो नहीं बदल जाएगा? 

इसके पहले बिहार में आरक्षित अनुसूचित जातियों के गणित को समझना होगा। बिहार में पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के जमाने में दलितों को समाजार्थिक उत्थान के िहसाब से दो श्रेणियों दलित और महादलित में बांटा गया था। इसमें पासवान जाति को छोड़कर बाकी 21 जातियों को ‘महादलित’ घोषित किया गया था, जिसमें जीतनराम मांझी की मुसहर जाति भी है। 2014 में नीतीश ने पार्टी में भीतरी बगावत रोकने के लिए सीएम पद से इस्तीफा देकर महादलित जीतनराम मांझी को सीएम बना दिया था और नौ माह बाद हटा भी दिया था।

इससे नाराज जीतनराम ने जद (यू) छोड़ अपनी नई हिंदुस्तानी अवाम पार्टी बना ली। बिहार में दलितों की जनसंख्या करीब 16 फीसदी है। राज्य में महादलित मुसहर जाति की कुल संख्या करीब 40 लाख बताई जाती है, जो कि बिहार की आबादी का लगभग 3.08 फीसदी है। यह राज्य की तीसरा सबसे बड़ा एससी समूह है।

जबकि पासवान जाति की संख्या करीब 70 लाख बताई जाति है, जो राज्य की कुल आबादी  का 5.31 फीसदी हैं। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक बिहार में अनुसूचित जाति वर्ग में नौकरियों में आरक्षण का सर्वाधिक लाभ पासवान, रविदासी और धोबी जाति ने उठाया है। 

इसका एक कारण इन जातियों का तुलनात्मक रूप से ज्यादा संगठित और राजनीतिक रूप से मुखर होना भी है। जीतनराम का मानना है कि क्रीमी लेयर नियम लागू होने पर बाकी की अनुसूचित जातियों की नौकरियो और िशक्षा में हिस्सेदारी बढ़ सकेगी।

जहां तक आरक्षित श्रेणियों में क्रीमी लेयर लागू करने की बात है तो सुप्रीम कोर्ट ने 1 अगस्त 2024 को दिए अपने ऐतिहासिक फैसले में राज्यों को एससी/ एसटी श्रेणियों के भीतर उप वर्गीकरण (सबकोटा लागू करने) की अनुमति दी थी तथा आर्थिक रूप से सम्पन्न दलितों को आरक्षण के दायरे से बाहर करने का सुझाव दिया था। तब सीजेआई जस्टिस बी.आर. गवई थे, जो स्वयं दलित समुदाय से थे।

उनका यह फैसला व्यापक संदर्भ में था। हालांकि मोदी सरकार ने इस फैसले के राजनीतिक खतरों को भांपकर सुप्रीम कोर्ट में दिए अपने हलफनामे में एससी/एएसटी आरक्षण में आय आधारित ‘क्रीमी लेयर’ नियम लागू करने का विरोध किया।

गौरतलब है कि सरकारी नौकरियों और शिक्षा में पिछड़े वर्ग के लिए ‘क्रीमी लेयर’ नियम लागू है, जिसके तहत विभिन्न स्रोतों से 8 लाख रू. तक की वार्षिक आय वाले परिवार को क्रीमी लेयर माना जाता है। लेकिन एससी/एसटी में इसे लागू करने के खिलाफ वो सभी प्रभुत्वशाली आरक्षित जातियां हैं, जिन्हें आरक्षण से तुलनात्मक रूप से खासा फायदा हुआ है।

हालांकि भाजपा शासित हरियाणा देश का ऐसा पहला ऐसा राज्य है, जिसने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद अपने यहाँ ग्रुप ‘ए’ और ‘बी’ की सरकारी नौकरियों में अनुसूचित जाति वर्ग के आरक्षण में 'कोटे के भीतर कोटा' लागू करने को मंजूरी दी। लेकिन कानूनी और व्यावहारिक पेचीदगियों के कारण सरकार ने इसके अमल पर रोक लगा दी। 

अब सवाल यह है कि जब मांझी और चिराग दोनो ही बिहार में महादलित जातियों से आते हैं तो फिर यह लड़ाई क्यों? चिराग एससी में क्रीमी लेयर का विरोध इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि अगर सच में ऐसा हुआ तो उनकी जाति की नौकरियों और शिक्षा में हिस्सेदारी कम हो सकती है। 

जबकि मांझी का मानना है कि अत्यंत पिछड़ी और वंचित दलितों के उत्थान की खातिर उन दलितों को त्याग की उदारता दिखानी चाहिए, जो पहले ही आरक्षण का लाभ ले चुके हैं, िजनका आर्थिक उन्नयन हो चुका है और जो दूसरी-तीसरी पीढ़ी तक इसका फायदा उठाते आ रहे हैं। यानी कहीं तो आरक्षण की मर्यादा तय हो। या यूं कहें कि जो जो जाति आरक्षण का लाभ लेकर उन्नत होती जाए, वह अपने इस लाभ को सीमित करे। 

लेकिन इन सब के पीछे असल लड़ाई महादलितों का एकछत्र नेता बनने और अपनी जाति के राजनीतिक सामाजिक वर्चस्व को कायम रखने और उसे बढ़ाने की है। हकीकत में ‘क्रीमी लेयर’ के समर्थन और विरोध की यह लड़ाई भी परिवारवाद में पगी है। चाहे मांझी हो या चिराग, सत्ता की रेवड़ी बांटने की बात आती है तो किसी को भी अपने खानदान से परे कुछ नहीं दिखाई देता। बिहार का अनुसचित जाति आयोग इसका पुख्ता प्रमाण है, जहां अध्यक्ष चिराग पासवान के बहनोई हैं तो उपाध्यक्ष जीतनराम के दामाद हैं।  

बहरहाल ये  तो शुरूआत भर है और लड़ाई सड़कों तक नहीं आई है। लेकिन आरक्षण की यह लड़ाई अवसरों को झपटने की लड़ाई भी है। यही कारण है कि आरक्षित वर्ग तो दूर, सामान्य वर्ग की जातियां भी किसी तरह आरक्षित श्रेणी में शामिल होना चाहती हैं।

जरा सोचिए कि यदि केन्द्र सरकार ने जाति जनगणना के बाद अगर उसके आंकड़े सार्वजनिक कर दिए तो जातियों के बीच  वर्चस्व और अवसरों की छीनाझपटी का यह आंतरिक संघर्ष क्या मोड़ लेगा? हालांकि क्षुद्र सत्ता स्वार्थ के लिए सियासी पार्टियां किसी भी हद जा सकती हैं। लेकिन इस आंतरिक घमासान से देश का जो नुकसान होगा, उसकी भरपाई न तो कोई ‘मांझी’ कर पाएगा और न ही कोई ‘चिराग।‘

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें