आज कुदरत के कानून के आगे मानव बेबस हो गया है। प्राणदायी प्रकृति ने इंसान को आईना दिखा दिया है। प्रकृति की वेदना को संवेदनहीन व धनलिप्सा में डूबा मानव दरकिनार कर रहा है, मगर प्रकृति ने अंधे हो चुके मानव की आंखे खोल दी है।
मानव से दानव बन चुके कलयुगी मानव को संयम व सबक सिखा दिया है। जीवन ठहर गया है। प्रकृति एक ऐसी देवी है जो भेदभाव नहीं करती। प्रकृति के बिना मानव प्रगति नहीं कर सकता, प्रत्येक मानव को बराबर धूप व हवा व पानी दे रही है।
मानव कृतध्न बनता जा रहा है। मानव ने स्वार्थो की पूर्ति के लिए प्रकृति को लहूलुहान किया है। आज प्रकृति ने अपना बदला ले लिया है। तबाही की इबारत लिख दी है। मानव का अहम मिटाकर रख दिया है। गलतफहमियों में जी रहे मानव आज प्रकृति के आगे नतमस्तक हो चुके हैं।
अतीत में की गए कुकर्मो का पश्चाताप कर रहे हैं। प्रकृति ने मानव को समय पर आगाह किया, मगर इंटरनेट की दुनिया के जाल में फंसा मानव खुद को प्रकृति से बड़ा माने लगा था। उसे यह आभास नहीं था कि प्रकृति सबसे बड़ी गुरु है।
प्रकृति ने बहुत कुछ सहा है। चारों तरफ गंदगी है, वातावरण अशुद्ध हो गया है। वातवरण कि शुद्धि के लिए प्रकृति मजबूर हो गई और मगरुर हो चुके इंसान का गुरुर तोड़ कर रख दिया है।
अनजाने में हुई भूल को माफ किया जा सकता है, मगर जानबूझकर की गई गलतियों की सजा प्रकृति ने मानव को दे दी है। मानव को जीवन और मौत की परिभाषा सिखा दी है।
यह प्रलय की आहट है। कुदरत ने भटक चुके मानव को पाप और पुण्य का अंतर समझा दिया है। प्रकृति का एक संदेश है भटक चुके व अहंकारी इंसान के लिए जो कुदरत से खिलवाड़ करता था।
लॉकडाउन प्रकृति के लिए वरदान है और मानव के लिए अभिशाप बन गया है। मानव ने प्रकृति के दामन को मैला करने की गुस्ताखी करके अपने पैरों पर खुद ही कुल्हाड़ी मारी है। प्रकृति को अपने खिलाफ होने का निमंत्रण दिया है। किए की सजा को भुगतना ही पड़ेगा।
आज हवा में प्रदूषण नहीं है, वातावरण शुद्ध हो गया है। पक्षियों व जंगली जानवरों के झुंड शहरों में चहलकदमी कर रहे हैं, क्योंकि आज मानव पिंजरे में कैद हो गया है। खुली हवाओं में सांस ले रहे हैं। आसमान साफ है, रात को तारे टिमटमाते दिख रहे हैं।
बर्फ के पहाड़ दिख रहे हैं। नदियां,झरने और तालाबों का पानी साफ हो चुका है। निडर होकर जंगल के राजा शेर व अन्य हाथी, हिरन व भालू सड़कों पर आराम कर रहे हैं।
लॉकडाउन से कानफोडू बसों व रेलों के हार्न बंद हो चुके हैं। करोड़ों के हिसाब से प्रदूषण फैलाने वाले बाहनों के पहिए थम गए हैं। प्रकृति क्या नहीं कर सकती, वो स्वतत्रं है।
मानव ने उसे बेड़ियों में बांधने की नापाक कोशिशें की है, मगर प्रकृति ने रौद्र रुप दिखाया तो मानव एक जगह घर में स्थिर हो गया है और अपने भाग्य को कोस रहा है।
एक मिनट बर्बाद न करने वाला मानव आज चुपचाप प्रकृति की मार झेल रहा है। चौबीसों घंटे माया के लिए भागदौड़ करने वाला व व्यस्त रहने वाला इंसान आज चाहरदीवारी में आराम से बैठ गया है।
प्रकृति आज खुश है कि उसे जख्म देने वाला बिलख रहा है, सिसक रहा है, बाहर जाने को आतूर है, छटपटाह रहा है, घुट रहा है। मगर अभी समय लगेगा।