फ्लोरिडा की क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. रेचल नीडल बताती हैं कि उनके थेरेपी सेशन के दौरान कई मरीज कहते हैं कि वे अलग-अलग बातों से ‘ट्रिगर’ हो जाते हैं। कभी कोई छोटी-सी रोजमर्रा की समस्या उन्हें परेशान कर देती है, तो कभी किसी पुराने दर्दनाक अनुभव की याद अचानक उभर आती है। डॉ. नीडल का कहना है कि जिन परिस्थितियों को लोग ‘ट्रिगर’ कहते हैं, वे दरअसल इतनी अलग-अलग और व्यापक हैं कि इस शब्द का असली मतलब खो सा गया है।
ब्राउन यूनिवर्सिटी की क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. याएल शोनब्रुन के अनुसार, ‘ट्रिगर’ जैसे मनोवैज्ञानिक शब्दों का इस्तेमाल करने से शर्म व झिझक कम हो सकती है, और लोगों को अपनी भावनाओं तथा अनुभवों को व्यक्त करने में आसानी होती है। मनोविज्ञान में ‘ट्रिगर’ शब्द का संबंध अक्सर ट्रॉमा (गहरे सदमे) से जोड़ा जाता है। पर, आजकल इसका इस्तेमाल केवल मानसिक आघात या मनोवैज्ञानिक समस्याओं तक सीमित नहीं रह गया है। अब लोग रोजमर्रा में परेशान, नाराज या असहज करने वाली बातों के लिए भी इस शब्द का व्यापक इस्तेमाल करने लगे हैं।
डॉ. नीडल के अनुसार, हर असहज या अप्रिय अनुभव को ‘ट्रिगर’ कह देने से लोग सामान्य बेचैनी या तनाव को भी खतरा मानने लगते हैं और कठिन परिस्थितियों, निराशा या असहज अनुभवों को सीखने, समझने तथा मजबूत बनने के अवसर के रूप में देखने के बजाय उन्हें नुकसान पहुंचाने वाली घटनाओं की तरह देखते हैं। डॉ. शोनब्रुन का मानना है कि इस शब्द का अत्यधिक उपयोग रिश्तों और संवाद पर भी नकारात्मक असर डाल सकता है।
डॉ. लिसा डामोर बताती हैं कि जब वह किसी को यह कहते सुनती हैं कि लोगों का झूठ बोलना उसे ‘ट्रिगर’ करता है, तो वह शांतिपूर्वक पूछती हैं कि मुझे इसके बारे में थोड़ा और बताइए। यह सवाल व्यक्ति को अपनी भावनाओं और अनुभवों को अधिक गहराई से समझाने का अवसर देता है। वहीं, डॉ. रेचल के मुताबिक, ‘मैं ट्रिगर हो गया’ कहने के बजाय कोई व्यक्ति कह सकता है, ‘इस बात ने मुझे निराश किया’, या ‘इसने मुझे बुरे अनुभव की याद दिला दी।’ इस तरह की भाषा अधिक सटीक, उपयोगी और संवाद को बेहतर बनाने वाली होती है। इससे लोग समझ पाते हैं कि उस व्यक्ति कोे किस बात से परेशानी हुई और उसे किस तरह के सहयोग या समझ की आवश्यकता है।