“बीती दो मई को चुनाव का नतीजा निकलने के बाद ही टीएमसी कार्यकर्ताओं ने हम लोगों पर अत्याचार शुरू कर दिया था। गांव में भाजपा समर्थकों के कई घरों में उन लोगों ने जमकर मारपीट और लूटपाट की। भाजपा के ज्यादातर समर्थक आतंक से डरकर गांव छोड़कर चले गए। पुलिस में शिकायत का भी कोई असर नहीं हुआ। आखिर में हम माफी मांग कर दोबारा टीएमसी में शामिल हो गए हैं। ऐसा न करने की स्थिति में हमारी घर वापसी संभव नहीं थी।” यह कहना है बीरभूम जिले के नानूर इलाके के एक गांव में रहने वाले सुप्रकाश मंडल (बदला हुआ नाम)। मंडल गांव के करीब 67 परिवारों के साथ हाल में भाजपा से टीएमसी में लौटे हैं। इनमें से कुछ लोगों ने तो बाकायदा सड़क पर सरेआम लाउडस्पीकर के जरिए माफी भी मांगी थी।
हुगली जिले के धनियाखाली का बाप्पा कर का मामला भी कुछ ऐसा ही है। बीती दो मई से ही उनकी मोबाइल की दुकान बंद थी। अब सार्वजनिक रूप से माफी मांगने के बाद टीएमसी के स्थानीय नेताओं ने उनको माफ करते हुए दुकान खोलने की अनुमति दी है। हालांकि बाप्पा का दावा है कि उन्होंने खुद अपनी दुकान बंद कर रखी थी। लेकिन उनके पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं है कि आखिर टीएमसी से अपनी गलतियों की माफी मांगने के अगले दिन ही दुकान खुल कैसे गई। जाहिर है वे पानी में रह कर मगरमच्छ से बैर नहीं करना चाहते।
पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली उसकी सरकार सब कुछ ठीक होने का चाहे कितना भी दावा करे, राज्य के खासकर ग्रामीण इलाकों में जमीनी तस्वीर अलग है। ऊपर लिखी यह दोनों घटनाएं इसका सबसे बड़ा सबूत हैं।
यह सही है कि भाजपा इन मामलों को मिर्च-मसाला लगा कर उछाल रही है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष का दावा है कि अब भी एक हजार से ज्यादा पार्टी समर्थक घर छोड़ कर दूसरी जगह पर रह रहे हैं और अब तक 37 लोगों की हत्या हो चुकी है। विपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी भी यही आरोप लगाते हैं। उन्होंने इस मुद्दे पर सोमवार को राजभवन में राज्यपाल जगदीप धनखड़ से भी मुलाकात की। उसके बाद राज्यपाल ने कानून व व्यवस्था के मुद्दे पर सरकार को कठघरे में खड़ा करते हुए कहा कि राज्य में लोकतंत्र सांस नहीं ले पा रहा है। मुख्यमंत्री और प्रशासन मूक दर्शक बने हुए हैं।
दरअसल, विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद राज्य में जिस तरह हिंसा फैली और उस पर टीएमसी और भाजपा ने जैसे अलग-अलग दावे किए, उससे जमीनी परिस्थिति का अनुमान लगाना आसान नहीं है। हिंसा हुई, यह तो साफ है। लेकिन साथ ही यह भी सही है कि जिसकी लाठी उसकी भैंस की तर्ज पर दोनों दल इससे पीछे नहीं रहे। हालांकि भाजपा ने इसे आत्मरक्षा की गई कार्रवाई बताया है। इसके अलावा फर्जी वीडियो और तस्वीरों के जरिए हिंसा की इस आग में घी डालने का भी काम हुआ। मिसाल के तौर पर बीरभूम में दो भाजपा कार्यकर्ताओं के साथ गैंगरेप के आरोप लगाए गए। लेकिन अगले दिन ही पुलिस और उन दोनों महिलाओं ने भी इसका खंडन कर दिया। इसके अलावा दिल्ली के एक पत्रकार को कूचबिहार जिले की हिंसा में मृत भाजपा कार्यकर्ता बताया गया। उस युवक ने फौरन इसका खंडन कर दिया।
अब ताजा मामले में बंगाल की दो महिलाओं ने टीएमसी कार्यकर्ताओं पर गैंगरेप का आरोप लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट में शरण ली है। इससे पहले बीते महीने भी हिंसा में मृत दो भाजपा कार्यकर्ताओं के परिजनों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। उसमें कहा गया था कि हिंसा की वजह से बड़े पैमाने पर लोगों का विस्थापन हुआ है। लेकिन राज्य सरकार ने अपने हलफनामे में इन आरोपों को निराधार बताते हुए उक्त याचिका को राजनीति से प्रेरित बताया है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का दावा है कि राज्य में बीते महीने हिंसा का जो छिटपुट घटनाएं हुई थीं, उन पर अंकुश लगाया जा चुका है। सरकार को लोगों के विस्थापन की कोई जानकारी नहीं है।
चुनाव नतीजे के करीब डेढ़ महीने बाद भी हिंसा के मुद्दे पर दोनों राजनीतिक दलों में आरोप-प्रत्यारोप जारी हैं। इसमें सबसे सशक्त भूमिका राज्यपाल जगदीप धनखड़ निभा रहे हैं। वे बिना नागा रोज इस मुद्दे पर सरकार, पुलिस और प्रशासन की खिंचाई करने से बाज नहीं आते।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि अबकी बार दो सौ पार के नारे से साथ मैदान में उतरी भाजपा अब हिंसा के मुद्दे को जीवित रखना चाहती है और इसे टीएमसी के खिलाफ एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करना चाहती है। एक पर्यवेक्षक समीरन पाल कहते हैं, “यह सही है कि हिंसा हुई है। लेकिन ऐसा भी नहीं है जैसा भाजपा दावे कर रही है। जहां तक ग्रामीण इलाकों की बात है, वहां राजनीतिक हिंसा का इतिहास बहुत पुराना रहा है। कांग्रेस के अलावा लेफ्ट के शासनकाल के दौरान भी हिंसा होती रही है और अब टीएमसी का कार्यकाल भी कोई अपवाद नहीं है।”