पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी
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यदि इस टूट और बिखराव के लिए किसी एक व्यक्ति को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश की जाए, तो आरोपों का केंद्र अभिषेक बनर्जी बनते हैं। उनकी कार्यशैली को लेकर पार्टी के अनेक वरिष्ठ नेता सहज नहीं थे। ममता बनर्जी का प्रभाव और प्रशासनिक कार्रवाई का भय असंतोष को दबाए हुए था। सत्ता से बेदखली के साथ ही यह भय समाप्त हो गया और वर्षों से जमा असंतोष बाहर आने लगा।
सत्ता गंवाने के 48 घंटे के भीतर ममता बनर्जी ने अपने आवास पर विधायकों की बैठक बुलाई। बताया जाता है कि 80 विधायकों में से केवल 19 विधायक ही पहुंचे। 2 जून के धरना-प्रदर्शन में भी 120 जनप्रतिनिधियों में से मात्र 14 की उपस्थिति दर्ज हुई। 29 लोकसभा सांसदों में केवल 2 और 13 राज्यसभा सांसदों में केवल 4 सांसद मौजूद थे। यह उपस्थिति स्वयं संगठन की मौजूदा स्थिति का संकेत देती है।
यह घटनाक्रम पहली नजर में महाराष्ट्र की राजनीति जैसा दिखाई देता है, लेकिन दोनों परिस्थितियों में मूलभूत अंतर है। महाराष्ट्र में दल-बदल का उद्देश्य सत्ता में भागीदारी हासिल करना था, जबकि पश्चिम बंगाल में भाजपा स्पष्ट बहुमत के साथ सत्ता में है। ऐसे में टूटकर अलग होने वाले नेताओं के सामने तत्काल सत्ता प्राप्ति का अवसर नहीं, बल्कि विपक्षी राजनीति की भूमिका है।
ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी की नजर में इस घटनाक्रम के प्रमुख सूत्रधार ऋतोब्रत्तो बंदोपाध्याय हो सकते हैं, लेकिन असली प्रश्न इससे कहीं बड़ा है। इतनी बड़ी संख्या में विधायक और नेता क्यों अलग हुए? अल्पसंख्यक समुदाय के विधायक भी इस प्रक्रिया में क्यों शामिल हुए? अभिषेक बनर्जी के करीबी माने जाने वाले नेता भी क्यों दूर हो गए?
इन सवालों का सबसे बड़ा उत्तर शायद यही है कि पार्टी के भीतर संवाद और असहमति की गुंजाइश लगातार कम होती गई। निर्णय प्रक्रिया कुछ व्यक्तियों तक सीमित होती चली गई। जब कार्यकर्ताओं और नेताओं को अपनी बात रखने का अवसर नहीं मिलता, तब संगठन धीरे-धीरे राजनीतिक दल से अधिक एक नियंत्रित संरचना में बदल जाता है। और ऐसी संरचनाओं का बिखराव अक्सर अचानक नहीं, बल्कि लंबे समय से जमा असंतोष का परिणाम होता है।
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