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बंगाल चुनाव: हिंसा के बीच शांति की आस और नई सरकार का गठन

सार

बंगाल में चुनाव बाद भड़की हिंसा को नियंत्रित कर रामराज स्थापित करने की बड़ी चुनौती है। नई सरकार 9 मई को शपथ लेगी। उम्मीद की जाए कि मां की माटी सियासी रंजिश में फिर लहूलुहान न हो।
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पश्चिम बंगाल के बनगांव में पीएम मोदी की रैली - फोटो : X @BJPLive
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विस्तार
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बंगाल जल उठा है। चुनाव बाद चिंगारी फिर भड़क गई है। मां-मानुष वाली माटी लहूलुहान है। हिंसा, फायरिंग, आगजनी की घटनाओं ने लोकतंत्र को शर्मसार कर दिया है। जनादेश के बाद ममता बनर्जी ने मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा न देने का एलान कर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को चुनौती दे डाली है। संवैधानिक शीर्ष पद पर बैठीं मुख्यमंत्री ममता ने ही संवैधानिक संस्थानों और प्रक्रियाओं पर सवाल खड़े कर दिए हैं। ऐसे में बंगाल में चुनाव बाद उपद्रव बहुत हैरान करने वाला नहीं, लेकिन निंदनीय जरूर है। हिंसक घटनाओं के बीच बंगाल में रामराज बहाल करना नई सरकार के लिए बड़ी चुनौती साबित होने वाला है।

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बंगाल में चुनाव बाद हिंसा का यह कोई पहला वाकया नहीं है। अतीत दागदार रहा है। शुरू में तीन दशक तक वहां कांग्रेस का राज रहा। 1977 में जब पहली बार वाम मोर्चे ने कांग्रेस के हाथ से कुर्सी हथिया कर सत्ता के गलियारे में लाल झंडा गाड़ा, तब भी बंगाल की माटी खून से लाल हुई थी।

चुनाव बाद की हिंसा में वाम-कांग्रेस समर्थक आपस में खूब भिड़े। खूनखराबे में कई जानें गईं। फिर 1977 से 2011 तक करीब 34 वर्षों तक राज करने वाले वाम मोर्चे को जब तृणमूल कांग्रेस ने गद्दी से उतारा तो त्रिकोणीय संघर्ष (कांग्रेस, वाम, तृणमूल समर्थकों के टकराव) का दौर शुरू हुआ। 2011 से 2016 के पांच वर्षों के तृणमूल राजकाज में 180 से ज्यादा राजनीतिक कार्यकर्ताओं की हत्याएं हुईं।
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2021 आते-आते जब तृणमूल कांग्रेस के लिए भाजपा चुनौती साबित होने लगी, तब भी 29 हत्याएं और दुष्कर्म की 12 घटनाएं हुईं। इन हिंसक घटनाओं की ज्यादा वजह राजनीतिक रंजिश ही रही। 2021 आते-आते बंगाल में मानवाधिकार से जुड़ी 10,900 शिकायतें आईं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों पर यदि गौर फरमाएं तो ममता के 15 साल के राज में 75 लोग राजनीतिक हिंसा के शिकार हुए।

भाजपा के कई कार्यकर्ता इन 15 वर्षों में मारे गए। ऐसा नहीं कि केवल राज्य सत्ता परिवर्तन के दौर में ही बंगाल की माटी ने हिंसा झेली। 2008 में पंचायत चुनाव के दौरान भी और नंदीग्राम-सिंगूर आंदोलन में भी 45 लोगों को जान गंवानी पड़ी। 2009 के लोकसभा चुनाव में भी जंगलमहल इलाके में कांग्रेस, वाम, तृणमूल समर्थकों के त्रिकोणीय सियासी संघर्ष में 15 लोगों की जान गई। और अब 2026 में चुनाव नतीजे के तुरंत बाद भड़की हिंसा में अब तक तीन लोगों की जान जा चुकी है। दफ्तर फूंके गए। फायरिंग हुई। जवान घायल हुए। लोकतंत्र फिर कराह रहा है।

यह अंदेशा तो था ही

ऐसा नहीं कि हिंसा का यह अंदेशा पहले नहीं था। गृह मंत्री अमित शाह ने चुनाव के दौरान जब एक पखवाड़े तक बंगाल में प्रवास किया, तब वहां वर्षों से उपजे भय को भरोसे में बदलने के लिए कहा था। बंगाल में चुनाव के बाद भी 60 दिनों तक केंद्रीय बल रहेगा। इस भरोसे के बूते ही वहां आजाद भारत का अब तक का ऐतिहासिक रिकॉर्ड मतदान हुआ। चुनावी रैलियों में भी पीएम नरेंद्र मोदी ने कहा था, गुंडे 4 मई के बाद देख लें। चुनाव आयोग ने विजय जुलूस निकालने पर प्रतिबंध लगा दिया ताकि टकराव टल जाएं। जाहिर है, 4 मई को नतीजे आए, लेकिन अंदेशे के अनुरूप ही 24 घंटे के भीतर ही सियासी रंजिश की चिंगारी सुलग पड़ी।

ताजा हिंसा के लिए तृणमूल कांग्रेस और भाजपा एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहरा रही है। उपद्रवी कोई हो, उसे कतई राजनीतिक संरक्षण नहीं मिलना चाहिए। लोकतंत्र में हिंसा की कोई जगह नहीं है। जाहिर है यह सत्ता परिवर्तन का दौर है। 9 मई को नई सरकार शपथ लेगी। आने वाली सरकार के लिए रामराज बहाल करने की सबसे बड़ी चुनौती होगी। ऐसे में प्रदेश की नई सरकार हो या केंद्र यानी डबल इंजन की सरकार के लिए रामराज स्थापित करने के लिए कड़े और बड़े एक्शन की उम्मीद की जानी चाहिए।

भय के बीच जिस भरोसे के बूते बंगाल ने जो जनादेश दिया है, वहां रामराज ही सबसे बड़ा रिटर्न गिफ्ट होगा। वैसे भी यह माटी मां (दुर्गा-काली) की है। चंड-मुंड (असुरों-उपद्रवियों) के वध के लिए जैसे कालिका प्रकट हुई थीं, वैसे ही बार-बार सुलगते बंगाल में रामराज के लिए फिर यह मंत्र जरूरी हो गया है...


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

 

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