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Bengal Diary: TMC के दो-तिहाई सांसद छोड़ सकते हैं पार्टी!

सार

पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों बड़ा उथल-पुथल देखने को मिल रहा है। तृणमूल कांग्रेस के भीतर बढ़ती नाराजगी और इस्तीफों की खबरों के बीच भाजपा के ऑपरेशन लोटस की चर्चा तेज हो गई है।
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पार्षदों के स्तर पर स्थिति और अधिक गंभीर मानी जा रही है। - फोटो : @ANI
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विस्तार
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बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद से ही तृणमूल कांग्रेस में भारी अफरातफरी का माहौल दिखाई दे रहा है। सांसद, विधायक और पार्षद या तो अपने इलाकों से दूर हैं या फिर पूरी तरह चुप्पी साधे हुए हैं। यहां तक कि विधायकों की मौजूदगी भी ममता बनर्जी की बैठकों और कार्यक्रमों में अपेक्षित संख्या में नहीं दिख रही है।

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पार्षदों के स्तर पर स्थिति और अधिक गंभीर मानी जा रही है। कई नगर निगमों और नगर पालिकाओं में सामूहिक इस्तीफों की होड़ मची हुई है। कहीं एक-तिहाई से अधिक तो कहीं दो-तिहाई से भी ज्यादा पार्षद इस्तीफा दे चुके हैं। 

इसके चलते कई शहरी निकायों में संवैधानिक संकट जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई है। माना जा रहा है कि प्रशासक नियुक्त कर अस्थायी रूप से इस संकट को संभाला जा सकता है। अगला निकाय चुनाव फरवरी 2027 में प्रस्तावित है।
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इधर भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद शमीक भट्टाचार्य लगातार यह बयान दे रहे हैं कि भाजपा का दरवाजा तृणमूल कांग्रेस नेताओं के लिए बंद है। हालांकि राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि तृणमूल के दो-तिहाई से अधिक सांसद दिल्ली से “ग्रीन सिग्नल” मिलने का इंतजार कर रहे हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व फिलहाल सांसद स्तर पर कुछ नरमी दिखा सकता है। इसकी एक बड़ी वजह लोकसभा की संख्या गणित को माना जा रहा है। वर्तमान में भाजपा के पास अपने दम पर बहुमत से कम सीटें हैं और उसे एनडीए सहयोगियों पर निर्भर रहना पड़ रहा है। विशेष रूप से टीडीपी और जदयू जैसे सहयोगियों के समर्थन पर निर्भरता कम करने की रणनीति भी इसके पीछे एक कारण मानी जा रही है। 

तृणमूल कांग्रेस के लोकसभा में फिलहाल 29 सांसद हैं, जबकि दल में विभाजन के लिए कम से कम 20 सांसदों का समर्थन आवश्यक माना जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक, इस दिशा में ऑपरेशन लोटस के तहत अंदरखाने कोशिशें शुरू हो चुकी हैं। 

बताया जा रहा है कि पार्टी के पांच मुस्लिम सांसदों के साथ-साथ अभिषेक बनर्जी और कल्याण बनर्जी को भाजपा में शामिल करने की कोई योजना नहीं है। बाकी बचे 22 सांसदों में दो पूर्व भाजपा सांसद भी शामिल हैं, जो मूल रूप से बंगाल के निवासी नहीं हैं। इन दोनों को लेकर भाजपा नेतृत्व को अंतिम निर्णय लेना है।

ममता बनर्जी ने जाने-अनजाने में इस प्रक्रिया को और आसान बना दिया, जब उन्होंने काकोली घोष दस्तीदार को नाराज़ कर दिया। ममता बनर्जी ने लोकसभा में उनसे मुख्य सचेतक का पद वापस लेकर कल्याण बनर्जी को सौंप दिया, जबकि दोनों का रिश्ता चार दशक से भी अधिक पुराना माना जाता रहा है।

भाजपा ने भी काकोली घोष दस्तीदार की नाराज़गी को राजनीतिक तौर पर भुनाने में देर नहीं की। केंद्र सरकार ने उन्हें सीआईएसएफ की वाई श्रेणी की सशस्त्र सुरक्षा उपलब्ध कराई है। बताया जा रहा है कि इंटेलिजेंस ब्यूरो की थ्रेट असेसमेंट रिपोर्ट के आधार पर यह सुरक्षा दी गई। इसके बाद  इन्होंने आई-पैक पर निशाना साधते हुए बारासात संगठनात्मक जिला अध्यक्ष पद से भी इस्तीफा दे दिया। 

बहरहाल, काकोली घोष दस्तीदार की नाराज़गी को अब तृणमूल कांग्रेस के भीतर संभावित असंतोष और भगदड़ के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि जो सांसद पार्टी नेतृत्व से असहज हैं और भाजपा में संभावनाएं तलाश रहे हैं, वे काकोली घोष दस्तीदार के संपर्क में बताए जा रहे हैं।
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

 

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