ममता बनर्जी अपनी घर भवानीपुर में ही 15 हजार से अधिक मतों से चुनाव हार गई हैं। ममता बनर्जी सहित सवा एक दर्जन के करीब मंत्री और सवा एक दर्जन के करीब ही हेवीवेट नेता चुनाव हार गए हैं। नेता प्रतिपक्ष के लिए मजबूरन तीन-चार नामों में ही किसी एक को चुनना होगा।
1998 में तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने कहा था कि भाजपा को बंगाल में लाकर ममता बनर्जी बहुत बड़ी गलती की है। करीब 28 साल बाद ममता बनर्जी को शायद यह बात ज्यादा याद आ रही होगी। ममता बनर्जी जब 2011 में सत्ता में आई थीं उस वक़्त भाजपा का खाता शून्य था। पांच साल बाद खाते में तीन और दसवें साल में 77 था। पंद्रह साल बाद भाजपा के खाते में 207 और ममता के खाते में 80 है।
कौन हो सकता है नेता प्रतिपक्ष! इससे पहले कौन कौन हार गए और कौन बच गए, इस पर एक नजर डालते हैं। ममता बनर्जी के अलावा हारने वाले मंत्रियों में अरूप बिस्वास, मलय घटक, ब्रात्य बसु, शशि पांजा, चंद्रिमा भट्टाचार्य, उदयन गुहा, सुजित बोस, रथिन घोष, ज्योतिप्रिय मल्लिक, परेशचंद्र अधिकारी, बेचाराम मन्ना, इंद्रनील सेन और मानस भुइंया शामिल हैं।
हेवीवेट और चर्चित चेहरे जो बंगाल विधानसभा में नहीं दिखेंगे, इसकी संख्या भी करीब उतनी ही है। देबाशीष कुमार, अतिन घोष, राजीव बनर्जी, गौतम देब, सब्यसाची दत्ता, अर्पिता घोष, रत्ना चट्टोपाध्याय, श्रेया पांडे, स्वप्ना बर्मन, अदिति मुंशी, शौकत मोल्ला, हुमायूं कबीर, विदेश बोस, अरुंधति मैत्रा लवली और सायन्तिका बनर्जी।
जाना पहचाना चेहरा की संख्या काफी कम है। बिमान बनर्जी, शोभनदेव चट्टोपाध्याय, फिरहाद हकीम, जावेद खान, मदन मित्रा, नयना बंदोपाध्याय, रितोब्रत बंदोपाध्याय, कुणाल घोष और फैजुल हक़ उर्फ काजल शेख। फिरहाद हकीम और जावेद खान में से किसी एक को नेता प्रतिपक्ष बनाने से अल्पसंख्यक तुष्टिकरण का मुद्दा बन सकता है।
अनुभव के आधार पर स्पीकर विमान बनर्जी और वरिष्ठ मंत्री शोभनदेव चट्टोपाध्याय ही दो प्रबल दावेदार हैं। 77 वर्षीय विमान बनर्जी बारुईपुर से विधायक और मई 2011 से बंगाल विधानसभा के 10वें स्पीकर हैं। विधानसभा चलाने का 15 साल का अनुभव है। वहीं, 82 वर्षीय शोभनदेव चट्टोपाध्याय इस दफे बालीगंज से विधायक चुने गए है।
शोभनदेव चट्टोपाध्याय 1998 में तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर निर्वाचित पहले विधायक हैं। तृणमूल कांग्रेस की श्रमिक शाखा, आईएनटीटीयूसी के संस्थापक अध्यक्ष भी थे। 2021 में ममता बनर्जी जब नंदीग्राम में चुनाव हार गई थीं तो इन्होंने ही भवानीपुर सीट से इस्तीफा देकर ममता बनर्जी के लिए उपचुनाव का रास्ता बनाया था।
बहरहाल, ममता बनर्जी के यह दोनों ही बेहद करीबी व विश्वासपात्र हैं। ऐसे में पूरी संभावना है कि इन्हीं दोनों में से किसी एक को ममता बनर्जी, विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के लिए चयन करें।
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