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बंगाल चुनाव 2021: आखिरी दोनों चरणों में टीएमसी की टक्कर कांग्रेस के साथ

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आखिरी चरण के चुनाव में कांग्रेस के सामने होंगी चुनौतियां - फोटो : ANI
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“हमारा चुनाव अभियान तो पूरा हो गया है। आखिरी दोनों चरणों से हमें खास उम्मीद नहीं है”। पश्चिम बंगाल में भाजपा के एक बड़े नेता जब नाम नहीं छापने की शर्त पर जब यह बात कहते हैं तो जमीनी हकीकत के करीब लगते हैं। दरअसल, आखिरी दोनों चरणों में जिन सीटों पर मतदान होना है उनमें मालदा की 12, मुर्शिदाबाद की 20 और कोलकाता की 11 सीटें यानी 45 सीटें ऐसी हैं जहां भाजपा सबसे ज्यादा कमजोर रही है।

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इन दोनों चरणों में खासकर मालदा और मुर्शिदाबाद में तृणमूल कांग्रेस का मुकाबला कांग्रेस के साथ है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि हालांकि पार्टी ने इन इलाकों में भी अपनी ताकत झोंकी है। लेकिन अगर उसे एकाध सीट मिल जाए तो बहुत है। मुर्शिदाबाद में दो उम्मीदवारों के कोरोना से निधन की वजह से उन पर मतदान अब 16 मई को होगा। यानी आखिरी दोनों चरणों में 71 की बजाय 69 सीटों पर ही मतदान होगा। 

भाजपा ने पिछली बार मालदा जिले में एक सीट जरूर जीती थी। लेकिन तब उसे कांग्रेस की गुटबाजी का फायदा मिला था। लेकिन इस बार जिला कांग्रेस के नेता ऐसी गलती करने को तैयार नहीं हैं। मालदा जिला कांग्रेस महासचिव मोहम्मद मसूद आलम कहते हैं कि इस बार यहां बीजेपी का कोई नामलेवा नहीं है। पिछली बार की तरह सीटों पर तालमेल के तहत इस बार भी जिले की 12 सीटों में से नौ पर कांग्रेस लड़ रही है और तीन पर लेफ्ट फ्रंट। आलम का दावा है कि अबकी यह तमाम सीटें संयुक्त मोर्चा के खाते में ही जाएंगी। 
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दूसरी ओर, मुर्शिदाबाद की 20 सीटों पर भी कांग्रेस का जोर नजर आता है। यह प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अधीर चौधरी का इलाका होने की वजह से पार्टी का गढ़ माना जाता है। इस बार असदुद्दीन ओवैसी ने भी यहां कुछ सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं। लेकिन कांग्रेस के स्थानीय नेताओं का कहना है कि जिले की ज्यादातर सीटों पर संयुक्त मोर्चा उम्मीदवार ही विजयी रहेंगे। 

इन दोनों जिलों में कांग्रेस इतनी मजबूत है कि तमाम कोशिशों के बावजूद तृणमूल कांग्रेस भी कभी यहां एक भी सीट नहीं जीत सकी है। स्थानीय कांग्रेस नेता मोहम्मद मंसूर कहते हैं कि जब तमाम संसाधनों के बावजूद दस साल से सत्ता में रही तृणमूल कांग्रेस यहां सेंध नहीं लगा सकी है तो भाजपा को कौन पूछता है। उसका न तो कोई जनाधार है और न ही कोई संगठन।लेकिन टीएमसी नेता और लालदीघी सीट से पार्टी के उम्मीदवार मोहम्मद अली कहते हैं कि यहां इस बार तृणमूल कांग्रेस को काफी सीटें मिलेंगी। लोग कांग्रेस से आजिज आ गए हैं और जिले का विकास ठप है। उनके मुताबिक लोग यह समझ गए हैं कि तृणमूल ही भाजपा के खतरे का मुकाबला करने में सक्षम है।इसलिए अबकी लोग हमारा ही समर्थन करेंगे। 
 

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भाजपा के लिए आखिरी चरण में जीत की संभावना कम है। - फोटो : ANI
सातवें चरण में जिन 34 सीटों पर 26 अप्रैल को मतदान होना है उनमें दक्षिण दिनाजपुर के छह, पश्चिम बर्दवान की नौ, मालदा की छह, मुर्शिदाबाद की नौ और कोलकाता की चार सीटें शामिल हैं। बांग्लादेश से सटे दक्षिण दिनाजपुर में भाजपा को लोकसभा चुनाव में कामयाबी जरूर मिली थी। लेकिन टीएमसी का दावा है कि इस बार जिले में उसका खाता तक नहीं खुलेगा।इसी तरह कभी लेफ्ट का गढ़ रहा पश्चिम बर्दवान में आसनसोल और आसपास के इलाकों को छोड़ कर तृणमूल का मजबूत गढ़ बन गया है। 

कोलकाता की 11 सीटों में से सातवें चरण में चार पर मतदान होगा और आठवें और अंतिम चरण में बाकी सात पर। इन शहरी इलाकों में हिंदी भाषा बड़ाबाजार इलाके के अलावा भाजपा की कहीं कोई पैठ नहीं रही है।यह इलाका जोड़ासांको विधानसभा क्षेत्र के तहत हैं।वहां आबादी मिली-जुली है। साथ ही अल्पसंख्यकों की भी खासी तादाद है।लोकसभा में भी यह सीट तृणमूल कांग्रेस को ही मिली थी। 

वरिष्ठ पत्रकार पुलकेश घोष मानते हैं कि अगर भाजपा को सातवें चरण में एकाध सीटें मिल भी जाएं तो आखिरी चरण में उसे कोई सीट मिलने के आसार नहीं हैं। आखिरी चरण में मालदा की छह, मुर्शिदाबाद की 11, बीरभूम की 11 और कोलकता की सात सीटों के लिए मतदान होगा। बीरभूम जिले में बीते दो-तीन वर्षो में भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच हिंसक टकराव होते रहे हैं। जिले में राजनीतिक हिंसा में भी कई लोगों की मौत हो चुकी है।लेकिन जिला तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष अणुब्रत मंडल दावा करते हैं कि यहां भाजपा उम्मीदवारों की जमानत तक जब्त हो जाएगी। 

जहां तक मुद्दों का सवाल है, अब आम लोगों से जुड़े मुद्दे गौड़ हो चुके हैं।दोनों दलों का चुनाव अभियान अब निजी हमलों और अपनी कमीज दूसरे से सफेद बताने तक ही सीमित रह गया है। हां, भाजपा के नेता अपने अभियान के दौरान बीच-बीच में विकास और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे उछालते रहे हैं। 

राजनीतिक पर्यवेक्षक डॉ. सुजल कर्मकार कहते हैं, “आखिरी दोनों चरणों के चुनाव का नतीजा अगली सरकार के गठन में अहम भूमिका निभाएगा।इन दोनों चरणों में आधी सीटें जीतने वाली पार्टी सत्ता की मजबूत दावेदार के तौर पर उभरेगी।लेकिन लगता है भाजपा ने लड़ाई से पहले ही हार कबूल कर ली है। ”
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