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कब शांत होगी कला और संस्कृति के केंद्र पश्चिम बंगाल में मची उथल-पुथल?

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बंगाल में लगातार हिंसा की खबरें आ रही हैं और उथल-पुथल मची है। - फोटो : PTI
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एक तरफ बंगाल में चिकित्सक हड़ताल पर हैं। बीमारी से मरीजों का हाल बेहाल है। इलाज के अभाव में बंगाल की जनता मौत को गले लगा रही है। अभद्र भाषा से मुख्यमंत्री लबरेज है। कहीं जय श्रीराम के नाम पर पाबंदी है, तो कहीं राजनैतिक खूनी संघर्ष जारी है। आखिर क्या यही बंगाल की हकीकत है?

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ये बंगाल वो भारतीय बंगाल नहीं है, जो महाकाली का उपासक, तंत्र का गढ़ व आध्यात्म का पुंज हुआ करता था। ये वो बंगाल तो नहीं जहां की धरा से विवेकाननंद ने देश को विचार दिए, जहां राजा राममोहन राय ने अस्तित्व बनाया। जहां जन्में सुभाष, जहां शरत्चंद्र ने अपनी लेखनी चलाई। जहां जन्में गुरुदेव टैगौर,जहां महाश्वेता देवी ने भृकुटी तानी, जहां डॉ सर जगदीश चन्द्र बसु ने जन्म लिया जहां सत्यजित राय ने प्रतिभा पाई, जहां बंकिमचंद चटर्जी ने मातृभूमि का वंदन गाया है।

कितना कुछ बदल गया है बंगाल में। बंगाल वो जहां साहित्य पनपा, 'भूखी पीढ़ी आंदोलन' मुकम्मल हुआ जिसने साठ के दशक में पूरे बंगाल में तहलका मचा दिया था। बंगाल पर मुगल शासन 13वीं शताब्दी से प्रारंभ होकर 16वीं शताब्दी तक रहा और व्यापार तथा उद्योग का एक समृद्ध केन्द्र बन कर उभरा। 15वीं शताब्दी के अंत तक यहां यूरोपीय व्यापारियों का आगमन हो चुका था तथा 18वीं शताब्दी के अंत तक यह क्षेत्र ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के नियंत्रण में आ गया था। भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का उद्गम यहीं से हुआ।

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यहां की सांस्कृतिक अखंडता और परंपरागत शैली ने बंगाल को वैश्विक पटल तक स्थापित किया। - फोटो : अमर उजाला
यहां की सांस्कृतिक अखंडता और परंपरागत शैली ने बंगाल को वैश्विक पटल तक स्थापित किया। नृत्य, संगीत तथा चलचित्रों की यहां लंबी तथा सुव्यवस्थित परंपरा रही है। दुर्गापूजा का पर्व यहां अति उत्साह तथा व्यापक जन भागीदारी के साथ मनाया जाता है। क्रिकेट तथा फुटबॉल यहां के लोकप्रियतम खेलों में से हैं। सौरभ गांगुली जैसे खिलाड़ी तथा मोहन बगान एवं ईस्ट बंगाल जैसी टीम इसी प्रदेश से हैं।

लेकिन आज जो बंगाल बन रहा है या दिख रहा है यह पश्चिम बंगाल का मूल स्वरूप नहीं है। किन्तु प्रश्न तो यह भी है कि आखिर ऐसे क्या कारण रहें जिसने सांस्कृतिक रूप से समृद्ध और धार्मिक रूप से मजबूत बंगाल में वैमनस्य, खून ख़राबें और अमानवीयता की घटनाएं सामने आ रही हैं। 

हर तीसरे दिन बंगाल में दो दलों के समर्थकों में खूनी संघर्ष होना आम बात हो गई।  हाल ही में मुर्शिदाबाद में तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के बीच झड़प हुई, इसमें टीएमसी के तीन कार्यकर्ताओं की मौत हो गई है। बीते दिनों आम चुनाव के दौरान भी कई दफा हुई हिंसा, झड़प, संघर्ष में कई लोगों को मौत नसीब हो गई, किन्तु क्या यह विचारधारा का संघर्ष है या फिर व्यक्तिगत अहम की टकराहट।

बंगाल की राजनीतिक बिसात पर खेलने वाले मोहरों की व्यक्तिगत लड़ाई और संप्रभुता का दोगला चेहरा भी बंगाल की हवा को ख़राब करके जनसामान्य को इस आग में झोंक रहा है। सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस समेत तमाम राजनीतिक दलों ने राजनीतिक शतरंज की बिसात पर गोटियां बिछाने की कवायद तेज़ करके जनता को मरने पर मजबूर कर दिया। 
 
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बंगाल में चुनाव के बाद से ही हिंसा थमी नहीं है। - फोटो : पीटीआई
सत्ता की प्रतिध्वनियां सदा से ही बंगाल में जहर बो रही थीं। आज भी हालात वैसे ही हैं। आखिर क्या बंगाल के भाग्य में यही लिखा है कि सत्ता हमेशा अपने फायदे के लिए जनमत का इस्तेमाल करेगी। आज सत्तासीन दल जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों पर चोट कर रही हैं। 

आज के हाल में जिस तरह से तृणमूल जो बंगाल के साथ बचपना कर रही है वो बंगाल के भविष्य के लिए खतरा है। कुशासन और कुप्रबंधन के चलते राज्य के व्यापार, व्यवस्था, शिक्षा, प्रगति आदि पर सीधे तौर पर असर पड़ रहा है।

उदाहरण के लिए'कश्मीर' की समस्या हमारे सामने जस की तस है। कश्मीर की आय का मुख्य स्त्रोत पर्यटन है और कश्मीर के हालात, पत्थरबाजों की करतूतें, आतंक का समर्थन या सेना का विरोध अमूमन देश के पर्यटकों को कश्मीर की तरफ आकर्षित तो नहीं कर रहा बल्कि दूर कर रहा है, उन्हें डरा भी रहा है। इसका सीधा असर कश्मीर की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा है।

यही हाल अब बंगाल के साथ होते जा रहा है, रोहिंग्या को लेकर सियासत, बांग्लादेशियों को पनाह का मुद्दा, राज्य में राजनैतिक खून-ख़राबा होना, धार्मिक विरोध, धार्मिकता का कुत्सित प्रयास जो चेहरा बंगाल का बनता जा रहा है, वो जनता के लिए तकलीफदेह होगा। इससे जनता का काम प्रभावित होगा। देश के अन्य राज्यों से राज्य का संबंध टूटेगा, व्यापार,पर्यटन, शिक्षा आदि सब प्रभावित होगा, न केवल प्रभावित होगा बल्कि बंगाल को राष्ट्र से अलग-थलग करके कमजोर कर देगा।

जाहिर है ऐसे में जनता को समझना होगा कि किस तरह से राजनीति जनता का उपयोग करके उनका तो स्वार्थ सिद्ध कर ही रही है, साथ ही राज्य को तहस-नहस कर देगी। जनता को समझदारी से सियासत के प्रभाव से बाहर निकल कर पुनः बंगाल के गौरव की स्थापना करना होगी अन्यथा राज्य भी कमजोर और राजनीती भी दुराग्रही हो जाएगी।  

 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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