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कोरोना नहीं उसके बाद की चिंता खाए जा रही है प्रवासी मजदूरों को

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कोरोना वायरस की दहशत के बीच घर लौटने को मजबूर मजदूर - फोटो : प्रतीकात्मक तस्वीर
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कोरोना वायरस ने देश में कई तरह के बदलाव किए हैं। इनमें प्रवासी मजदूरों का बड़े पैमाने पर वापसी भी शामिल है। पूरे देश में इस जानलेवा वारस का असर फैलने की वजह से लॉकडाउन होने के कारण जहां इन मजदूरों की रोजी-रोटी छिन गई है वहीं वहां जान के लाले पड़ गए हैं। यही वजह है कि मार्च के दूसरे सप्ताह से मजदूरों के पलायन का जो सिलसिला शुरू हुआ वह अब तक थमा नहीं है।

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पहले जहां लोग जान की परवाह किए बिना भेड़-बकरियो की तरह ट्रेनों और बसों में भर-भर कर लौट रहे थे वहीं अब  सैंकड़ो मजदूर तो हजारों किलोमीटर की दूरी तय कर पैदल ही अपने गांव-घर लौट रहे हैं। अखबार और टीवी चैनल भी गुजरात, हरियाणा और दिल्ली जैसे दूरदराज से इलाकों से बिहार और उत्तर प्रदेश के गांवों तक सपरिवार पैदल ही लौटने वाले मजदूरों की तस्वीरों से भरे हैं।

पश्चिम बंगाल के विभिन्न इलाकों से कमाने के लिए दूसरे राज्यों में गए हजारों मजदूर भी लौटने लगे हैं। इनमें से कुछ मजदूरों की घरवापसी की राह में पैदा मुसीबतों की दास्तान सुन कर रोंगटे खड़े हो सकते हैं। लेकिन अब इन मजदूरों को जान की परवाह नहीं है। उनका कहना है कि अपने घर में परिवार के बाकी लोगों के साथ भूखे रहना और मरना भी मंजूर है।
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पश्चिम बंगाल के उत्तर 24-परगना जिले के रहने वाले समीरन गुछाइत रोजी-रोटी के लिए केरल के कोच्चि में राजमिस्त्री का काम करते थे। यहां अपने गांव में उनको जहां रोज तीन से चार सौ रुपए मिलते थे वहीं केरल में इससे दोगुनी रकम मिलती थी। यही वजह है कि तीन साल पहले गांव के कुछ युवकों के साथ वह भी केरल चले गए थे। लेकिन अबकी कोरोना के चलते मचे आतंक और वापसी की अफरा-तफरी में उन्होंने जो कुछ भोगा है उसका शब्दों में बयान करना मुश्किल है।

समीरन बताते हैं, “मार्च के पहले सप्ताह तक सब कुछ ठीक था। लेकिन उसके बाद अचानक आतंक का माहौल बन गया। लोगों को केरल की बाढ़ औऱ दो साल पहले फैले निपाह वायरस की यादें ताजा हो गईं। इसके बाद रातोंरात भगदड़ मच गई। कुछ दिनों तक ऊहापोह में रहने के बाद दूसरे लोगों के साथ मैं भी कोलकाता के लिए रवाना हुआ। लेकिन खड़गपुर से पहले ही उस ट्रेन को रोक दिया गया और ऐलान कर दिया गया कि वह आगे नहीं जाएगी।” समीरन के साथ उनके गांव के पांच लोग और थे। बसें भी बंद थीं। आखिर उन सबने खड़गपुर से अपने गांव तक की लगभग दो सौ किमी की दूरी पैदल ही तय करने का फैसला किया।

रास्ते में उनको कम मुसीबतें नहीं झेलनी पड़ीं। वह बताते हैं, “जेब में पैसे तो कम थे ही। रास्ते में कोई दुकान भी नहीं खुली थी। ऊपर से दो-तीन जगह पुलिसवालों ने भी काफी परेशान किया। लॉकडाउन की वजह से तमाम दुकानें बंद रहने की वजह से उनलोगों को कहीं खाना नहीं मिला।” 

भूखे-प्यासे यह लोग हावड़ा पहुंचे तो एक स्वंयसेवी संस्था ने उनको भोजन कराया। अब राज्य सरकार ने कोलकाता से एक विशेष बस से उनको गांव भेज दिया है और होम क्वारंटीन में रहने को कहा है। समीरन का कहना है कि वह गांव में अपनी थोड़ी-बहुत खेती से ही गुजारा कर लेगा। लेकिन परदेस नहीं जाएगा।

 

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मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपने राज्य के मजदूरों की व्यवस्था के लिए दूसरे राज्यों से अपील की है। - फोटो : Twitter
कोलकाता समेत पूरे बंगाल से कमाने-खाने के लिए दूसरे राज्यों में जाने वाले मजदूरों की हालत एक जैसी है। हजारों लोग किसी तरह गिरते-पड़ते अपने घऱ लौट आए हैं। लेकिन हजारों ऐसे भी हैं जो दिल्ली से लेकर गुजरात तक फंसे हुए हैं। पहले जनता कर्फ्यू और फिर लॉकडाउन की वजह से।

ट्रेन, बसें और उड़ानें सब बंद हैं। ऐसे में हाथ पर हाथ पर हाथ धरे इंतजार करने के अलावा उनके सामने दूसरा कोई चारा नहीं है। मुर्शिदाबाद जिले के 32 राजमिस्त्रियों के एक समूह को ओडीशा से लौटते हुए पुरुलिया जिले में बलराम स्थित जंगल में चौबीस घंटे आसमान के नीचे बिना खाए-पिए ही गुजारने पड़े। बाद में स्थानीय पिलस अधिकारियों ने उकी सहायता की और उनको सुरक्षित स्थान तक पहुंचाया।

सुंदरबन इलाके में काकद्वीप के रहने वाले सागर दास गांव के तीन अन्य युवकों के साथ पुणे के एक रेस्तरां में काम करते थे। लेकिन कोरोना का आतंक फैलने के बाद प्रबंधन ने उनसे लौट जाने को कहा। उनसे कहा गया कि हालात सामान्य होते ही उनको वापस बुला लिया जाएगा। पुणे महाराष्ट्र के उन शहरों में है जहां कोरोना का आतंक सबसे ज्यादा है। वहां बीते सप्ताह से ही कर्फ्यू लागू है।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने गुरुवार को देश के 18 राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र भेजकर उनके राज्यों में फंसे बंगाल के मजदूरों के रहने-खाने और जरूरी सहायता मुहैया कराने का अनुरोध किया है। ममता ने पत्र में लिखा, “हमें जानकारी मिली है कि बंगाल के कई कामगर आपके राज्य में फंसे हैं। वह फोन पर हमसे सहायता की गुहार लगा रहे हैं।

ऐसे लोग आमतौर पर 50-100 के समूह में होते हैं और स्थानीय प्रशासन आसानी से उनको पहचाना सकता है। उनके लिए कोई मदद पहुंचाना हमारे लिए संभव नहीं है। इसलिए मैं आपसे अनुरोध करती हूं कि संकट की इस घड़ी में अपने प्रशासन से उन्हें बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने का अनुरोध करें।”

ममता कहती हैं, “सरकार ऐसे तमाम लोगों की खबर ले रही है और जल्दी ही हालत सुधरते ही उनको वापस बुलाने का इंतजाम किया जाएगा। फिलहाल जो जहां है उसे वहीं रहना चाहिए।” पश्चिम बंगाल सरकार ने गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों को छह महीने तक सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिए चावल व गेंहूं मुफ्त देने का एलान किया है।

उन्होंने ऐसे लोगों को आर्थिक सहायता देने का भी भरोसा दिया है। लेकिन बावजूद इसके दूसरे राज्यों से गिरते-पड़ते घर लौटने वाले मजदूरों को भविष्य की चिंता सताए जा रही है।

सागर दास सवाल करते हैं, “कोरोना तो जैसे-तैसे बीत जाएगा। अगर हम इसमें बच गए तो खाएंगे क्या? घर में रखे थोड़-बहुत पैसे तो तेजी से खत्म हो रहे हैं।” लेकिन उनके इस सवाल का फिलहाल दुनिया भर में किसी के पास शायद ही कोई जवाब है। कोरोना वायरस की वजह से होने वाली उथल-पुथल की वजह से लाखों लोगों के सामने यही सवाल मुंह बाए खड़ा है।
 
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
 
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