मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपने राज्य के मजदूरों की व्यवस्था के लिए दूसरे राज्यों से अपील की है।
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कोलकाता समेत पूरे बंगाल से कमाने-खाने के लिए दूसरे राज्यों में जाने वाले मजदूरों की हालत एक जैसी है। हजारों लोग किसी तरह गिरते-पड़ते अपने घऱ लौट आए हैं। लेकिन हजारों ऐसे भी हैं जो दिल्ली से लेकर गुजरात तक फंसे हुए हैं। पहले जनता कर्फ्यू और फिर लॉकडाउन की वजह से।
ट्रेन, बसें और उड़ानें सब बंद हैं। ऐसे में हाथ पर हाथ पर हाथ धरे इंतजार करने के अलावा उनके सामने दूसरा कोई चारा नहीं है। मुर्शिदाबाद जिले के 32 राजमिस्त्रियों के एक समूह को ओडीशा से लौटते हुए पुरुलिया जिले में बलराम स्थित जंगल में चौबीस घंटे आसमान के नीचे बिना खाए-पिए ही गुजारने पड़े। बाद में स्थानीय पिलस अधिकारियों ने उकी सहायता की और उनको सुरक्षित स्थान तक पहुंचाया।
सुंदरबन इलाके में काकद्वीप के रहने वाले सागर दास गांव के तीन अन्य युवकों के साथ पुणे के एक रेस्तरां में काम करते थे। लेकिन कोरोना का आतंक फैलने के बाद प्रबंधन ने उनसे लौट जाने को कहा। उनसे कहा गया कि हालात सामान्य होते ही उनको वापस बुला लिया जाएगा। पुणे महाराष्ट्र के उन शहरों में है जहां कोरोना का आतंक सबसे ज्यादा है। वहां बीते सप्ताह से ही कर्फ्यू लागू है।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने गुरुवार को देश के 18 राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र भेजकर उनके राज्यों में फंसे बंगाल के मजदूरों के रहने-खाने और जरूरी सहायता मुहैया कराने का अनुरोध किया है। ममता ने पत्र में लिखा, “हमें जानकारी मिली है कि बंगाल के कई कामगर आपके राज्य में फंसे हैं। वह फोन पर हमसे सहायता की गुहार लगा रहे हैं।
ऐसे लोग आमतौर पर 50-100 के समूह में होते हैं और स्थानीय प्रशासन आसानी से उनको पहचाना सकता है। उनके लिए कोई मदद पहुंचाना हमारे लिए संभव नहीं है। इसलिए मैं आपसे अनुरोध करती हूं कि संकट की इस घड़ी में अपने प्रशासन से उन्हें बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने का अनुरोध करें।”
ममता कहती हैं, “सरकार ऐसे तमाम लोगों की खबर ले रही है और जल्दी ही हालत सुधरते ही उनको वापस बुलाने का इंतजाम किया जाएगा। फिलहाल जो जहां है उसे वहीं रहना चाहिए।” पश्चिम बंगाल सरकार ने गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों को छह महीने तक सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिए चावल व गेंहूं मुफ्त देने का एलान किया है।
उन्होंने ऐसे लोगों को आर्थिक सहायता देने का भी भरोसा दिया है। लेकिन बावजूद इसके दूसरे राज्यों से गिरते-पड़ते घर लौटने वाले मजदूरों को भविष्य की चिंता सताए जा रही है।
सागर दास सवाल करते हैं, “कोरोना तो जैसे-तैसे बीत जाएगा। अगर हम इसमें बच गए तो खाएंगे क्या? घर में रखे थोड़-बहुत पैसे तो तेजी से खत्म हो रहे हैं।” लेकिन उनके इस सवाल का फिलहाल दुनिया भर में किसी के पास शायद ही कोई जवाब है। कोरोना वायरस की वजह से होने वाली उथल-पुथल की वजह से लाखों लोगों के सामने यही सवाल मुंह बाए खड़ा है।
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