कोलकाता की एक यात्रा के दौरान ममता अटलजी को कालीघाट स्थित अपने घर ले गई थीं।
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क्यों तुनकमिजाज रही हैं ममता
भद्रलोक के खेतों-खलिहानों से लेकर मैदानों तक इन दिनों भारतीय जनता पार्टी उसी लड़ाका ममता बनर्जी को चुनौती देती नजर आ रही है। शायद भारतीय जनता पार्टी डेढ़ दशक पहले के वाकयों को भी याद कर रही है। जब राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का हिस्सा रहते हुए ममता ने भाजपा के शिखर पुरूष अटल बिहारी वाजपेयी की नाक में कम दम नहीं कर रखा था। जब समता पार्टी के नीतीश कुमार को अटल बिहारी वाजपेयी ने रेल मंत्री बनाया था तो ममता रूठ गई थीं।
जब वाजपेयी पहुंचे थे ममता दीदी के घर
नाक में दम करने की बात को मजाक में ही सही, अटल बिहारी वाजपेयी ने उनकी मां से स्वीकार किया था। कोलकाता की एक यात्रा के दौरान ममता बनर्जी कालीघाट स्थित अपने घर भी ले गई थीं। उदारमना वाजपेयी इससे इनकार नहीं कर सके थे। घर पर जब ममता ने अपनी मां से वाजपेयी की मुलाकात कराई थी, तब वाजपेयी ने उनकी मां से कहा था, ‘आपकी बेटी मुझे बहुत तंग करती है।’
ममता बनर्जी की तुनक मिजाजी से जुड़ा एक और किस्सा याद आ रहा है।
पहले रेल बजट हर साल 26 फरवरी को ही प्रस्तुत होता था। उस दिन रेल मंत्री लोकसभा में रेल बजट पेश करते थे। उसके कुछ देर बाद रेल भवन में पूरे रेलवे बोर्ड की प्रेस कांफ्रेंस होती थी, जिसमें रेलवे बोर्ड बजट प्रस्तावों की व्याख्या करता था और पत्रकारों के सवालों के जवाब देता था। लेकिन वो ममता ही क्या, जो अपनी अलग परंपरा ना बनाएं।
साल 2000 की 26 फरवरी को अपना पहला रेल बजट प्रस्तुत करने के बाद ममता रेल भवन पहुंच गईं। रेलवे बोर्ड की प्रेस कांफ्रेंस के बाद रेल भवन के उसी हॉल में ममता भी प्रेस से मिलने पहुंच गई। उस रेल बजट में ऐसा लग रहा था कि उनका वश चलता तो सारी नई रेलगाड़ियों का रुख बंगाल और कोलकाता की ओर मोड़ देतीं।
प्रेस कांफ्रेंस में जैसे ही ममता का वक्तव्य खत्म हुआ, तब दो पत्रकारों ने दो कोनों से एक साथ एक ही बात कही। बस अंतर यह था कि एक की बात हिंदी में थी और दूसरे की अंग्रेजी में। दोनों ने ही मासूमियत से कहा, ‘ममता दी, आपने बंगाल के लिए कुछ नहीं किया।’
इस बात में छिपे व्यंग्य को ममता ताड़ गईं और एकदम से बिफर गईं। उन्होंने अंग्रेजी में तपाक से दोनों पत्रकारों को जवाब दिया, ‘हे, इंडिया इज माई मदरलैंड एंड बंगाल इज माई स्वीट होम..’ आवाज में तल्खी इतनी थी कि उसे वहां उपस्थित तमाम पत्रकारों ने महसूस किया था। इसके बाद जैसे वह फट पड़ी थीं और लंबा-चौड़ा भाषण ही दे दिया था।
..और ममता बनर्जी ने ऐन मौके पर शपथ लेने से इनकार कर दिया था।
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ममता की तुनकमिजाजी से जुड़ा एक और किस्सा लोग भूल गए हैं। साल 2003 की गर्मियों में वाजपेयी मंत्रिमंडल में फेरबदल होने जा रहा था। राष्ट्रपति भवन में कुर्सियां लग गई थीं। परंपरा यह है कि भावी कैबिनेट मंत्रियों की संख्या के मुताबिक पहली लाइन में कुर्सियां लगाई जाती हैं और राज्यमंत्रियों के लिए दूसरी लाइन में। पहली लाइन में दो कुर्सियां लगी थीं, जबकि पीछे की पंक्ति में सात। यानी दो कैबिनेट और सात राज्य मंत्री शपथ लेने वाले थे। मीडिया को पता था कि ममता बनर्जी की मंत्रिमंडल में वापसी होने जा रही है। राष्ट्रपति भवन में आगंतुकों की सीटें भर रही थीं, कि अचानक पहली लाइन की एक कुर्सी हटा ली गई। ममता बनर्जी ने ऐन मौके पर शपथ लेने से इनकार कर दिया था।
ममता बनर्जी की सफलता का राज उनका संघर्षशील स्वभाव है। उनकी पहचान उनकी सादगी रही है। रेल मंत्री बनने के बाद भी वे अपनी पुरानी फियेट से संसद पहुंचती थीं। जिसे उनके पीए चलाते थे। सूती साड़ी और रबर की चप्पल उनकी पहचान थी।
इस देश की संस्कृति पर एक खास वर्ग द्वारा भले ही सवाल उठाए जाते रहे हों, लेकिन यह सच है कि हजारों-हजार साल से यह देश उस पर मर मिटता रहा है, जो साधु जीवन जीता है। सादगी वाली जिंदगी उस साधुता का ही प्रतीक होती है। जब तक ममता की जिंदगी में सादगी बनी रही, उन पर जनता भरोसा करती रही। वामपंथ के चरम उत्थान के दौर में भी वह भद्रलोक की पसंद बनी रही। लेकिन बंगाल की सत्ता हासिल करने के बाद जैसे-जैसे उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी का दखल बढ़ने लगा, बंगाल की शेरनी की छवि में भी दरार पड़ने लगी। आज अगर उन्हें चुनौती मिलती दिख रही है तो यह बड़ी वजह है।
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