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पश्चिम एशिया संघर्षः दोनों देशों में नहीं बन रही बात, अब युद्ध या युद्धविराम?

सार

जा हमले के बाद कई देशों के जहाज बैरंग लौटने लगे हैं। 24 घंटे के भीतर कच्चे तेल की कीमत में 5-6 फीसदी की वृद्धि हो चुकी है। दुनिया के बाजार लुढ़क गए। भारत में पहले दिन सेंसेक्स में करीब 1700 अंकों की गिरावट दर्ज की गई।
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अली अकबर वेलायती, खामेनेई के सलाहकार - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई सुपुर्द-ए-खाक हो गए। इसी बीच अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध की चिंगारी फिर भड़क उठी है। दोनों के बीच 107 दिनों के संघर्ष के बाद 60 दिनों के लिए जो युद्ध विराम की अंतरिम शांति सहमति बनी, उस पर महज 21 वें दिन ही विराम लग गया।

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दोनों के हितों के टकराव पहले दिन से ही सामने आने लगे थे लेकिन उम्मीद की जा रही थी कि कम से कम 60 दिनों में बात कुछ हद तक बन जाएगी और फिर आगे का रोडमैप तैयार होगा। ऐसा नहीं हो सका। खामेनेई की जनाजा यात्रा के दौरान ही दोनों ने एक-दूसरे का भरोसा तोड़ दिया और अब ऐसा लगता है कि उनमें 20-21 दिनों के भीतर रत्ती भर बात नहीं बनी।

घटनाक्रम के हिसाब से ईरान ने तीन जहाजों पर हमले कर ताजा संकट पैदा किया। ईरान का आरोप है कि शांति सहमति के हिसाब से होर्मुज में जहाजों की आवाजाही का उल्लंघन हुआ। दूसरी तरफ अमेरिका का कहना है कि उसने ईरान के हमले के बाद बदले की कार्रवाई की। 
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ईरान के हमले की अपनी वजह है। खामेनेई की जनाजा यात्रा के दौरान ईरान में अमेरिका और ट्रंप से बदले की कार्रवाई का जनाक्रोश साफ दिखा। मातम मना रही वहां की अवाम ट्रंप से किसी कीमत पर शांति समझौते के खिलाफ थी। श्रद्धांजलि के लिए उमड़े जनसैलाब ने ट्रंप विरोधी नारे लगाए। वहां के लोगों में प्रतिशोध की आग सुलग रही थी।  

युद्ध के दौरान बड़ा नुकसान झेलने के बाद ईरान की माली हालत डगमगा चुकी है। उसे होर्मुज जलडमरूमध्य पर से पकड़ ढीली पड़ने का डर सता रहा है। तंगी झेल रहे ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य पर कब्जे जमाकर सेवा कर (टोल) वसूलने का मंसूबा पाल रखा है। ऐसे में वहां उपज रहे जनाक्रोश को थामने के लिए ईरान और वहां की रिवोल्यूनरी गार्ड (आईआरजीसी) को खामेनेई की मातमपुर्सी जैसा मौके मुफीद लगा।

ताजा  हमले के जरिये ईरान ने अपनी अवाम को यह संदेश देना चाहा कि वह अमेरिका के आगे घुटने नहीं टेक रहा और होर्मुज पर कब्जे व अमेरिका से अपनी आर्थिक क्षतिपूर्ति (भरपाई) की शांति सहमति पर अमल करा कर देश की आर्थिक हालत कुछ सुधार लेगा। इस संदेश में अवाम की भलाई दिखी।

ताजा हमले में ईरान ने 85 तो अमेरिका ने 90 ठिकानों को तबाह किया। इस संघर्ष में एक-दूसरे को तो नुकसान पहुंचा ही लेकिन इससे भारत समेत समूची दुनिया अछूती नहीं रही। अमेरिका ने ईरान का वैश्विक बाजार में कच्चा तेल बेचने का लाइसेंस रद कर दिया। दुनिया की कुल आपूर्ति का पांचवा हिस्सा ईंधन (तेल-गैस) बरास्ते होर्मुज जलडमरूमध्य ईरान से मिलता है।

अब ताजा हमले के बाद कई देशों के जहाज बैरंग लौटने लगे हैं। 24 घंटे के भीतर कच्चे तेल की कीमत में 5-6 फीसदी की वृद्धि हो चुकी है। दुनिया के बाजार लुढ़क गए। भारत में पहले दिन सेंसेक्स में करीब 1700 अंकों की गिरावट दर्ज की गई। दूसरे दिन जब अमेरिकी सेना का बयान आया कि हमले पूरे हो गए तो फिर बाजार में आंशिक रौनक लौटी।

अब युद्ध होगा या फिर से युद्धविराम?

ईरान के हमले की एक वजह यह भी है कि खामेनेई के 37 साल के शासन की विरासत पर तीखा विवाद चल रहा है। खामेनेई की जनाजा यात्रा के दौरान अपने पिता की मृत्यु के एक सप्ताह बाद धार्मिक सभा द्वारा सर्वोच्च नेता घोषित किए गए मोजतबा खामेनेई नजर नहीं आए। चर्चा है कि वह उसी दौरान हमले में घायल हो गए थे। अब खामेनेई के सुपुर्द-ए-खाक हो जाने के बाद यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या अब युद्ध होगा या फिर से युद्धविराम।

युद्ध विराम के मध्यस्थ पाकिस्तान को उम्मीद है कि अगले दौर की वार्ता इस्लामाबाद में होगी। तुर्किये में नाटो शिखर सम्मेलन के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप साफ कर चुके हैं कि ईरान से बातचीत बेमानी और समय की बर्बादी है।

उन्होंने यहां तक कहा कि अब युद्ध विराम खत्म हो चुका है। हालांकि एक उम्मीद उन्होंने यह जगा रखी है कि बातचीत के दरवाजे खुले रहेंगे। इधर ईरान की ओर से गालिबाफ ने अमेरिका को धौंस न जमाने की नसीहत दे डाली है। बयानों के हमले के साथ एक-दूसरे पर हमले भी जारी हैं। अब बुशहर परमाणु पावर प्लांट के पास फिर अमेरिकी मिसाइल गिरी है। बहरीन और जॉर्डन में बार-बार अलर्ट सायरन बज रहे हैं।

अमेरिका और ईरान दोनों ने फिर एक-दूसरे पर दबाव की रणनीति के तहत ताबड़तोड़ हमले तेज कर दिए हैं। भारत समेत प्रभावित खाड़ी देश और दुनिया उम्मीद कर रही है कि विवादों का हल बातचीत से हो। ताजा हालात के बीच उम्मीद की जानी चाहिए कि दोनों देश पहले आपस में भरोसा कायम करें। एक-दूसरे पर हमले रोकें। बातचीत का रास्ता खोले।

यह इसलिए भी जरूरी है कि इस संघर्ष से उपजे संकट के बादल को दुनिया 100 दिन से ज्यादा झेल  चुकी है। ऊर्जा संकट झेल चुकी दुनिया ठीक से उबर  नहीं पाई और ताजा संघर्ष ने समूचे पश्चिम एशिया के सामने फिर  संकट पैदा कर दिया है। ऐसे में ईरान और अमेरिका के साथ-साथ पूरी दुनिया की भलाई इसी में है कि अब युद्ध नहीं, युद्ध विराम हो।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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