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Blog: हम अक्सर खुद से दूर भागते हैं, लेकिन पूर्णता कहीं बाहर नहीं हमारे ही भीतर

Tue, 14 Apr 2026 07:48 AM IST
Nitin Gautam जोहान वोल्फगैंग गोएथे, अमर उजाला

सार

हम सपने देखते हैं, उम्मीदों का संसार रचते हैं, और यह विश्वास करते हैं कि कोई व्यक्ति, उपलब्धि, या क्षण हमें पूर्णता का अनुभव देगा। लेकिन सच्चाई यह है कि यह पूर्णता कहीं बाहर नहीं, बल्कि हमारे अपने भीतर ही है।
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Valley of Peace - फोटो : freepik
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विस्तार
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मैं स्वयं को ही समझाने, संभालने और बहलाने की एक अनवरत, अंतहीन कोशिश में लगा हूं। कभी-कभी मुझे सचमुच ऐसा लगता है कि यह संसार वैसा नहीं है, जैसा हम उसे समझते और मान लेते हैं, बल्कि यह हमारी इच्छाओं, आशाओं, भय और अधूरी आकांक्षाओं का एक धुंधला प्रतिबिंब मात्र है। हम जिन वस्तुओं, संबंधों और उपलब्धियों को पाने के लिए जीवन भर संघर्ष करते हैं, वे हमारे हाथ में आते ही धीरे-धीरे अपना आकर्षण खो देती हैं। फिर हम किसी नई मरीचिका, किसी नए स्वप्न, किसी नई चाह के पीछे भागने लगते हैं। मैं अक्सर सोचता हूं-क्या यह सब एक अंतहीन, थकाने वाला चक्र नहीं है? हम जन्म लेते हैं, सीखते हैं, समझते हैं, फिर चाहतों में उलझते हैं, और अंततः उन्हीं चाहतों के बोझ तले दबकर धीरे-धीरे समाप्त हो जाते हैं। इस पूरी यात्रा में हम बार-बार यह भूल जाते हैं कि शायद जीवन का उद्देश्य किसी निश्चित मंजिल तक पहुंचना नहीं, बल्कि इस यात्रा को महसूस करना, समझना और जीना है। लेकिन विडंबना यह है कि जब तक यह गहरी समझ हमारे भीतर जन्म लेती है, तब तक बहुत कुछ हमारे हाथों से फिसल चुका होता है।
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जब मैं प्रकृति की ओर देखता हूं-बहती हुई ठंडी हवा, या आकाश में धीरे-धीरे तैरते बादल, तो मुझे शांति का अनुभव होता है। वहां कोई दिखावा नहीं है, कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है, कोई बनावटी लक्ष्य नहीं है। सब कुछ अपने आपमें पूर्ण, संतुलित और सहज है। तब मैं अपने अस्तित्व की तुलना उस सरलता से करता हूं, और मुझे अपनी जटिलताओं और अपनी व्यस्तताओं पर आश्चर्य होता है, हमने अपने जीवन को इतना उलझा हुआ क्यों बना लिया है? शायद इसका उत्तर हमारे भीतर ही कहीं छिपा हुआ है। हम अपने आप से भागते हैं, अपने ही विचारों की गहराई से डरते हैं, और इस डर को छुपाने के लिए बाहरी दुनिया की हलचल में खुद को उलझाए रखते हैं।

हम सपने देखते हैं, उम्मीदों का संसार रचते हैं, और यह विश्वास करते हैं कि कोई व्यक्ति, कोई उपलब्धि, या कोई क्षण हमें पूर्णता का अनुभव देगा। लेकिन सच्चाई यह है कि यह पूर्णता कहीं बाहर नहीं, बल्कि हमारे अपने भीतर है। और जब कभी मैं उस भीतर की दुनिया में प्रवेश करने का साहस करता हूं, तो मुझे वहां एक सुंदरता दिखाई देती है-एक ऐसी सुंदरता, जो स्पष्ट नहीं है, फिर भी अत्यंत आकर्षक, जीवंत और सच्ची है। वह एक अधूरी तस्वीर की तरह है, जिसे हम पूरा करना चाहते हैं, पर कभी पूरी तरह कर नहीं पाते। शायद यही अधूरापन हमें जीवित रखता है, हमें आगे बढ़ने, खोजने और महसूस करने के लिए प्रेरित करता है। इस प्रकार, मैं अपने विचारों, भावनाओं और स्वप्नों के बीच झूलता हुआ, इस जीवन को एक गहरे, रहस्यमय स्वप्न की तरह जीता रहता हूं। कभी यह स्वप्न मधुर और सुकून देने वाला लगता है, तो कभी भारी और बोझिल, लेकिन हर क्षण यह मुझे कुछ नया सिखाता है, कुछ नया दिखाता है।               
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(द सॉरोज ऑफ यंग वेर्थर के अनूदित अंश)

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जीवन सुंदर सफर है, जिसमें हर अनुभव, हर पीड़ा, हर आशा और हर सपना हमें भीतर की सच्चाई के करीब ले जाता है, इसलिए मंजिल की चिंता छोड़कर इस क्षण को पूरी जागरूकता, साहस, धैर्य और स्वीकार्यता के साथ जीना ही वास्तविक पूर्णता, शांति और आत्मिक संतोष की ओर हमारा सबसे सच्चा और अर्थपूर्ण कदम है।
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