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उपराष्ट्रपति के सवालों पर मंथन: क्या विधायिका और न्यायपालिका में टकराव की स्थिति लोकतंत्र के लिए सुखद है?

सार

पिछले दिनों तमिलनाडु सरकार की एक याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल और राष्ट्रपति को, दोनों को तीन महीने के भीतर राज्य सरकार के बिल पास करने के आदेश दिए। सुप्रीम कोर्ट ने यहां तक कहा था कि तीन महीने के बाद यह बिल स्वतः पास मान लिए जाएंगे। उपराष्ट्रपति धनखड़ ने सुप्रीम कोर्ट के इसी आदेश को लेकर आपत्ति जताई है।
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क्या संवैधानिक संस्थाओं को अपने लिए एक लक्ष्मण रेखा निर्धारित नहीं करनी चाहिए? - फोटो : X / @VPIndia
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विस्तार
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क्या सुप्रीम कोर्ट को विधायिका के कार्य में हस्तक्षेप करना चाहिए और विधायिका को सुप्रीम कोर्ट के कार्यक्षेत्र में बाधा पहुंचानी चाहिए? यह प्रश्न इसलिए उठ रहा है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के हाल के एक फैसले को लेकर उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने तल्ख टिप्पणियां की हैं।

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दरअसल, पिछले दिनों तमिलनाडु सरकार की एक याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल और राष्ट्रपति को, दोनों को तीन महीने के भीतर राज्य सरकार के बिल पास करने के आदेश दिए। सुप्रीम कोर्ट ने यहां तक कहा था कि तीन महीने के बाद यह बिल स्वतः पास मान लिए जाएंगे। उपराष्ट्रपति धनखड़ ने सुप्रीम कोर्ट के इसी आदेश को लेकर आपत्ति जताई है।
 

क्या विधायिका और न्यायपालिका में टकराव की स्थिति लोकतंत्र के लिए सुखद है? क्या संवैधानिक संस्थाओं को अपने लिए एक लक्ष्मण रेखा निर्धारित नहीं करनी चाहिए? 

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उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने सुप्रीम कोर्ट को लेकर जो बातें कहीं, वह विचार योग्य हैं। उन्होंने कहा कि संविधान निर्माता बहुत विवेकशील थे। वे राष्ट्र कल्याण में गहरी आस्था रखते थे। उन्होंने तीन साल से भी कम समय में 18 सत्रों तक चर्चा की। कोई टकराव नहीं हुआ। कोई गड़बड़ी नहीं हुई। कोई व्यवधान नहीं हुआ। संवाद हुआ, बहस हुए, चर्चा हुई और विचार विमर्श हुआ। उनके पास बेहद विवादास्पद मुद्दे थे, लेकिन उन्होंने नियम बनाया। न्यायाधीशों की नियुक्ति अनुच्छेद 124 के तहत की जाएगी। इसके लिए परामर्श बोर्ड का इस्तेमाल किया जाएगा।


उपराष्ट्रपति धनखड़ ने कहा

उस समय अनुच्छेद 124 को लेकर डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने महत्वपूर्ण बात की थी। उन्होंने कहा था कि मुझे लगता है कि मुख्य न्यायाधीश को न्यायाधीशों की नियुक्ति पर व्यावहारिक रूप से वीटो देने का अधिकार, वास्तव में मुख्य न्यायाधीश को अधिकार हस्तांतरित करना है, जिसे हम राष्ट्रपति या तत्कालीन सरकार में निहित करने को तैयार नहीं हैं। इसलिए मुझे लगता है कि यह भी एक आपत्तिजनक प्रस्ताव है। धनखड़ ने कहा कि इसके बावजूद वर्ष 1993 में दूसरे न्यायाधीश के मामले में न्यायालय ने परामर्श की व्यवस्था सहमति के रूप में की। धनखड़ ने पूछा, क्या ऐसा किया जा सकता है? 


उपराष्ट्रपति धनखड़ ने यह भी कहा कि संसद केवल कानून बना सकती है और कार्यपालिका एवं न्यायपालिका सहित अन्य संस्थाओं को जवाबदेह बना सकती है, लेकिन निर्णय लिखना, न्याय करना न्यायपालिका का ही विशेषाधिकार है, जैसे कानून बनाना संसद का काम है।

उन्होंने प्रश्न किया-

क्या हम नहीं पाते कि इस स्थिति को चुनौती दी जा रही है? कार्यकारी शासन न्यायिक आदेशों द्वारा हो रहा है। जब सरकार लोगों द्वारा चुनी जाती है तो सरकार संसद के प्रति जवाबदेह होती है। सरकार चुनाव में लोगों के प्रति जवाबदेह होती है।


उपराष्ट्रपति धनखड़ का यह कहना बिल्कुल उचित प्रतीत होता है कि संसद में आप सवाल पूछ सकते हैं, आलोचनात्मक सवाल पूछ सकते हैं, क्योंकि शासन कार्यपालिका द्वारा होता है, लेकिन अगर न्यायपालिका कार्यपालिका द्वारा शासन करती है तो हम सवाल कैसे पूछ सकते हैं? चुनाव में आप किसे जवाबदेह ठहराते हैं।

उपराष्ट्रपति धनखड़ का यह कहना सही है कि अब समय आ गया है कि जब हमारी तीनों संस्थाएं, विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका, अपना दायित्व उत्तम तरीके से निभाएं। यह राष्ट्रहित में सबसे बेहतर तरीका है। उनका यह कहना भी उचित है कि किसी अन्य के क्षेत्र में कोई भी घुसपैठ चुनौती बन जाती है, जो अच्छी बात नहीं है। यह संतुलन बिगाड़ सकता है।

उपराष्ट्रपति धनखड़ यहीं नहीं रुके। उन्होंने अनुच्छेद 142 का जिक्र करते हुए यहां तक कहा कि लोकतांत्रिक ताकतों के खिलाफ यह परमाणु मिसाइल जैसा बन गया है। यह न्यायपालिका के लिए 24 घंटे उपलब्ध है। उपराष्ट्रपति ने यह भी याद दिलाया कि न्यायाधीशों की नियुक्ति सिर्फ और सिर्फ राष्ट्रपति द्वारा की जाती है और उनके विरुद्ध कार्रवाई का अधिकार करने का एकमात्र अधिकार संसद को है। इसलिए अब समय आ गया है कि हम प्रतिक्रिया मोड में न रहे। धनखड़ का इस बात को लेकर भी चिंता जताना जायज प्रतीत होता है कि अदालत राष्ट्रपति को आदेश कैसे दे सकती है? जज सुपर संसद की तरह काम कैसे कर सकते हैं? 

इससे पहले भी कई बार हुआ विधायिका और न्यायपालिका में टकराव
वैसे, विधायिका और न्यायपालिका में टकराव कोई नई बात नहीं है। वर्ष 1973 में केशवानंद भारती केस में ऐसा हुआ था। तब सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि संसद संविधान संशोधित तो कर सकती है, लेकिन संविधान के बुनियादी ढांचे को छू नहीं सकती। उस समय तक संसद खुद को सर्वोच्च मानती थी, लेकिन कोर्ट ने उसकी शक्ति पर सीमा लगा दी थी।

दो वर्ष बाद 1975 में भी इंदिरा गांधी बनाम राज नारायण केस में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द किया था, लेकिन संसद ने आनन-फानन में संविधान में 39वां संशोधन कर इस फैसले को निष्प्रभावी करने का प्रयास किया।

इसके बाद आपातकाल के दौरान वर्ष 1975-77 के बीच संसद ने कई संविधान संशोधन किए, जिससे कोर्ट की शक्तियां सीमित की गईं।

वर्ष 2015 में मोदी सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच टकराव की स्थिति बनी। सरकार ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग बनाया, ताकि जजों की नियुक्ति में पारदर्शिता हो, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक करार दे दिया और कॉलेजियम सिस्टम को बहाल कर दिया।  

कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका पर सवाल
जैसा, उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ कर रहे हैं, जज सुपर संसद बन रहे हैं तो वो बात पिछले कुछ फैसलों में दिखती है। संसद द्वारा पारित कृषि कानूनों को सुप्रीम कोर्ट ने रोक दिया था। संसद द्वारा पारित नागरिकता संशोधन कानून पर प्रदर्शनकारियों से वार्ता के लिए कमेटी बनाई थी। वर्तमान में वक्फ संशोधन कानून को लेकर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई कर रहा है, जबकि यह कानून भी संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित है। ऐसे समय में उपराष्ट्रपति का न्यायपालिका पर सवाल उठाना एक महत्वपूर्ण बात है। क्या कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका को अपनी सीमाएं निर्धारित नहीं करनी चाहिए? क्या इन्हें लक्ष्मण रेखा पार करनी चाहिए?

शायद लोकतंत्र के लिए यही सुखद बात होगी। यदि इन संस्थाओं के बीच टकराव की स्थिति बनती है तो अपना लोकतंत्र कमजोर होता है। उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता रहे हैं। उन्हें संविधान विशेषज्ञ माना जाता है। ऐसे में उन्होंने जो सवाल उठाए हैं, उन पर गहनता से विचार-विमर्श होना चाहिए।



डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

 

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