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खुला आकाश: परिवार की दूरी और स्क्रीन का समय, आभासी दुनिया के चक्रव्यूह में ऐसे फंस रहा किशोर मन

Sun, 08 Feb 2026 07:38 AM IST
हिमांशु चंदेल राजेंद्र सारस्वत, अमर उजाला

सार

किशोर मन की बात करें तो यहां एक बड़ा पेंच है। परिपक्व मन की इच्छाएं और कामनाएं उतनी व्यापक और अव्यावहारिक नहीं होती हैं, जितनी किशोर मन की। यह मन कल्पना लोक में सीमाहीन उड़ान भर सकता है।
 
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मोबाइल गेम। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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तीन मासूम बेटियों की छत से कूदकर आत्महत्या करने वाली खौफनाक खबर की गहरी दुखांतिका पर किसी भी संवेदनशील हृदय का उद्वेलित होना सहज बात है। एक उम्र जिसके सामने भविष्य के सपने और वर्तमान का फलक फैला पड़ा हो, वह ऐसा घातक रास्ता क्यों चुनेगी? यह एक बहुत बड़ा प्रश्न है, समाज और व्यवस्था के सामने। इसका उत्तर मानवीय मनोविज्ञान में छुपा है, जिसे आज के परिवेश ने अभूतपूर्व रूप से विकृत कर दिया है। अब सबसे बड़ी आवश्यकता है कि मनोवैज्ञानिक और समाजशास्त्री इस गुत्थी की परतें खोलकर निवारक उपाय सुझाएं।
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एक बहुत बड़ी सच्चाई है कि मानव स्वभाव से ही सुविधा आग्रही और स्वप्नजीवी है। बड़ों की तो बात अलग है, लेकिन अपरिपक्व मस्तिष्क यह नहीं समझ पाता है कि वास्तविक दुनिया उसके सपनों की दुनिया से बिल्कुल अलग है।

सच्चाई के धरातल पर जब कच्चा स्वप्न संसार गिरता है तो वह चूर-चूर होकर जिस मनःस्थिति को जन्म देता है, उसे पलायनवाद कहा जा सकता है। इस स्थिति में अपरिपक्व मस्तिष्क, वास्तविक दुनिया से अलग जिस संसार की रचना कर लेता है, उसे आभासी संसार कहा जाता है। जो मिला नहीं, उसे प्राप्त करना ही इस आभासी संसार का हेतु है।
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किशोर मन की बात करें तो यहां एक बड़ा पेंच है। परिपक्व मन की इच्छाएं और कामनाएं उतनी व्यापक और अव्यावहारिक नहीं होती हैं, जितनी किशोर मन की। किशोर मन के लिए निर्द्वंद्व होकर कल्पना लोक में सीमाहीन उड़ान भरना एक सहज और स्वाभाविक बात है। 

भले ही वह संभावनाओं से कोसों दूर हो। अपरिपक्व मन तो आकाश और समंदर को भी बाहों में भरने, फूल की सुगंध को छूने या हवाओं से बात करने तक की संभावनाएं तलाशने लगता है। यह उम्र ही ऐसी है। किशोर वय में उठने वाले हार्मोनल तूफान, कच्चे मन को कर्तव्य और अकर्तव्य का भेद करने में बिल्कुल अक्षम बना देते हैं। उस पर इस बात का कतई फर्क नहीं पड़ता है कि क्या संभव है या क्या असंभव है। उसकी वैचारिक उड़ान के लिए किसी तर्कसंगत अथवा व्यावहारिकता की सीमा ही नहीं होती है।

वैसे, यह लड़ाई पूरी तरह सरकारी स्तर पर नहीं लड़ी जा सकती, क्योंकि सरकार की अपनी सीमाएं हैं। इस मकड़जाल से निकलने के लिए हमारे व्यक्तिगत प्रयत्न ही एकमात्र उपाय हैं। मां-बाप, भाई-बहन जैसे तमाम रिश्तों की सम्यक भागीदारी ही कच्चे किशोर मन को इस खतरनाक रास्ते पर जाने से रोक सकती है। आज के भौतिकवाद और तकनीकी आंधी में हमें मिलकर काम करने की जरूरत है।
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