फिल्मी दुनिया अपने सौंदर्यबोध में जितनी खूबसूरत हैं उतनी ही विद्रुप भी।
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दरअसल, जैसा की पहले कहा, फिल्मी दुनिया अपने सौंदर्यबोध में जितनी खूबसूरत हैं उतनी ही विद्रुप भी। फिल्मी दृश्यों में कैद सामाजिक सच के स्याह दर्शन अक्सर दर्शकों की आंख की किरकिरी बने हैं। हर दौर की रचनात्मकता के भीतर का समय अपनी विद्रुपताओं के साथ दिखाई दिया है। ये विद्रुपताएं यथार्थ का दृश्यांकन अपने मानकों करती रही हैं। कई बार ये विभत्स हुआ है तो कई बार इतना जघन्य और हिंसक भी कि इसे स्वीकार करना और विश्वास करना भी आसान नहीं रहा।
फिल्मी और साहित्यिक दोनों ही दुनिया में विद्रुपताएं शब्द और दृश्य के खांचे में बंटी रहीं हैं। एक कल्पना के भीतर प्रभावित करती है तो वहीं दूसरी दृश्यों के बीच। सृजनात्मक संसार और रचनाधर्म की प्रक्रिया के अंतर्गत् साहित्य ने अक्सर अपनी पड़तालों में अपने समय की विकृतियों को चिंता, सद्भावना और मानवीय संवेदनाओं के प्रति सहानुभूति के साथ दर्ज किया है।
अपने समय के यथार्थ और उसके विभत्स स्वरूप को बताते हुए साहित्य ने समाज को दिशा देने के साथ-साथ शोषण और दमकारी प्रवृत्तियों को हटाने के लिए राजनीतिक हस्तक्षेप, आंदोलन और विद्रोह को पर्याय माना है और उसे जगह दी है।
साहित्य के सामानांतर फिल्में और सिनेमा सामाजिक बदलावा का माध्यम तो बना है, लेकिन सेंसर की मर्यादा के साथ। उसने अपने समाज और समय के सवालों को उसके हल, संशोधनों और अपेक्षित आग्रहों के साथ प्रस्तुत किया है। फिल्में सीमाओं में रही हैं और समाज के बीच हद में भी।
फिल्मों की तुलना में तीसरे पर्दे यानी की वेबसीरीज में सबकुछ कंटेंट है और प्रॉडक्ट का हिस्सा। जैसा की पहले कहा- यथार्थ यहां बदलाव के आग्रह के साथ नहीं आया है बल्कि व्यूअरशिप और मनोरंजन के साथ मौजूद है।
वेबसीरीज देखकर युवाओं का एक बड़ा वर्ग हतप्रभ है, उत्तेजित है, एक नशे के साथ है। अपने ही अंधेरे को देखकर खुश हो रहा है, शोषण, संघर्ष और दमन की घटनाओं में ग्लैमर को जी रहा है, संवेदनाएं विद्रोह, उत्तेजना और हिंसा पैदा कर रही हैं। वेबसीरीज के दर्शकवर्ग के पास अपने ही समाज के उस अंधेरे को हटाने की चिंता नहीं है बल्कि उसके दृश्यांकन से खुश और आत्मकेंद्रित हुआ जा रहा है। निष्क्रिय चिंतन में घुल रहा है। जहां केवल सन्नाटा है, हलचलविहीन समय।
हिंसा, गालियों और सेक्स में डूबे दृश्यों के बीच बह रही एक कहानी से चाश्नी सा चस्का।
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दरअसल, वेबसीरीज में गालियों से भरपूर, हिंसा से लबरेज और बेहद विभत्स तरीके से दर्शाए सेक्स के दृश्यों ने उसे सॉफ्ट पॉर्न के बीच घटती कथाओं से मनोरंजित किया है।
हाथ में मोबाइल, हिंसा, गालियों और सेक्स में डूबे दृश्यों के बीच बह रही एक कहानी से चाश्नी सा चस्का। एक बार में रात काली कर सुबह तक तीन से चार घंटों में कैद 6 से 7 एपिसोड चट कर जाने की सनक। यह कंटेंट हमारे ही परिवेश से उठाकर तड़के और मसाले के साथ बेचने की कला का तरीका है जो एक समय तक तो आर्कषित कर चुका है लेकिन अब विद्रुपताओं, हिंसा, पॉर्न कंटेंट के कारण सवालों के घेरे में है।
देखा जाए तो एक समय के सच और समाज की काली और अंधेरी गलियों के यथार्थ को बताने के लिए वेबसीरीज ने प्रश्न खड़े करते हुए अपनी रचनात्मकता और सृजन धर्म को ही कटघरे में खड़ा कर लिया है।
हाथ दर हाथ थमे मोबाइल में हिंसा, बलात्कार, सेक्स, खून, हत्या, शोषण के तमाम दृश्य जिन विभत्सताओं के साथ सामने आए हैं वह अपने समानांतर एक अलग तरह की समस्या पैदा कर रहे हैं। समस्या भी सामाजिक विकृति के रूप में सामने आई है जहां युवावर्ग काम-धंधा छोड़कर, घंटों एक लत का शिकार हो रहा है।
वेबसीरीज के जरिये हर घर और हाथ में रचनात्मकता के नाम पर मसालेदार मनोरंजन करता बेलगाम यथार्थ पहुंच रहा है। ना बोले हुए पर कोई पाबंदी है ना दिखाए गए पर विवेक की छाया। बच्चे, बूढ़े, युवतियां वह सबकुछ देख रही है जिन्हें देखने के लिए सर्टिफिकट चाहिए, सेंसर चाहिए या फिर की कोई पाबंदी।
सोशल मीडिया ने मोबाइल को लत बनाया है, वेबसीरीज नशा बनाकर छोड़ेगी।
सिनेमा की नई दुनिया और कैमरे की तीसरी आंख, वेबसीरीज में आपका स्वागत है।
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