एन.एस.सी.एन.(आईएम) नामक हिंसावादी संगठन ने “नागालिम या ग्रेटर नागालैंड नामक स्वतंत्र राष्ट्र के स्वप्न को बेचते हुए” नागा समुदाय को अनवरत हिंसा और उपद्रव की आग में झोंका है। सन् 1988 से लेकर आज तक इन चरमपंथियों ने उन सभी लोगों (अपने ही नागा भाइयों सहित) को अपनी बंदूक का निशाना बनाया है, जोकि शांतिपूर्ण ढंग से नागा समस्या का समाधान करना चाहते हैं।
इस संगठन ने दमन, उत्पीड़न, हिंसा और दहशत के बलबूते नागालैंड में समांतर सरकार कायम कर ली। इसी हिंसा और सैन्य-शक्ति के बल पर यह संगठन अन्य नागा संगठनों और आवाजों को कुचलते हुए नागा हितों का स्वघोषित और सबसे बड़ा झंडाबरदार बन बैठा है।
एक बार राष्ट्रीय पहचान, स्वीकृति और महत्व मिल जाने के बाद इस संगठन के स्वयंभू महासचिव थुंगालेंग मुइवा ने इस संगठन को अपना ‘जेबी संगठन’ बनाते हुए इसपर अपने समुदाय तन्ग्खुल का वर्चस्व स्थापित कर लिया।
केंद्र की अलग-अलग सरकारों ने भी इस संगठन की हिंसक उपस्थिति का संज्ञान लेते हुए लगातार इसी संगठन के साथ शांति-वार्ताएं कीं, और जाने-अनजाने इस संगठन का महत्व और हैसियत बढ़ाई।
3 अगस्त, 2015 को हुआ युद्ध-विराम समझौता भी भारत सरकार और थुंगालेंग मुइवा संचालित एन.एस.सी.एन. (आईएम) के बीच ही हुआ था। इस ऐतिहासिक अवसर पर अपने वक्तव्य में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था- “नागाओं का साहस और प्रतिबद्धता प्रसिद्ध है, ऐसे में उनकी विशिष्ट संस्कृति और इतिहास को मान्यता देना, भारत की सांस्कृतिक समरसता और एकता को ही दर्शाएगा और 70 दशक लंबी इस लड़ाई का अंत होगा।”
मोदी सरकार के साथ हुए इस समझौते ने पिछले दो दशक से अधिक समय में भारत सरकार और इस अलगाववादी संगठन के बीच बार-बार होने-टूटने वाले संघर्ष विराम को निर्णायक शांति-स्थापना तक पहुंचने की आस जगाआ थी। हालांकि, यह समझौता अपने आप में त्रुटिपूर्ण था क्योंकि इस समझौते में एन.एस.सी.एन.(आईएम) के अन्य लोगों और संगठनों के साथ हिंसा करने पर प्रतिबंध का प्रावधान नहीं था।
युद्ध-विराम का फायदा उठाकर यह संगठन न सिर्फ खुद को पुनः संगठित और मजबूत कर रहा है, बल्कि अपनी लेवी (वसूली) आदि गैर-कानूनी गतिविधियों का भी निर्विघ्न संचालन करते रहना चाहता है। वह युद्धविराम की समयावधि का उपयोग अन्य सशस्त्र नागा संगठनों (एन.एस.सी.एन. आईएम के अलावा साथ सशस्त्र नागा संगठन नागालैंड में सक्रिय हैं) और शांतिपूर्ण ढंग से समाधान चाहने वाले नागा समूहों और नागरिक समाज को ठिकाने लगाने के लिए भी करना चाहता है।
उल्लेखनीय है कि युद्ध-विराम की अवधि में उसने ऐसे लगभग एक हजार लोगों की नृशंस हत्या कर दी है। इस अवधि में वह अपने एकाधिकार और वर्चस्व को पुनर्स्थापित करना चाहता है।
इस प्रकार युद्ध-विराम के आगे बढ़ते रहने में तो उसकी पूरी रुचि है किंतु शांति-वार्ता के आगे बढ़ने में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं है, इसलिए वह अलग-अलग बहानों और हथकंडों से शांति-वार्ता में अड़ंगा लगाकर युद्ध-विराम की अवधि को आगे बढ़ाते रहना चाहता है और उसका एकतरफा फायदा उठाना चाहता है।
भारत के संविधान के अनुच्छेद 371 (ए) में विशेष प्रावधान द्वारा नागालैंड नाम के साथ अलग पहचान, सम्मान सांस्कृतिक संरक्षण प्राप्त करने हेतु शांतिपूर्ण किंतु श्रमसाध्य और खतरनाक यात्रा करने वाले नागा पीपुल्स कन्वेंशन जैसे संगठनों के देशभक्त नागा नेताओं के बलिदान और साहस को आधुनिक नागालैंड के इतिहास में सम्मान और स्वीकार्यता प्रदान किया जाना आवश्यक है।
नागालैंड के वर्तमान राज्यपाल श्री आरएन रवि ने इस दिशा में पहल करते हुए उन शांतिवादी बलिदानियों को सम्मान देते हुए शैक्षणिक संस्थानों, सार्वजनिक पार्कों, अन्य सरकारी संस्थाओं और योजनाओं का नामकरण उनके नाम पर करना शुरू किया है।
इसी कड़ी में भारत के 71 वें गणतंत्र दिवस पर श्री आर.एन. रवि ने डॉ. इम्कोन्ग्लिबा आओ जैसे शांतिप्रिय और राष्ट्रवादी नेता के नागालैंड राज्य के निर्माण और विकास में योगदान को रेखांकित करते हुए कोहिमा स्थित राजभवन के दरबार हॉल को उन्हें समर्पित किया। उल्लेखनीय है कि एन.एस.सी.एन.(आईएम) नागालैंड राज्य को मान्यता नहीं देता।
राज्यपाल महोदय ने इस संगठन के अलावा नागाओं के अन्य प्रतिनिधि संगठनों को भी वार्ता के दायरे में शामिल करने की शुरुआत की है और उन्होंने भूमिगत संगठनों खासकर एन.एस.सी.एन. (आईएम) द्वारा की जाने वाली वसूली और अन्य गैरकानूनी और आपराधिक गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए स्थानीय सरकार पर दबाव बनाया है।
राज्यपाल महोदय के सीधे और सक्रिय हस्तक्षेप के बाद न सिर्फ स्थानीय सरकार ने उपरोक्त आपराधिक गतिविधियों और वसूली को रोकने की पहल की है, बल्कि असम राइफल्स और भारतीय सेना ने उनकी नकेल कसते हुए प्रत्येक जिला मुख्यालय स्थित उसकी ‘टाउन कमांड’ व्यवस्था को ध्वस्त कर दिया है।
दीमापुर मणिपुर और नागालैंड का प्रवेश-द्वार है और इस संगठन की कमाई का सबसे बड़ा केंद्र रहा है। अभी तक दीमापुर नगरपालिका का कर-संग्रह भी निजी हाथों में था, जिसे यह संगठन संचालित करता था।
अब दीमापुर नगरपालिका का कर-संग्रह स्वयं पालिकाकर्मी करते हैं। बड़े सरकारी निर्माण-कार्य करने वाले ठेकेदारों, उद्योग-धंधे चलाने वालों से जबरन वसूली करने और निर्दोष नागरिकों की हत्या करने पर मुकदमे दर्ज शुरू हुए हैं।
एक तरह से नागालैंड में कानून के राज की बहाली हुई है और एन.एस.सी.एन.(आईएम) की समान्तर सत्ता द्वारा की जाने वाली हिंसा, दहशतगर्दी और अवैध वसूली पर रोक लगी है। स्वाभाविक ही है कि एन.एस.सी.एन. (आईएम) और उसके मुखिया मुइवा को राज्यपाल महोदय का यह “हस्तक्षेप” सख्त नागवार लगा है।
इन कारवाईयों से उसकी छटपटाहट बढ़ गई है, इसीलिए उसने शांति-वार्ताकार श्री आर.एन. रवि को बदलने की मांग की है, क्योंकि उनके द्वारा उठाए जा रहे कदमों से एन.एस.सी.एन. (आईएम) का एकाधिकार और वर्चस्व खतरे में पड़ता दिखाई पड़ रहा है, इसलिए इस संगठन द्वारा पुनः जंगलों में लौटने की गीदड़-भभकी के साथ-साथ अन्य छिट-पुट संगठनों से प्रायोजित आंदोलन, प्रदर्शन और बयानबाजी भी कराई जा रही है।