इस प्रयोग में विनोबा भावे लगभग 58,741 किलोमीटर पैदल चले। उन्हें भूमिहीनों के लिए 44 लाख एकड़ जमीन प्राप्त हुई।
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इस दिशा में क़दम उठाए जाते ,इससे पहले ही उनकी हत्या हो गई। राष्ट्रपिता का सपना अधूरा रह गया। उनके प्रिय शिष्य विनोबा भावे ने यह सपना साकार किया और एक तरह से गुरु दक्षिणा चुकाई। परिणाम यह निकला कि भूदान आंदोलन बिहार, बंगाल होते हुए देश के अनेक राज्यों तक पहुंचा। तेरह बरस में इस यज्ञ ने अपना असर दिखाया । इस प्रयोग में विनोबा भावे लगभग 58,741 किलोमीटर पैदल चले। उन्हें भूमिहीनों के लिए 44 लाख एकड़ जमीन प्राप्त हुई और लगभग 13 लाख भूमिहीन किसानों को निःशुल्क बांट दी गई।
विनोबा भावे के शिष्य और स्वतंत्रता सेनानी चारुचंद्र भंडारी ने बांग्ला में भूदान यज्ञ पर पहली किताब लिखी। इस कृति - में भंडारी जी ने लिखा कि विनोबा भावे आजीवन सेवाव्रती संन्यासी, महात्मा गांधी के बड़े अनुयायी थे । वे महात्मा के ऐसे आध्यात्मिक उत्तराधिकारी थे,जिसने अपने पूर्वजों से प्राप्त संपत्ति में वृद्धि की। कहा भी जाता है कि शिष्य वही योग्य होता है जो गुरु को छोड़कर भी चल सकता है। विनोबा भावे ने वही किया।
विनोबा भावे ने अपने इस भूदान यज्ञ की व्याख्या इस प्रकार की ,
जिस काम में सब लोगों का सहयोग प्राप्त होता है ,उसी को यज्ञ कहते हैं। जब देश पर कोई संकट आता है तो यज्ञ किया जाता है। अपने देश में आज संकट मौजूद है। मजदूर और मालिक का भेद है। करोड़ों लोगों के पास कोई साधन नहीं है। हरिजनों और दूसरों के बीच छुआछूत की विकराल खाई है। धर्मभेद के झगड़े भी मौजूद हैं। ऐसी हालत में देश को बचाने के लिए जब कोई यज्ञ किया जा रहा हो और वो कोई एक अकेला या पांच -पचास व्यक्ति करें तो उससे कुछ नहीं होगा। इस यज्ञ में हर नागरिक को अपना-अपना हिस्सा अर्पण करना पड़ता है। इस यज्ञ में जो अपना हिस्सा अर्पण नहीं करते ,वे देश द्रोही सिद्ध होते हैं। अगर प्रेम और अहिंसा का तरीक़ा आज़माना चाहते हो तो इन ज़मीनों का मोह छोड़ दो। नहीं तो हिंसा का ऐसा ज़माना आने वाला है कि उसमें सारी ज़मीनें और उस ज़मीन पर रहने वाले सारे प्राणी ख़त्म हो जाएंगे।
इस भूदान का एक व्यापक स्वरूप ग्रामदान के रूप में सामने आया। देश में सबसे पहला गांव मंगरौठ था। मुझे गर्व हासिल है कि मंगरौठ ग्राम की पूरी भूमि दान कराने वाले दीवान शत्रुघ्न सिंह से मैं घंटों बतियाया हूं। मंगरौठ मेरे पुश्तैनी कस्बे राठ से कुछ किलोमीटर दूर है। दीवान साब राठ में एक गांधी महाविद्यालय संचालित करते थे। उसमें मेरे दादाजी प्राध्यापक थे। इसलिए दीवान साब अक्सर मेरे घर आया करते थे। उनसे हम गांधी जी, विनोबाजी ,भूदान और ग्रामदान की कहानियां सुना करते थे।
दीवान साब वैसे तो जमींदार थे लेकिन वे गरीबों और दलितों के हमदर्द थे। जब विनोबा जी की भूदान यात्रा राठ से गुजरी तो दीवान साब ने गांव के सारे जमीन मालिकों के दान पत्र उनके चरणों में रख दिए। वह 24 मई 1952 की तारीख थी। इसके बाद तो ग्रामदान करने की होड़ सी लग गई। हजारों गांव के लाखों लोगों ने ग्रामदान में अपना योगदान दिया। खेद है कि राजनीतिक स्वार्थों के चलते ग्रामदान के इस अद्भुत प्रयोग की हत्या हो गई।
आज जब भूदान आंदोलन का 75वां वर्ष प्रारंभ हो रहा है तो मुल्क एक बार फिर उन्हीं समस्याओं से दो चार हो रहा है ,जो आजादी के समय थीं। हम आधुनिकता के नाम पर आगे तो बढ़ रहे हैं, लेकिन अपनी समस्याओं से मुक्ति पाने का रास्ता हम नहीं खोज पाए। हम राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और बाबा विनोबा भावे के प्रति कृतज्ञ नहीं ,बल्कि कृतघ्न हैं। क्या कोई राष्ट्र अपने पुरखों के साथ ऐसा सुलूक करता है?
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