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अदाकारी को धर्म और इंसानियत को फर्ज मानने वाले ‘क्रांतिवीर’ का अंत, नहीं रहे दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर

सार

Padma Shri Nana Patekar: दमदार अभिनय और बेबाक अंदाज के धनी 75 वर्षीय अभिनेता नाना पाटेकर का हृदयाघात से निधन हो गया। अपनी संवाद अदायगी, जमीनी कला और 'नाम फाउंडेशन' के जरिए जनसेवा के लिए वे हमेशा याद किए जाएंगे।
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दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर का निधन - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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Nana Patekar Death: नाना पाटेकर जैसे बुलंद अभिनेता का इस तरह ह्रदयाघात से चले जाना बाॅलीवुड से अदाकारी को धर्म और इंसानियत को फर्ज मानने वाले एक बहुमुखी कलाकार का दुनिया के रंगमंच से अंतर्ध्यान हो जाना है। दमदार संवाद अदायगी और बोल में बेबाकी 75 वर्षीय नाना पाटेकर की अखूट पूंजी थी। जैसा दबंग अभिनय, वैसी ही दबंग बात। ‘फिल्म’ तिरंगा में उनका एक मशहूर डायलाॅग है- ‘पहले लात, िफर बात और उसके बाद मुलाकात। लेकिन इस बार नाना अपने चहेतों से मुलाकात के बगैर ही चुपचाप उस दुनिया में चले गए, जहां से कोई ‘क्रांतिवीर’ या ‘नटसम्राट’ नहीं लौटता। 

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नाना पाटेकर का असली नाम विश्वनाथ दिनकर पाटेकर था। 1 जनवरी 1951 को उन्होंने कोंकण की हरी भरी वादियों में जन्म लिया। बीते बुधवार की रात गोवा स्थित अपने घर में नाना को अचानक सीने में दर्द हुआ। उन्होंने उसी हाल में अपने एक दोस्त को रात में व्हाट्स एप मैसेज भी किया। लेकिन दोस्त तुरंत वह देख नहीं पाया। तड़के चार बजे उसने मैसेज देखा तो तत्काल नाना के घर पहुंचा। अपनी कड़क आवाज में साथी अभिनेताओं को भी थर्रा देने वाले जमीन पर नाना बेहोश पड़े थे। उसी स्थिति में उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया। डाॅक्टरों ने बहुतेरी कोशिश की। लेकिन नाना मौत को चकमा नहीं दे पाए। उनकी इहलोकी यात्रा के समापन की खबर आग की तरह फैली। श्रद्धांजलियों और शोक संदेशों का तांता लग गया। नाना के प्रशंसकों में शुमार प्रधानमंत्री ने अपने संदेश में कहा कि नाना का जाना भारतीय फिल्मोद्योग और कला जगत की अपूरणीय क्षति है। 

नाना पाटेकर ने पहले मराठी नाटकों और फिर हिंदी और मराठी फिल्मों में अपने अभिनय का जो व्याकरण रचा और अदाकारी की जिस ऊंचाई को छुआ, वैसा बिरलों के लिए ही संभव है। क्योंकि नाना के लिए एक्टिंग एक कला भर नहीं थी, वह उनके जीने और सोचने का अंदाज था। अनथक साधना थी। नाना के लिए कलाकार का मतलब समाज के लिए जीने वाला व्यक्ति था। यही कारण है कि नाना धन दौलत और यश के परे इंसानियत की दुनिया में सक्रिय हस्तक्षेप करने वाले व्यक्ति पहले थे। हालांकि जीते जी वो कई आरोपों में भी घिरे। लेकिन नाना ने इसकी चिंता नहीं की।


दरअसल नाना को नाना पाटेकर संघर्षों ने बनाया। परिवार की आर्थिक स्थिति खराब होने के बाद उन्होंने 13 साल की उम्र में काम शुरू किया। स्कूल के बाद वे लगभग 8 किलोमीटर पैदल चलकर चूनाभट्टी जाते और परिवार का पारंपरिक व्यवसाय फिल्मी पोस्टर पेंट करते थे। बदले में 35 रुपये महीना और एक वक्त का खाना मिलता था। नाना ने एक इंटरव्यू में बताया था कि उनके पिता अस्पताल में भर्ती थे और उनके पास इलाज तक के पैसे नहीं थे। लिहाजा पिता की दवाइयों के लिए वे नाटकों में काम करने लगे। उस दौर की भूख और बेइज्जती ने नाना को जिंदगी और अभिनय के बारे में बहुत कुछ सिखाया। बचपन में नाना की छोटी बहन उन्हें प्यार से  नाना कहकर पुकारती थी, इसलिए ‘नाना’ नाम ही उनकी पहचान बन गया। यहां तक कि आधार कार्ड भी इसी नाम से था। 

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नाना का व्यक्तिगत जीवन उतार चढ़ावों से भरा रहा। उन्होंने 1978 उन्होंने थिएटर कलाकार और बैंक अधिकारी नीलकांति पाटेकर से शादी की थी। उस समय उनकी शादी का कुल खर्च सिर्फ 750 रुपये आया था। नाना पाटेकर के बड़े बेटे का बचपन में ही निधन हो गया था, जिससे वे अंदर तक टूट गए थे। बाद में उनके छोटे बेटे मल्हार पाटेकर के जन्म से उनके जीवन में दोबारा खुशियां आईं। लेकिन नाना अपनी पत्नी से लंबे समय से अलग रह रहे थे। हालांकि दोनो में औपचारिक तलाक नहीं हुआ था।

गहराई से देखें तो नाना की अनूठी और दिमाग को झकझोर देने वाली अभिनय शैली ही उन्हें अपने समकालीनों से अलग करती है। नाना संवाद बोलते भर नहीं थे, बल्कि उस किरदार को जिंदा कर देते थे, जिसे वो निभा रहे होते थे। इस हिसाब से नाना के डायलाॅग सिर्फ सुनने की नहीं, महसूस करने की चीज होती थी। जिसमें अन्याय के प्रति गहरा गुस्सा, ईमानदारी और समाज के प्रति दर्द साफ झलकता था। नाना का यह एंग्रीमैन रूप लोगों को बहुत भाता था। हालांकि वह अमिताभ बच्चन के ‘एंग्रीमैन’ से काफी अलग और बहुत कुछ जमीनी लगता था।  फिल्म ‘क्रांतिवीर’ का वह डायलाॅग याद कीजिए- ‘कुत्ते की तरह जीने की आदत पड़ गई है सबको... इज्जत से जीना है तो खुद लड़ना सीखो।" या फिर "ये मुसलमान का खून है और ये हिंदू का खून… बता, इसमें मुसलमान का कौन सा, हिंदू का कौन सा, बता?" 

जाहिर है कि सच्चे कलाकार और इंसानियत का खून अलग नहीं होता। यह धर्म, जाति, नस्ल और रंग से परे है। नाना सिस्टम पर प्रहार करते हैं और उम्मीद करते हैं यह बदलेगा। फिल्म ‘यशवंत’ का वह संवाद याद करें- ‘एक मच्छर साला आदमी को हिजड़ा बना देता है..साला एक मच्छर ! सिस्टम इतना करप्ट है कि ईमानदार आदमी को भी चोर बना देता है।‘’  नाना के अभिनय में एक तड़प और दमदारी थी, लेकिन बनावटीपन या अतिरंजना नहीं होती थी। क्योंकि उनकी अदाकारी असल जिंदगी के संघर्ष और अनुभव से जन्मी थी। अपनी संवाद अदायगी में आवाज पर गजब का नियंत्रण, एक अलग किस्म की थरथराहट और ऊर्जा नाना के अभिनय की खूबी थी। उन्होंने हर तरह के किरदार निभाए। खुद को टाइप्ड नहीं होने दिया।

रंगमंच का कठोर प्रशिक्षण सिनेमा में उनकी अदाकारी खूब परिलक्षित होता था। नाना पाटेकर को आखिरी बार विशाल भारद्वाज की रोमांटिक एक्शन थ्रिलर 'ओ'रोमियो' में देखा गया था। इसके अलावा नाना पाटेकर, अनिल कपूर स्टारर 'सूबेदार' में भी स्पेशल अपीयरेंस में दिखाई दिए थे। वैसे नाना की नाना की प्रमुख फिल्मे हैं, परिंदा, क्रांतिवीर, तिरंगा, प्रहार, प्रतिघात, अब तक छप्पन, वेलकम और राजनीति आदि। अपने प्रभावी और यादगार अभिनय के लिए उन्हें तीन पर राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला और 2013 में भारत सरकार ने पद्म श्री से सम्मानित किया।


नाना को फौज और फौजियों से बेहद लगाव था। साल 1991 में आई अपनी फिल्म 'प्रहार: द फाइनल अटैक' का निर्देशन करने और उसमें फौजी का किरदार निभाने के लिए नाना पाटेकर ने खुद भारतीय सेना के साथ कड़ा सैन्य प्रशिक्षण लिया था। दूसरी तरफ नाना अपने सामाजिक सरोकारों के प्रति भी पूरी तरह सचेत और सक्रिय रहे। वाराणसी में नाना पाटेकर ने युवाओं से कहा था- सिर्फ लेना नहीं, समाज को देना हो तभी फिल्मों में आएं। नाना ने व्यक्तिगत यश और प्रसिद्धि से हटकर उन पीडि़तों की मदद के बारे में सोचा, जिन्हें सचमुच इसकी जरूरत है।

महाराष्ट्र में अकाल से प्रभावित किसानों की आत्महत्या ने उन्हें झकझोर दिया। तब नाना ने अपने अभिनेता मित्र मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर ‘नाम’ फाउंडेशन की स्थापना की। यह फाउंडेशन अब 77 लाख से ज्यादा किसानों और 50 हजार से अधिक परिवारों की आर्थिक मदद कर चुका है। इसके अलावा शहीद सैनिकों के परिवारों को 1 करोड़ से अधिक की मदद दी जा चुकी है। इनके अलावा नाना पाटेकर ने समाज की सबसे बड़ी समस्याओं में एकल परिवार और उसमें बुजुर्ग माता-पिता की अनदेखी को बताया था। उनकी फिल्म वनवास भी इसी तरह की सामाजिक समस्या पर आधारित थी। फिल्मों से दूर इन दिनो नाना पुणे के पास अपने फार्म हाउस में खेती कर रहे थे। खाना बनाना भी उन्हें बेहद पसंद था और मजाक में उन्होंने कहा था कि उन्हें लगता है कि वे अभिनेता से बेहतर कुक हैं।

नाना उन जाबांज लोगों में थे, जो मौत से नहीं डरते। अपने एक इंटरव्यू में नाना ने कहा था कि मैंने अपनी अंतिम संस्कार के लिए 12 मन सूखी लकडि़यों का इंतजाम कर रखा है। सूखी इसलिए क्योंकि लकडि़यां गीली हों तो उनके धुएं से अंतिम यात्रा में आए लोगों की आंखों में पानी बहने लगेगा, मगर दुनिया को गलतफहमी होगी कि वो मेरी मौत पर आंसू बहा रहे हैं।

वैसे नाना ने नाटकों में अभिनय करना क्यों छोड़ा? इसकी भी मार्मिक कहानी है। नाना कहते थे कि महान नाटककार वि.वा. शिरवाडकर के अमर नाटक ‘नटसम्राट’ के नायक अप्पा साहब बेलवलकर की भूमिका जिस भी अभिनेता ने निभाई, उसकी जीवन यात्रा पर ह्रदयाघात से ही विराम लगा। यह संयोग भी हो सकता है, लेकिन इससे विधि का लेखा नहीं बदलता। नाना ने भी अपनी युवावस्था में उस बेघर अप्पा साहब बेलवलकर के किरदार में खुद को पूरी तरह झोंक दिया था, जो यही गुहार लगाता रहा कि कोई मुझे घर देगा क्या, मुझे घर..? लेकिन उस ‘स्थायी घर’ की तलाश में नाना की अंतिम यात्रा भी उसी हार्ट अटैक से समाप्त हुई, जहां उनके अग्रज और समकालीन अभिनेता गए तो फिर लौटकर नहीं आए। नाना भी अनंतयात्रा पर भले चले गए हों, लेकिन उनकी लाजवाब अदाकारी की निशानियां और परोपकार की कहानियां  नाना को हमेशा जिंदा रखेंगी।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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