वृक्षों के पूजन की पौराणिक मान्यताएं
प्राचीन काल से पीपल, बरगद, नीम, पाकड़ और आंवला की पूजा का विधान हमारे पौराणिक कथाओं में मिलता है। मसलन ज्येष्ठ अमावस्या को 'वटवृक्ष' की पूजा की जाती है, अक्षय नवमी को आंवला के वृक्ष की पूजा और शीतलाष्टमी के दिन नीम के वृक्ष की पूजा का विधान किया गया।
यहीं नहीं हर वृक्ष की पूजा को किसी न किसी पौराणिक कथा से भी जोड़ा गया है। 'वटसावित्री पर्व' लोकजीवन में 'बरगदाही अमावस्या' के नाम से भी प्रसिद्ध है। पौराणिक मान्यता के अनुसार सावित्री ने अपने पति सत्यवान को अपनी तपस्या के बल पर यमराज से मृत्यु के चंगुल से वटवृक्ष के नीचे पुनर्जीवित किया। इस वजह से स्त्रियां अपनी पति की दृघायु की कामना और अखंड पतिव्रता जीवन प्राप्त करने के लिए इस तिथि को व्रत रखती हैं और वटवृक्ष की पूजा इस मंत्र के पाठ से करती हैं -
अवैधव्यं च सौभाग्यं देहि त्वं मम सुव्रते।
पुत्रान् पौत्रांश्च सौख्यं च गृहाणाघ्र्यं नमोस्तु।
इस पार्थना में आगे कहा गया है कि जैसे वटवृक्ष अपनी शाखाओं-प्रशाखाओं के जरिए निरन्तर वृद्धि को प्राप्त करता है, उसी प्रकार मैं भी पुत्र-पौत्रों से सदा सम्पन्न रहूं।
सनातन परंपरा में वृक्षों के अलावा लोककल्याण के लिए कुओं का निर्माण भी एक पुण्य कार्य माना जाता है। कुओं के आसपास आमतौर पर पांच तरह के पेड़, बरगद-पीपल- पाकड़, नीम और आंवला के वृक्ष लगाए जाते हैं, ताकि किसी पथिक, पशु-पक्षी-जानवर को छाया के साथ-साथ गर्मी के दिनों में पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन की खुराक मिले और जल पीने के बाद आगे की यात्रा सम्भव हो सके।
ये सभी वृक्ष अन्य वृक्षों की अपेक्षा कई गुना ज्यादा ऑक्सीजन प्राणवायु के रूप प्राणिजगत को एक तरह से मुफ्त में उपलब्ध कराते हैं। कुएं के पास बरगद के पेड़ लगाए जाने के महत्व को बताते हुए पर्यावरणविद् प्रोफेसर वेंकटेश दत्ता बताते हैं कि "कुएं के पास बरगद का पेड़ इसलिए लगाये जाते हैं कि इसकी जड़ों में जलस्रोत रिचार्ज करने की अद्भुत क्षमता है। बरगद का पेड़ अन्य वृक्षों की तुलना में पांच गुना अधिक ऑक्सीजन उत्सर्जित करता है।
इसके अलावा दो सौ मीटर के एरिया को यह वृक्ष शीतल रखने में सक्षम है।" हमारे ऋषियों ने इस कारण भी वृक्षों को धर्म और आस्था से जोड़ा है, ताकि आमजन निष्ठापूर्वक इनका संरक्षण करें। आयुर्वेद का मत है कि इन वृक्षों में औषधीय गुणों के कारण भी हमारे जीवन में इनका महत्वपूर्ण स्थान है। इनके छाल और पतों से वमन-ज्वर, कफ-पीत मूर्च्छा जैसे बीमारियों की औषधियां तैयार की जाती हैं।
इस वजह से वृक्षों के पौराणिक, आयुर्वेदिक और पर्यावरणीय महत्व को देखते हुए पर्व-त्योहार के बहाने ही सही, संरक्षण के उपाय पूरे प्राणिजगत के लिए अत्यंत आवश्यक है। वटसावित्री पर्व को भी इसी नाते खूब धूमधाम से मनाने की परंपरा युगों-युगों से चली आ रही है। हम आज पर्यावरण प्रदूषण और धरती के बढ़ते तापमान की वजह से जिन समस्याओं से रु-ब-रु हैं, ऐसी परिस्थितियों 'वट सावित्री पर्व' के अवश्य सबक लेना चाहिए।
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