कहने को तो हर दिन प्रेम का होता है
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बाजार के लिए हर व्यक्ति, भाव, वस्तु और विचार मूल्यवान है जिसका बाजार मूल्य है। बाजार व्यक्ति से लेकर उसके इमोशन तक को बेच देता है। आज भावनाओं की खरीद-फरोख्त का भी एक बाजार हमारे बीच सक्रिय है। यह बाजार प्रेम संबंधों में कहीं डेटिंग एप के रूप में काम कर रहा है तो कहीं कॉल सेंटर की दुनिया का अपरिचित होकर आपकी भावनाओं से खेल रहा है।
उपभोक्तावादी इस दौर में जब सब कुछ बेचा जा रहा है तो ऐसे में मानवीय संबंध, उनकी भावनाएं और प्रेम भी बाजार का हिस्सा बन गया है। आज प्रेम को परिभाषित करने वाला व्यक्ति और उसका अनुभव नहीं बल्कि बाजार है। इन दिनों बाजार में चारो ओर छाया लाल रंग प्रेम का नहीं बल्कि प्रेम में होने का दबाव है जो पूरी तरह बाजार से प्रभावित है।
फरवरी का यह माह वसंत के आगमन और प्रेम का माह माना जाता है। प्रकृति में वसंत प्रेम, मादकता, उल्लास, नव सृजन, और उमंग का द्योतक है। वसंत को प्रकृति का शृंगार भी कहा जाता है। यह वसंत प्रकृति से लेकर मनुष्य तक के भीतर में प्रेम, उल्लास और आत्मीयता का भाव पैदा करता है। यही माह युवाओं में वसंत से अधिक ‘वेलेंटाइन डे’ अर्थात प्रेम दिवस के इंतजार का भी होता है।
कहने को तो हर दिन प्रेम का होता है। हमारे यहां तो वसंत का आगमन ही जीवन में पुन: उलास, उमंग और प्रकृति से लेकर मनुष्य तक को प्रेममयी अपनी मादकता में समाहित कर लेना है। मगर आज न उस तरह का वसंत रहा न प्रेम। क्योंकि एक ओर मानवीय हस्तक्षेप के कारण प्रकृति निरंतर बदलाव के कारण कंक्रीट के जंगलों में तब्दील हो रही है।
आत्मीयता, मानवता, प्रेम, सहचर्य, समभाव जैसे शब्दों से अधिक उसके भावों को जोड़ने वाली प्रकृति विलुप्त होने की कगार पर है। दूसरी ओर प्रेम, प्रेम में होने के कारण अदालतों के चक्कर काटता हुआ अंत में एक बेजान शब्द बनकर हमारे जीवन में घूम रहा है। अब तो वसंत और प्रेम के आगमन की सूचना या तो कलैंडर बताता है या वेलेटाइन के आगमन में सजा बाजार।
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