प्रकृति और हिमालय को लेकर एक नजरिया बनाना होगा।
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विकास और प्रकृति के बीच संतुलन को साधना बहुत जरूरी है। सच कहूं तो पर्यावरणविदों का, खासतौर पर मेरा किसी भी विकास की योजना का विरोध नहीं है। मैं बार-बार जो कहता हूं कि विकास की राह पर आगे बढ़ते हुए आपके पास प्राकृतिक समझ होनी चाहिए। आप इकोनॉमी की दृष्टि से देखते हैं, एनर्जी की दृष्टि से देखते हैं, पर इकोलॉजी की दृष्टि से देखते हुए संतुलन वाले हिस्से को भी उसी गंभीरता से लेना चाहिए। उदाहरण के तौर पर कहूं तो जहां ये ग्लेशियर टूटा, तो ये ग्लेशियर टूटने के पीछे पूरा ऋतु परिवर्तन का चक्र ही है।
सभी को पता है कि बर्फबारी हुआ करती थी, ये बर्फबारी फरवरी के महीने में होती है, जो जमती नहीं है, क्योंकि हमेशा ग्लेशियर वो बनता है, जो कि नवंबर-दिसंबर के महीने में गिरी हुई बर्फ होती है, उसको ठोस होने का समय मिलता है, स्थिर होने का समय मिलता है और ये जो बर्फबारी अभी हुई थी, इस घटना से दो दिन पहले ही बड़ी बर्फबारी हुई थी, वो एक तरह से कच्ची थी, हिमस्खलन आया और वो स्थिर नहीं था, इसलिए उसने एक बहुत बड़ी घटना को जन्म दे दिया।
यह तो हुई एक बात, अब दूसरी बात ये है कि इसे ग्लोबल वॉर्मिंग का भी हिस्सा माना जा सकता है कि जिस तरह से औसतन तापक्रम बढ़ रहा है, उसकी सबसे बड़ी संवेदनशीलता अगर कहीं है तो हिमालय में ही है, क्योंकि यहां आप कल्पना करिए, दिल्ली में एक डिग्री सेंटीग्रेड तापमान बढ़ने के कुछ और मतलब होते हैं और ये हिमालय के एक डिग्री सेंटीग्रेड बढ़ने के मतलब कुछ और होते हैं। ये समझने की आवश्यकता है।
दूसरी बात कि अब क्या हिमालय ही सारी दुनिया में पहाड़ है, ये स्विट्जरलैंड, नीदरलैंड, न्यूजीलैंड, जिसको लेकर के हम आपका विकास का मॉडल मानते हैं, हमने उनके दूसरे हिस्से को नहीं देखा, वो इकोलॉजिकली इतने साउंड हैं, तमाम तरह की योजनाएं बनाते हुए सारी चीजों का ध्यान रखते हैं।
उदाहरण के तौर पर चीन को देखिए, जिससे हम प्रतिस्पर्धा बनाए रखते हैं, वहां भी 65 प्रतिशत पहाड़ हैं, उनकी योजनाओं में जो महत्वपूर्ण हिस्सा रहता है कि हम ऐसा दिखें। अभी हमें सोचना चाहिए कि वो ऊपर के इलाके हैं, जो ज्यादा संवेदनशील होते हैं, उनसे दूरी बनाते हुए हमें बांध बनाने चाहिए।
यदि हमें प्राकृतिक आपदाओं को कम करना है तो प्रकृति के साथ विरोध नहीं बल्कि सामंजस्य की स्थिति बनानी होगी। विकासीय ढांचे में प्रकृति के हिस्से को जोड़ना होगा रखा है। आप हम उस इकोलॉजी को नहीं समझ रहे हैं। आपने मान लिया एक बांध बनाया, बांध के दूसरे हिस्से को (समझते हैं उदाहरण के लिए, आप ग्लेशियर से और दो किलोमीटर नीचे ये बांध बना होता, इस घटना को इस रूप में नहीं झेलते आप। प्रकृति के विज्ञान को समझने के लिए प्रकृति को भी बराबर समझना होगा। हाल में हुई घटना से हमें कुछ सबक भी लेने चाहिए। बांधों की विशालता से विनाश को भी जोड़कर देखा जाना चाहिए।
लेखक जाने-माने पर्यावरणविद् हैं।
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