उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 में विपक्ष के सामने अवसर हैं, लेकिन दोनों राज्यों में चुनौती अलग-अलग है। उत्तर प्रदेश में सवाल है कि क्या चंद्रशेखर आजाद दलित राजनीति में नए नेतृत्व का विकल्प बनकर सपा और कांग्रेस के साथ एक व्यापक सामाजिक गठबंधन तैयार कर सकते हैं? क्या यह गठबंधन भाजपा के सामने पहले से मौजूद करीबी मुकाबले को सत्ता परिवर्तन की दिशा में ले जा सकता है?
उत्तराखंड में सवाल है कि क्या कांग्रेस और उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) राज्य आंदोलन की विरासत, क्षेत्रीय अस्मिता और सत्ता विरोधी असंतोष को एक साझा राजनीतिक विकल्प में बदल सकते हैं? दोनों राज्यों में भाजपा के सामने चुनौती खड़ी करने के लिए विपक्ष को केवल सीटों का बंटवारा नहीं, नेतृत्व और भरोसे का बंटवारा भी करना होगा।
उत्तर प्रदेश: चंद्रशेखर का दांव!
2022 के विधानसभा चुनाव में एनडीए ने उत्तर प्रदेश की 403 में से 273 सीटें जीती थीं। भाजपा अकेले 255 सीटों पर विजयी रही थी। सपा को 111, रालोद को आठ और सुभासपा को छह सीटें मिली थीं। कांग्रेस सिर्फ दो सीटों पर सिमट गई थी। लेकिन तब रालोद और सुभासपा सपा के साथ थे। आज दोनों एनडीए में हैं। इसलिए 2022 के गठबंधन के वोटों को सीधे जोड़कर 2027 का चुनावी गणित निकालना उचित नहीं होगा।
2024 का लोकसभा चुनाव ज्यादा महत्वपूर्ण संकेत देता है। एनडीए को लगभग 43.69 प्रतिशत और इंडिया गठबंधन को 43.53 प्रतिशत वोट मिले। अंतर महज 0.16 प्रतिशत का था। इसके बावजूद इंडिया गठबंधन ने 43 और एनडीए ने 36 सीटें जीतीं। चंद्रशेखर आजाद की पार्टी ने अलग चुनाव लड़कर नगीना सीट जीत ली। बसपा को लगभग 9.39 प्रतिशत वोट मिले, लेकिन वह एक भी सीट नहीं जीत सकी।
यानी भाजपा के सामने विपक्ष पहले ही लगभग बराबरी पर था। अब सवाल है कि क्या 2027 में यह मुकाबला सत्ता परिवर्तन की लड़ाई बन सकता है? नगीना में चंद्रशेखर ने 5,12,552 वोट हासिल कर भाजपा उम्मीदवार को 1,51,473 वोटों से हराया। सपा और बसपा के उम्मीदवार भी मैदान में थे। क्या यह जीत केवल एक सीट की सफलता थी या दलित राजनीति में नए नेतृत्व के उभार का संकेत?
चंद्रशेखर की लोगों के बीच मौजूदगी
चंद्रशेखर की राजनीति का एक महत्वपूर्ण पक्ष उनकी सक्रियता है। उत्पीड़न की शिकायत हो, सामाजिक अन्याय का मामला हो या सत्ता से टकराव का सवाल- वे प्रभावित लोगों के बीच पहुंचकर अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं। युवा दलित मतदाताओं के एक हिस्से को यह शैली आकर्षित कर सकती है। सवाल यह है कि क्या मायावती का परंपरागत राजनीतिक आधार नई पीढ़ी के बीच उसी तरह प्रभावी बना हुआ है?
बसपा की ऐतिहासिक सामाजिक ताकत अपनी जगह है, लेकिन क्या केवल पुराने संगठन और राजनीतिक विरासत के सहारे नई पीढ़ी का भरोसा कायम रखा जा सकता है? जब किसी युवा को अपना नेतृत्व संघर्ष के मैदान में कम और राजनीतिक बयानों में अधिक दिखाई देता है, तो क्या वह किसी नए विकल्प की तलाश नहीं करेगा?
यहीं चंद्रशेखर की संभावित भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। हालांकि यह मान लेना गलत होगा कि बसपा का पूरा वोट एएसपी के साथ चला जाएगा। दलित मतदाता किसी एक नेता या पार्टी के स्थायी नियंत्रण में नहीं हैं। लेकिन क्या चंद्रशेखर दलित युवाओं के एक हिस्से को सपा-कांग्रेस के साथ साझा मंच पर ला सकते हैं? 2027 का एक बड़ा सवाल यही है।
सपा के पास पिछड़े और मुस्लिम मतदाताओं का आधार है। कांग्रेस की राष्ट्रीय पहचान और कुछ क्षेत्रों में अपनी राजनीतिक स्वीकार्यता है। चंद्रशेखर के पास दलित युवाओं के बीच उभरती अपील है। क्या ये तीनों ताकतें एक साथ आकर भाजपा के सामाजिक समीकरण को चुनौती दे सकती हैं?
2024 के लोकसभा मतदान को विधानसभा क्षेत्रों के आधार पर देखें तो इंडिया गठबंधन लगभग 224 विधानसभा क्षेत्रों में, एनडीए 174 में और एएसपी पांच में आगे थी। यह विधानसभा चुनाव का परिणाम नहीं, लेकिन राजनीतिक स्थिति का एक महत्वपूर्ण संकेत जरूर है। लेकिन क्या गठबंधन के वोट वास्तव में एक-दूसरे को स्थानांतरित होंगे? क्या सपा कार्यकर्ता दलित उम्मीदवारों के लिए और दलित मतदाता सपा के उम्मीदवारों के लिए उसी उत्साह से मतदान करेंगे? क्या टिकट वितरण में चंद्रशेखर को पर्याप्त राजनीतिक हिस्सेदारी मिलेगी?
इन सवालों का जवाब गठबंधन की घोषणा से नहीं, उसके जमीनी तालमेल से मिलेगा। 125 सीटों का आंकड़ा असंभव मानकर खारिज नहीं किया जा सकता, लेकिन इसे हासिल करने के लिए विपक्ष को केवल अपने पुराने वोट बचाने नहीं, भाजपा के सामाजिक आधार में भी सेंध लगानी होगी।
उत्तराखंड: कांग्रेस-यूकेडी का समीकरण!
उत्तराखंड का चुनावी गणित है। यहां कांग्रेस और उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) का गठबंधन केवल सीटों का समझौता नहीं, बल्कि राज्य आंदोलन की विरासत और क्षेत्रीय अस्मिता को फिर से राजनीतिक केंद्र में लाने का प्रयास हो सकता है।2022 में भाजपा ने 47 और कांग्रेस ने 19 सीटें जीती थीं। भाजपा को लगभग 44.3 प्रतिशत, कांग्रेस को 37.9 प्रतिशत और यूकेडी को करीब 1.08 प्रतिशत वोट मिले थे। सिर्फ प्रदेशव्यापी वोट प्रतिशत देखें तो यूकेडी बहुत छोटी ताकत दिखाई देती है। लेकिन क्या क्षेत्रीय दल की भूमिका केवल कुल वोट प्रतिशत से तय होती है?
देवप्रयाग इसका उदाहरण है। 2022 में भाजपा को 17,330, यूकेडी को 14,742 और कांग्रेस को 13,585 वोट मिले थे। कांग्रेस और यूकेडी के वोट जोड़ने पर भाजपा से कहीं अधिक हो जाते हैं। द्वाराहाट में कांग्रेस महज 182 वोटों से जीती थी, जबकि यूकेडी को 9,804 वोट मिले थे। यहां यूकेडी का समर्थन कांग्रेस की जीत का अंतर काफी बढ़ा सकता था। साफ है कि कुछ क्षेत्रों में यूकेडी की मौजूदगी निर्णायक हो सकती है। लेकिन क्या दोनों दल अपने मतदाताओं को एक-दूसरे के पक्ष में मतदान के लिए तैयार कर पाएंगे?
उत्तराखंड क्रांति दल के पास राज्य आंदोलन की राजनीतिक विरासत है। अलग राज्य बनने के बाद भी क्या उत्तराखंड के लोगों को उन बुनियादी सवालों का जवाब मिला है जिनके लिए आंदोलन हुआ था? पलायन, स्थानीय रोजगार, भूमि, शिक्षा, स्वास्थ्य और पहाड़ के संसाधनों पर स्थानीय लोगों के अधिकार जैसे मुद्दे आज भी राजनीतिक बहस के केंद्र में हैं।
कांग्रेस के पास संगठन और प्रदेशव्यापी चुनाव लड़ने का अनुभव है। यूकेडी के पास क्षेत्रीय अस्मिता और राज्य आंदोलन से जुड़ी पहचान है। क्या दोनों मिलकर इन मुद्दों को एक विश्वसनीय राजनीतिक कार्यक्रम में बदल सकते हैं? कांग्रेस के सामने चुनौती यह होगी कि वह यूकेडी को केवल कुछ सीटें देकर औपचारिक सहयोगी न बनाए, बल्कि उसे राजनीतिक सम्मान और पर्याप्त हिस्सेदारी भी दे। दूसरी ओर यूकेडी को भी अपनी क्षेत्रीय पहचान बनाए रखते हुए व्यापक गठबंधन की जिम्मेदारी निभानी होगी।
उत्तराखंड में भाजपा के सामने चुनौतियां
उत्तराखंड में भाजपा के सामने सत्ता विरोधी माहौल की चुनौती भी है। भ्रष्टाचार के आरोप, बेरोजगारी, भर्ती प्रक्रियाओं पर सवाल और अंकिता भंडारी प्रकरण जैसे मुद्दे विपक्ष लगातार उठाता रहा है। लेकिन क्या इन मुद्दों पर बना असंतोष चुनाव में भाजपा के खिलाफ एकजुट मतदान में बदल पाएगा? क्या कांग्रेस और यूकेडी इन्हें चुनावी भाषणों से आगे ले जाकर व्यापक जनआंदोलन का रूप दे पाएंगे?
2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने राज्य की पांचों सीटें जीती थीं। उसे लगभग 56.8 प्रतिशत और कांग्रेस को 32.8 प्रतिशत वोट मिले थे। यह अंतर बताता है कि भाजपा का राजनीतिक आधार मजबूत है। विधानसभा और लोकसभा चुनाव के मतदाता व्यवहार में अंतर जरूर होता है, लेकिन इस जनसमर्थन को नजरअंदाज करना भी उचित नहीं होगा।
2022 में भाजपा के पास 47 सीटें थीं। उसे 12 से नीचे लाने के लिए कम-से-कम 36 मौजूदा सीटों पर हार का सामना करना होगा। क्या कांग्रेस और यूकेडी का गठबंधन इतना बड़ा राजनीतिक बदलाव ला सकता है? इसके लिए केवल गठबंधन नहीं, बल्कि नेतृत्व, संगठन और जनता के बीच भरोसे की जरूरत होगी।
सबसे बड़ा सवाल है क्या 2027 में उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड, दोनों राज्यों से एनडीए सत्ता से बाहर हो सकती है? या फिर विपक्ष एक बार फिर गठबंधन की संभावनाओं और चुनावी गणित में उलझकर रह जाएगा? इन दो चुनावों का सबसे बड़ा सवाल यही है- क्या विपक्ष के पास सत्ता बदलने की रणनीति के साथ जनता का भरोसा जीतने वाला नेतृत्व भी है?
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