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UPI पर MDR सरकार की नई चुनौती: कहीं ये लोगों की ‘भुगतान स्वतंत्रता’ का हरण तो नहीं?

सार

देश में अब तक यूपीआई से पेमेंट पूरी तरह फ्री था। इसलिए इसका चलन लगातार बढ़ रहा था। आज देश में प्रतिदिन औसतन 66 करोड़ ट्रांजेक्शन यूपीआई के मार्फत होते हैं। करीब 55 करोड़ लोगों के पास कोई न कोई यूपीआई एप है।
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UPI पर MDR लोगों की ‘भुगतान स्वतंत्रता’ का हरण तो नहीं? - फोटो : AI
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विस्तार
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UPI MDR Charges: यूपीआई (यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस) जैसी भारत में सर्वाधिक लोकप्रिय रियल टाइम (तत्काल) भुगतान प्रणाली पर भारत सरकार द्वारा लगाने वाले शुल्क पर मचे बवाल और सियासत के बीच यह बात दब कर रह गई है कि सरकार जिसे ‘शुल्क’ बता रही है, वह वास्तव में एक ‘कर’ ही है। कहने को इसे व्यापारियों से वसूला जाना है, लेकिन यह बात समझने के लिए अर्थशास्त्री होना जरूरी नहीं है कि शुल्क का यह बोझ व्यापारी बड़ी चतुराई से आम लोगों पर शिफ्ट कर देंगे। और हमे शायद इसका पता भी न चले। आम लोगों को यह डर भी है कि यदि एमडीआर से सरकार को खासी कमाई होने लगी तो वह सभी यूपीआई पेमेंटों पर टैक्स लगा सकती है।

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उधर नीट पेपर लीक और ई-20 पेट्रोल मामले में लीड लेने से चूकी कांग्रेस अब यूपीआई पेमेंट को राष्ट्रीय मुद्दा बनाने की कोशिश में जुटी है। उसे लग रहा है कि चूंकि यूपीआई पेमेंट का मुद्दा आम लोगों से जुड़ा है, इसलिए उसे इसका राजनीतिक लाभ मिल सकता है।
 

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इसके लिए मोदी सरकार को घेरते हुए आरोप लगाया कि अब तक ‘फ्री’ रहे यूपीआई पर एमडीआर अमेरिका के दबाव में लगाया गया है। उन्होंने इसे तत्काल वापस लेने की मांग की है। सपा नेता अखिलेश यादव ने आरोप लगाया कि केन्द्र सरकार ‘चुंगीजीवी’ हो गई है। आप सांसद संजय सिंह ने कहा कि यूपीआई पर सरकार के फैसले का बोझ आम उपभोक्ता पर ही पड़ेगा। 

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गौरतलब है कि देश में अब तक यूपीआई से पेमेंट पूरी तरह फ्री था। इसलिए इसका चलन लगातार बढ़ रहा था। आज देश में प्रतिदिन औसतन 66 करोड़ ट्रांजेक्शन यूपीआई के मार्फत होते हैं। करीब 55 करोड़ लोगों के पास कोई न कोई यूपीआई एप है। मोदी सरकार ने  देश में नकदी की जगह डिजीटल पेमेंट को बढ़ावा देने के उद्देश्य से यूपीआई पेमेंट सिस्टम की शुरूआत 11 अप्रैल 2016 को की थी। यह सरकार की कोशिशों का ही नतीजा है कि डिजीटल पेमेंट मामले में आज भारत दुनिया में नंबर वन है। अकेले पिछले महीने इसके जरिए 29.9 लाख करोड़ रुपये का लेन-देन हुआ।

लेकिन लगता है सरकार अपनी ही इस सफलता में सुई चभोना चाहती है, जिसके पीछे कारण यूं तो डिजीटल पेमेंट सिस्टम को ज्यादा मजबूत और प्रभावी बनाने का बताया जा रहा है। लेकिन आम नागरिक इसमें अपनी भुगतान स्वतंत्रता के हरण के संकेत बूझ रहा है। केन्द्र सरकार ने हाल में यूपीआई पेमेंट का नया फ्रेमवर्क जारी करते हुए कहा कि  आगामी 15 अक्टूबर से इस पर 2000 रुपए से ज़्यादा के सामान्य मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर 0.4 फ़ीसदी एमडीआर देना होगा। इस एमडीआर की वसूली पर 18  प्रतिशत जीएसटी भी लगेगा। बैंकिंग की भाषा में व्यक्ति से व्यक्ति को किए जाने वाले डिजीटल पेमेंट को ‘पीटूपी’ और व्यक्ति से व्यापारी को किए जाने वाले  पेमेंट को ‘पीटूएम’ पेमेंट कहते हैं। यहां एमडीआर का अर्थ है ‘मर्चेंट डिस्काउंट रेट।‘ कहने को यह ‘छूट’ है, लेकिन हकीकत में ‘शुल्क’ है। सरकार का दावा है कि एमडीआर शुल्क आम ग्राहक के बजाए बड़े व्यापारियों को ही देना होगा।

जानकारों के मुताबिक यूपीआई भुगतान में मात्रा की दृष्टि से देखें तो जिस हिस्से पर एमडीआर लगेगा, वह 30 फीसदी ही है। इसकी अधिकतम सीमा 300 रू. है, जो सरकार की दृष्टि से अत्यंत ‘मामूली’ है। अलबत्ता कुछ ज़रूरी सेवाओं के लिए एमडीआर के तहत 2 हजार रुपए से ज़्यादा के ट्रांजेक्शन पर 5 रुपए का फ्लैट एमडीआर लगेगा।

यह नियम रेलवे, टेलीकाॅम, बीमा, पेट्रोल डीजल और खेती से जुड़े साजो सामान पर लागू होगा। एमडीआर आयद करने के पीछे सरकार का तर्क है कि देश में  यूपीआई सिस्टम के संचालन और उसे बेहतर बनाने के मकसद से यह शुल्क आयद किया गया है। यह सुविचारित है और इसे किसी दबाव में वापस नहीं लिया जाएगा। इसको लेकर संसद में कानून सरकार पहले ही पास करवा चुकी है। इस बीच यह मामला कोर्ट में भी पहुंच गया है। दूसरी तरफ इस  ‘शुल्क’ को लेकर कई तरह की आशंकाएं भी है। मसलन शेयर ब्रोकर्स पर यह किस तरह से लागू होगा, क्योंकि वह अलग तरह का धंधा और भुगतान सिस्टम है।  

भारत सरकार ने देश में यूपीआई  को प्रमोट करने के लिए 2021-22 से प्रोत्साहन योजना शुरू की थी। इसके तहत ग्राहक से छोटे दुकानदार को होने वाले 2,000 तक के यूपीआई पेमेंट पर 0.15% इंसेंटिव दिया जाता था। 2024-25 तक इस पर 8,276 करोड़ रू. का  का इंसेंटिव दिया गया था। अब यह इंसेटिव सरकार को महंगा पड़ने लगा है। शायद इसलिए भी सरकार पिछले दरवाजे से इसकी भरपाई करना चाहती है। 

उधर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने अमेरिकी दबाव का जो आरोप लगाया है, उसके पीछे वजह अमेरिका की शीर्ष वार्ताकार संस्था ‘यूएस ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव’ की इस साल आई रिपोर्ट है। इसमें चिंता व्यक्त की गई थी कि अमेरिका की पेमेंट सेवा प्रदाता कंपनियां भारत के यूपीआई इकोसिस्टम में शामिल नहीं हो पा रही हैं। क्योंकि भारत की जीरो एमडीआर और भारत सरकार का ‘रूपे नेटवर्क’ दोनो देशों के बीच बड़ी ‘व्यापार बाधा’ है। संक्षेप में कहें तो डोनाल्ड प्रशासन भारत में अमेरिकी कंपनियों के लिए डिजीटल पेमेंट्स का रास्ता ‘आसान’ बनाए जाने का हिमायती है।  

इस बीच सरकारी सूत्रों का दावा है कि देश में यूपीआई से होने वाला 96 फीसदी लेनदेन चूंकि दो हजार रुपए से कम का होता है, उस पर सरकार कोई शुल्क नहीं लगा रही है। सिर्फ बाकी के चार फीसदी लेनदेन पर शुल्क लगेगा, वह भी महज 0.40 फीसदी होगा। लेकिन जमीनी वास्तविकता यह है कि चार फीसदी लेनदेन का मौद्रिक मूल्य 66 फीसदी है। बाकी जो 96 फीसदी लेनदेन है उसका मौद्रिक मूल्य केवल 34 फीसदी है। आंकड़ों में समझें तो देश में कुल 314 लाख करोड़ रुपए के ट्रांजेक्शन में 207 लाख करोड़ का लेनदेन वो है, जो बाकी चार फीसदी के दायरे में है।

इसी से सरकार को कमाई होगी, जीएसटी से मिलने वाली राशि अलग है। एमडीआर से मिली राशि सभी में बंटेगी। जिसमें आप के खाते वाली बैंक को 40 फीसदी, व्यापारी के बैंक को 30 फीसदी, यूपीआई एप्लीकेशन ऐप जैसे कि फोन पे, गूगल आदि को 20 प्रतिशत और बाकी का दस फीसदी हिस्सा अन्य प्रोसेसिंग एजेंसी को जाएगा। हालांकि भारत सरकार ने अपना ‘भीम’ पेंमेंट ऐप भी लांच किया है, लेकिन यूपीआई पेमेंट के बाजार में उसकी हिस्सेदारी 1 फीसदी से भी कम है। जबकि भारतीय यूपीआई बाजार में सबसे बड़ी खिलाड़ी अमेरिकी कंपनियां ‘फोन पे’ और ‘गूगल पे’ हैं।

बताया जाता है कि इन सभी कंपनियों और बैंकों की शिकायत है कि यूपीआई ‘फ्री’ होने से इस सेवा के संचालन में उन्हें घाटा उठाना पड़ता है। आरबीआई के डेटा विश्लेषण के आधार कुछ अर्थवेत्ताअों का मानना है कि यूपीआई मैनेज करने में करीब ढाई हजार से 8 हजार करोड़ तक खर्च आता है। 

यह सही है कि तकनीकी तौर पर एमडीआर बड़े व्यापारिक भुगतान पर ही लगाया गया है। लेकिन पहले ही कर अपवंचन में माहिर व्यापारी यह शुल्क और जीएसटी अपनी जेब से क्योंकर देगा? वह इसे या तो आम उपभोक्ता की तरफ खिसकाएगा या फिर शुल्क से बचने नकद भुगतान के लिए कहेगा। ऐसी कोशिशें शुरू भी हो चुकी हैं। खासकर पेट्रोल पंपों जैसी जगहों पर तो 2 हजार से ऊपर का पेमेंट नकदी में मांगने लगे हैं। यह भी संभव है कि दुकानदार आप से 1900 रू. तक का भुगतान यूपीआई से और बाकी का नकद मांगे ताकि एमडीआर और जीएसटी से बचा जा सके। अगर वह शुल्क देगा भी तो इसकी वसूली वह आम उपभोक्ता की जेब से ही करेगा। यानी जेब आम आदमी की कटनी है।

सरकार की तरफ से कहा जा रहा है कि व्यापारी आम यूपीआई की वजह से आम उपभोक्ता का  शोषण न करें, इसकी सख्त माॅनिटरिंग की जाएगी, लेकिन व्यावहारिक रूप से यह संभव नहीं है। अगर समय रहते इस एमडीआर को  लेकर लोगों की आशंकाएं दूर न हुई तो संभव है कि देश में नकदी भुगतान का युग फिर से लौट आए। वैसे भी रिजर्व बैंक के आंकड़े बताते हैं कि देश में यूपीआई की व्यापक लोकप्रियता के बावजूद  नकदी का चलन कम नहीं हुआ है। उसे अभी भी उतने ही नोट छापने पड़ रहे हैं। एमडीआर के बाद क्या होगा, इसकी कल्पना की जा सकती है।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

 

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