यूजीसी रेगुलेशन 2026 को लेकर देशभर के विश्वविद्यालयों में जिस प्रकार की प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं, वे केवल समर्थन और विरोध की सामान्य प्रतिक्रियाएं नहीं हैं; वे हमारे शैक्षिक और बौद्धिक वातावरण की दिशा को भी प्रतिबिंबित करती हैं। दअरसल, जो लोग अब तक यूजीसी या भारत सरकार की नीतियों के आलोचक रहे, वे इस बार वर्गगत् आयामों के उभार के साथ या तो इसके प्रबल समर्थक बन गए हैं या उतने ही तीव्र विरोधी। यह परिवर्तन स्वयं इस बात की ओर संकेत करता है कि हमारा विमर्श कहीं न कहीं वैचारिक स्थिरता से अधिक पहचान-आधारित प्रतिक्रिया में बदलता जा रहा है।
प्रश्न यह नहीं है कि समर्थन उचित है या विरोध। प्रश्न यह है कि हम किसी कानून का मूल्यांकन किस प्रक्रिया और किस दृष्टिकोण से करते हैं। यदि इस कानून के क्रियान्वयन से किसी भी वर्ग के प्रति असमानता या अन्याय की आशंका व्यक्त की जा रही है, तो क्या यह अधिक रचनात्मक न होता कि एक स्वतंत्र, सर्व प्रतिनिधि और पारदर्शी समीक्षा-समिति का गठन किया जाता? ऐसी समिति, जिसमें विविध सामाजिक वर्गों, शैक्षणिक समुदायों और वैचारिक धाराओं का संतुलित प्रतिनिधित्व हो, विषय को संवैधानिक कसौटी पर परखे, तथ्यों की समीक्षा करें और ठोस अनुशंसाएँ प्रस्तुत करे, यही लोकतांत्रिक परिपक्वता का मार्ग है।
क्या है नया नियम?
सीधे समर्थन और सीधे तीव्र विरोध के बीच उभरता ध्रुवीकरण संवाद की संभावनाओं को संकुचित करता है। विश्वविद्यालय वह स्थान है जहां मतभेदों को विमर्श में बदला जाता है, न कि वैचारिक खाइयों में। आज आवश्यकता सेतु-निर्माण की है, न कि और गहरी रेखाएं खींचने की। निस्संदेह, किसी भी व्यक्ति के साथ जाति, धर्म, नस्ल, दिव्यांगता, क्षेत्र, भाषा या लिंग के आधार पर भेदभाव अस्वीकार्य है। प्रत्येक नागरिक को उसकी योग्यता और संवैधानिक अधिकारों के अनुरूप अवसर मिलना चाहिए। परंतु यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि न्याय की स्थापना भय के वातावरण में नहीं, बल्कि विश्वास और पारदर्शिता के साथ हो।
सवाल यह भी उठता है कि कहीं इन नियमों के कारण सामान्य वर्ग (UR) के विद्यार्थियों के मन में अनावश्यक आशंका तो उत्पन्न नहीं हो रही? यदि कोई छात्र सामान्य संवाद, हास्य या अनौपचारिक अभिव्यक्ति में स्वयं को असुरक्षित महसूस करे, तो यह स्वस्थ शैक्षणिक संस्कृति के अनुकूल नहीं है। कानून का उद्देश्य सुरक्षा देना है, भय उत्पन्न करना नहीं।
क्या है उद्देश्य?
यह सत्य है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और पूर्व में हुई दुखद घटनाओं की पृष्ठभूमि में ये नियम लाए गए हैं। उनका मूल उद्देश्य भेदभाव को समाप्त करना है। किंतु जब हम समावेशन की बात करते हैं, तो उसका अर्थ केवल कुछ वर्गों का संरक्षण नहीं, बल्कि सभी वर्गों के विश्वास की सुनिश्चितता भी है। यदि EWS और PwD जैसी श्रेणियों का स्पष्ट उल्लेख है, तो UR (सामान्य वर्ग) के विद्यार्थियों को भी यह आश्वस्त किया जाना चाहिए कि वे समान रूप से संरक्षित और सम्मानित हैं। समावेश का वास्तविक अर्थ है, किसी को भी उपेक्षित या आशंकित न छोड़ना, साथ ही, यह भी देखा गया है कि कभी-कभी प्रशासनिक या अनुशासनात्मक कार्रवाइयों को सामाजिक पहचान से जोड़कर प्रस्तुत किया जाता है, जबकि उनका वास्तविक कारण कार्यप्रणाली या अनुशासन से संबंधित होता है। ऐसी स्थितियों में निष्पक्ष, पारदर्शी और तटस्थ जांच-प्रक्रिया अनिवार्य है, ताकि कानून न्याय का माध्यम बने, आरोप-प्रत्यारोप का उपकरण नहीं।
विश्वविद्यालयों का ध्येय विभाजन नहीं, उत्कृष्टता है। वहाँ जाति या वर्ग नहीं, बल्कि ज्ञान, कौशल और बौद्धिक क्षमता का सम्मान होना चाहिए। सामाजिक न्याय और समान अवसर अनिवार्य हैं, परंतु उनके साथ संवाद, विश्वास और साझा उत्तरदायित्व भी उतने ही आवश्यक हैं। भारत की सांस्कृतिक चेतना “सर्वधर्म समभाव” और “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना से अनुप्राणित है। हमारा संविधान समान अधिकार और न्याय के सिद्धांत पर आधारित है, इसलिए किसी भी कानून का अंतिम उद्देश्य किसी एक वर्ग का समर्थन नहीं, बल्कि समूचे समाज में न्यायपूर्ण संतुलन स्थापित करना होना चाहिए। यदि किसी प्रावधान से भ्रम या असंतोष उत्पन्न हो रहा है, तो समाधान विरोध या समर्थन के चरम में नहीं, बल्कि पुनर्विचार, संवाद और आवश्यक संशोधन में निहित है। लोकतंत्र की शक्ति इसी में है कि वह असहमति को विघटन में नहीं, बल्कि सुधार में परिवर्तित करे।
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