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Mahakumbh 2025: आखिर क्यों अखाड़ों के बिना नहीं की जा सकती कुंभ की कल्पना

सार

वर्तमान में भारत में 13 प्रमुख अखाड़े हैं, जो कुंभ मेला जैसे बड़े धार्मिक आयोजनों में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। प्रत्येक अखाड़े का अपना विशिष्ट इतिहास, परंपरा और ईष्ट देवता होते हैं, और इनके सदस्य साधना, तपस्या और समाज की सेवा में व्यस्त रहते हैं।

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वर्तमान में भारत में 13 प्रमुख अखाड़े हैं, जो कुम्भ मेला जैसे बड़े धार्मिक आयोजनों में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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प्रयागराज महाकुंभ  इन दिनों करोड़ों सनातन धर्मावलम्बियों के लिए आस्था और विदेशियों के लिए भारतीय संस्कृति के प्रति कौतुहूल और आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है। चार स्थानों पर बारी-बारी 12 सालों में कुंभ और महाकुंभ के रूप में आयोजित होने वाले विश्व के इस सबसे मानव जमावड़ा और महापर्व विशेष रूप से उन साधुओं के लिए महत्वपूर्ण होता है, जो अखाड़ों के सदस्य होते हैं। इन अखाड़ों का न केवल धार्मिक कर्तव्य है बल्कि ये भारतीय समाज में एकता, शांति और जागरूकता का प्रसार भी करते हैं।

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दरअसल, सिद्धांत रूप में कुंभ मेला केवल एक धार्मिक महापर्व है जो संगम पर विशेष ग्रहों की स्थिति के अनुसार होता है। इसे बिना अखाड़ों के भी आयोजित किया जा सकता है, लेकिन यह पारंपरिक और सांस्कृतिक रूप से अधूरा माना जाएगा। अखाड़ों की अनुपस्थिति से इसका आकर्षण, आध्यात्मिक महत्व और ऐतिहासिक परंपरा कमजोर हो सकती है, इसलिए कुंभ मेले की पहचान अखाड़ों की उपस्थिति से ही पूरी होती है।

अखाड़ा परंपरा का इतिहास

अखाड़ा परंपरा की शुरुआत प्राचीन भारतीय संस्कृति में तब से मानी जाती है जब साधुओं और तपस्वियों ने ध्यान और साधना के लिए संगठित रूप से ये केंद्र बनाए। माना जाता है कि अखाड़ा परंपरा महाभारत और रामायण काल से जुड़ी हुई है, तब धर्म, तपस्या और साधना के लिए समर्पित समूहों का अस्तित्व था। परंपरागत् रूप से इन अखाड़ों का उद्देश्य साधुओं को एकजुट करना और उन्हें धर्म, योग, और तपस्या के माध्यम से समाज में जागरूकता फैलाने के लिए प्रेरित करना था। ऐसी भी मान्यता है कि अखाड़ा व्यवस्था शंकराचार्य द्वारा स्थापित की गई थी जिसका उद्देश्य सनातन धर्म को पुनर्जीवित करना और उसे एक संगठित रूप में प्रस्तुत करना था।

साधु समाज के 13 अखाड़े

वर्तमान में भारत में 13 प्रमुख अखाड़े हैं, जो कुंभ मेला जैसे बड़े धार्मिक आयोजनों में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। प्रत्येक अखाड़े का अपना विशिष्ट इतिहास, परंपरा और ईष्ट देवता होते हैं, और इनके सदस्य साधना, तपस्या और समाज की सेवा में व्यस्त रहते हैं। इनमें कुछ शैव सन्यासियों के तथा कुछ वैष्णव और अन्य पन्थों के अखाड़े हैं। कुछ समय पहले किन्नर अखाड़ा भी कुंभ में हिस्सा लेने लगा है जिसके प्रमुख स्वामी लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी हैं। समाज के 13 प्रमुख अखाड़ों का विवरण इस प्रकार है।

1. निरंजनी अखाड़ा- यह अखाड़ा 826 ईस्वी में गुजरात के मांडवी में स्थापित हुआ माना जाता है। इनके ईष्ट देव भगवान शंकर के पुत्र कार्तिकस्वामी हैं। इनमें दिगम्बर, साधु, महन्त व महामंडलेश्वर होते हैं। इनकी शाखाएं इलाहाबाद, उज्जैन, हरिद्वार, र्त्यंबकेश्वर व उदयपुर में हैं।

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2. जूना अखाड़ा- ऐसी मान्यता है कि यह अखाड़ा 1145 में उत्तराखण्ड के कर्णप्रयाग में स्थापित हुआ। इसे भैरव अखाड़ा भी कहते हैं। इनके ईष्ट देव रुद्रावतार दत्तात्रेय हैं। इसका केंद्र वाराणसी के हनुमान घाट पर माना जाता है। हरिद्वार में मायादेवी मंदिर के पास इनका आश्रम है। इस अखाड़े के नागा साधु माने जाते हैं और वर्तमान में साधू समाज का यही सबसे बड़ा अखाड़ा माना जाता है।

3. महानिर्वाण अखाड़ा- यह अखाड़ा 681 ईस्वी में स्थापित हुआ माना जाता है। कुछ लोगों का मत है कि इसकी स्थापना बिहार-झारखण्ड के बैजनाथ धाम में हुआ था, जबकि कुछ इसका जन्म स्थान हरिद्वार में नील धारा के पास मानते हैं। इनके ईष्ट देव कपिल महामुनि हैं। इनकी शाखाएं इलाहाबाद, हरिद्वार, उज्जैन, र्त्यंबकेश्वर, ओंकारेश्वर और कनखल में हैं।

4. अटल अखाड़ा- यह अखाड़ा 569 ईस्वी में गोंडवाना क्षेत्र में स्थापित किया गया बताया जाता है। इनके ईष्ट देव भगवान गणेश हैं। यह सबसे प्राचीन अखाड़ों में से एक माना जाता है। इसकी मुख्य पीठ पाटन में है लेकिन आश्रम कनखल, हरिद्वार, इलाहाबाद, उज्जैन व र्त्यंबकेश्वर में भी हैं।

5. आह्वान अखाड़ा- माना जाता है कि यह अखाड़ा 646 में स्थापित हुआ और 1603 में पुनर्संयोजित किया गया। इनके ईष्ट देव श्री दत्तात्रेय और श्री गजानन हैं। इस अखाड़े का केंद्र स्थान काशी है। इसका आश्रम ऋषिकेश में भी है।

6. आनंद अखाड़ा- इस अखाड़े की स्थापना 855 ईस्वी में मध्यप्रदेश के बेरार में मानी जाती है। इसका केंद्र वाराणसी में है। इसकी शाखाएं इलाहाबाद, हरिद्वार, उज्जैन में भी हैं।

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भारत में अखाड़े न केवल धार्मिक आस्थाओं का प्रतीक हैं, बल्कि ये समाज में सकारात्मक ऊर्जा और धार्मिक सद्भाव फैलाने का कार्य भी करते हैं। - फोटो : अमर उजाला
7. पंचाग्नि अखाड़ा- ऐसी मान्यता है कि इस अखाड़े की स्थापना 1136 में हुई थी। इनकी इष्ट देव गायत्री हैं और इनका प्रधान केंद्र काशी है। इनके सदस्यों में चारों पीठ के शंकराचार्य, ब्रहमचारी, साधु व महामंडलेश्वर शामिल हैं। परंपरानुसार इनकी शाखाएं इलाहाबाद, हरिद्वार, उज्जैन व र्त्यंबकेश्वर में हैं।

8. नागपंथी गोरखनाथ अखाड़ा- गोरखपंथियों के अनुसार यह अखाड़ा ईस्वी 866 में अहिल्या-गोदावरी संगम पर स्थापित हुआ। इनके संस्थापक पीर शिवनाथजी हैं। इनका मुख्य दैवत गोरखनाथ है और इनमें बारह पंथ हैं। यह संप्रदाय योगिनी कौल नाम से प्रसिद्ध है और इनकी र्त्यंबकेश्वर शाखा र्त्यंबकंमठिका नाम से प्रसिद्ध है।

9. वैष्णव अखाड़ा- यह बालानंद गैर शैव अखाड़ा ईस्वी 1595 में दारागंज में श्री मध्यमुरारी में स्थापित हुआ। समय के साथ इनमें निर्मोही, निर्वाणी, खाकी आदि तीन संप्रदाय बने। इनका अखाड़ा र्त्यंबकेश्वर में मारुति मंदिर के पास था। 1848 तक शाही स्नान र्त्यंबकेश्वर में ही हुआ करता था। परंतु 1848 में शैव व वैष्णव साधुओं में पहले स्नान कौन करे इस मुद्दे पर झगड़े हुए। श्रीमंत पेशवाजी ने यह झगड़ा मिटाया। उस समय उन्होंने र्त्यंबकेश्वर के नजदीक चक्रतीर्था पर स्नान किया।

10.उदासीन पंचायती बड़ा अखाड़ा- इस संप्रदाय के संस्थापक श्री चंद्रआचार्य उदासीन हैं। इनमें सांप्रदायिक भेद हैं। इनमें उदासीन साधु, मंहत व महामंडलेश्वरों की संख्या ज्यादा है। उनकी शाखाएं शाखा प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन, र्त्यंबकेश्वर, भदैनी, कनखल, साहेबगंज, मुलतान, नेपाल व मद्रास में है।

11.उदासीन नया अखाड़ा- इसे बड़ा उदासीन अखाड़ा के कुछ सांधुओं ने विभक्त होकर स्थापित किया। इनके प्रवर्तक मंहत सुधीरदासजी थे। इनकी शाखाएं प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन, र्त्यंबकेश्वर में हैं।

12. निर्मल पंचायती अखाड़ा- यह अखाड़ा 1784 में  अपनी स्थापना मानता है। सन् 1784 में हरिद्वार कुंभ मेले के समय एक बड़ी सभा में विचार विनिमय करके श्री दुर्गासिंह महाराज ने इसकी स्थापना की। इनकी ईष्ट पुस्तक श्री गुरुग्रन्थ साहिब है। इनमें सांप्रदायिक साधु, मंहत व महामंडलेश्वरों की संख्या बहुत है। इनकी शाखाएं प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन और र्त्यंबकेश्वर में हैं।

13. निर्मोही अखाड़ा- निर्मोही अखाड़े की स्थापना 1720 में रामानंदाचार्य ने की थी। इस अखाड़े के मठ और मंदिर उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात और बिहार में हैं। पुराने समय में इसके अनुयायियों को तीरंदाजी और तलवारबाजी की शिक्षा भी दिलाई जाती थी।

14.किन्नर अखाड़ा- यह अखाड़ा भारत में एक अनोखा धार्मिक और सामाजिक संगठन है, जो ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों और उनकी सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने के उद्देश्य से स्थापित किया गया है। इसकी स्थापना 2015 में आचार्य महामंडलेश्वर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी ने की थी। किन्नर अखाड़ा न केवल ट्रांसजेंडर समुदाय के धार्मिक अधिकारों को मान्यता देने का प्रयास करता है, बल्कि उन्हें समाज में सम्मानजनक स्थान दिलाने के लिए भी काम करता है। इसके माध्यम से किन्नर समुदाय सामाजिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक स्तर पर अपनी उपस्थिति और योगदान को सामने लाने का प्रयास करता है।

 कुंभ में अखाड़ों की अत्यधिक भूमिका

भारत में अखाड़े न केवल धार्मिक आस्थाओं का प्रतीक हैं, बल्कि ये समाज में सकारात्मक ऊर्जा और धार्मिक सद्भाव फैलाने का कार्य भी करते हैं। कुम्भ मेला जैसे आयोजनों में इनकी भूमिका अत्यधिक महत्वपूर्ण होती है, जहाँ ये साधु अपनी तपस्या और साधना के माध्यम से समाज को जागरूक करते हैं और भारतीय संस्कृति के मूल्यों को संरक्षित करते हैं। चारों कुम्भ स्थलों का प्रशासन अखाड़ा परिषद के सुझावों के अनुसार कुम्भ की सारी व्यवस्थाएं करता है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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