भारत में अखाड़े न केवल धार्मिक आस्थाओं का प्रतीक हैं, बल्कि ये समाज में सकारात्मक ऊर्जा और धार्मिक सद्भाव फैलाने का कार्य भी करते हैं।
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7. पंचाग्नि अखाड़ा- ऐसी मान्यता है कि इस अखाड़े की स्थापना 1136 में हुई थी। इनकी इष्ट देव गायत्री हैं और इनका प्रधान केंद्र काशी है। इनके सदस्यों में चारों पीठ के शंकराचार्य, ब्रहमचारी, साधु व महामंडलेश्वर शामिल हैं। परंपरानुसार इनकी शाखाएं इलाहाबाद, हरिद्वार, उज्जैन व र्त्यंबकेश्वर में हैं।
8. नागपंथी गोरखनाथ अखाड़ा- गोरखपंथियों के अनुसार यह अखाड़ा ईस्वी 866 में अहिल्या-गोदावरी संगम पर स्थापित हुआ। इनके संस्थापक पीर शिवनाथजी हैं। इनका मुख्य दैवत गोरखनाथ है और इनमें बारह पंथ हैं। यह संप्रदाय योगिनी कौल नाम से प्रसिद्ध है और इनकी र्त्यंबकेश्वर शाखा र्त्यंबकंमठिका नाम से प्रसिद्ध है।
9. वैष्णव अखाड़ा- यह बालानंद गैर शैव अखाड़ा ईस्वी 1595 में दारागंज में श्री मध्यमुरारी में स्थापित हुआ। समय के साथ इनमें निर्मोही, निर्वाणी, खाकी आदि तीन संप्रदाय बने। इनका अखाड़ा र्त्यंबकेश्वर में मारुति मंदिर के पास था। 1848 तक शाही स्नान र्त्यंबकेश्वर में ही हुआ करता था। परंतु 1848 में शैव व वैष्णव साधुओं में पहले स्नान कौन करे इस मुद्दे पर झगड़े हुए। श्रीमंत पेशवाजी ने यह झगड़ा मिटाया। उस समय उन्होंने र्त्यंबकेश्वर के नजदीक चक्रतीर्था पर स्नान किया।
10.उदासीन पंचायती बड़ा अखाड़ा- इस संप्रदाय के संस्थापक श्री चंद्रआचार्य उदासीन हैं। इनमें सांप्रदायिक भेद हैं। इनमें उदासीन साधु, मंहत व महामंडलेश्वरों की संख्या ज्यादा है। उनकी शाखाएं शाखा प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन, र्त्यंबकेश्वर, भदैनी, कनखल, साहेबगंज, मुलतान, नेपाल व मद्रास में है।
11.उदासीन नया अखाड़ा- इसे बड़ा उदासीन अखाड़ा के कुछ सांधुओं ने विभक्त होकर स्थापित किया। इनके प्रवर्तक मंहत सुधीरदासजी थे। इनकी शाखाएं प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन, र्त्यंबकेश्वर में हैं।
12. निर्मल पंचायती अखाड़ा- यह अखाड़ा 1784 में अपनी स्थापना मानता है। सन् 1784 में हरिद्वार कुंभ मेले के समय एक बड़ी सभा में विचार विनिमय करके श्री दुर्गासिंह महाराज ने इसकी स्थापना की। इनकी ईष्ट पुस्तक श्री गुरुग्रन्थ साहिब है। इनमें सांप्रदायिक साधु, मंहत व महामंडलेश्वरों की संख्या बहुत है। इनकी शाखाएं प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन और र्त्यंबकेश्वर में हैं।
13. निर्मोही अखाड़ा- निर्मोही अखाड़े की स्थापना 1720 में रामानंदाचार्य ने की थी। इस अखाड़े के मठ और मंदिर उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात और बिहार में हैं। पुराने समय में इसके अनुयायियों को तीरंदाजी और तलवारबाजी की शिक्षा भी दिलाई जाती थी।
14.किन्नर अखाड़ा- यह अखाड़ा भारत में एक अनोखा धार्मिक और सामाजिक संगठन है, जो ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों और उनकी सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने के उद्देश्य से स्थापित किया गया है। इसकी स्थापना 2015 में आचार्य महामंडलेश्वर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी ने की थी। किन्नर अखाड़ा न केवल ट्रांसजेंडर समुदाय के धार्मिक अधिकारों को मान्यता देने का प्रयास करता है, बल्कि उन्हें समाज में सम्मानजनक स्थान दिलाने के लिए भी काम करता है। इसके माध्यम से किन्नर समुदाय सामाजिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक स्तर पर अपनी उपस्थिति और योगदान को सामने लाने का प्रयास करता है।
कुंभ में अखाड़ों की अत्यधिक भूमिका
भारत में अखाड़े न केवल धार्मिक आस्थाओं का प्रतीक हैं, बल्कि ये समाज में सकारात्मक ऊर्जा और धार्मिक सद्भाव फैलाने का कार्य भी करते हैं। कुम्भ मेला जैसे आयोजनों में इनकी भूमिका अत्यधिक महत्वपूर्ण होती है, जहाँ ये साधु अपनी तपस्या और साधना के माध्यम से समाज को जागरूक करते हैं और भारतीय संस्कृति के मूल्यों को संरक्षित करते हैं। चारों कुम्भ स्थलों का प्रशासन अखाड़ा परिषद के सुझावों के अनुसार कुम्भ की सारी व्यवस्थाएं करता है।
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