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ट्रिपल तलाकः भाजपा सरकार और एक इतिहास

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बीते कई दिनों से राष्ट्रीय मुद्दा बना ट्रिपल तलाक़ आज एक इतिहास भी बन गया।  - फोटो : PTI
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बीते कई दिनों से राष्ट्रीय मुद्दा बना ट्रिपल तलाक़ आज एक इतिहास भी बन गया। इस परंपरा को गैरज़मानती अपराध की कैटेगरी में रखने वाला विधेयक करीब चार घंटे की बहस के बाद राज्यसभा में पास हो गया। कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने इसे सदन में पेश किया था। इस दौरान गर्मागर्म बहस हुई और जेडीयू, अन्नाद्रमुक ने सदन से वाकआउट किया। 

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बरहाहल, हर सदस्य अपनी पार्टी लाइन के अनुसार या तो इस विधेयक का विरोध कर रहा था या फिर समर्थन। लोकसभा की चर्चा में जो लोग इस विधेयक का विरोध कर रहे थे, उनके तर्क उतने असरदार नहीं दिखे जितना इस विधेयक का समर्थन करने वालों के थे। वोटिंग के बाद राज्यसभा में भी तीन तलाक बिल पास। वोटिंग के दौरान विपक्ष के कई सांसद गायब रहे। बिल के पक्ष में 99 और विरोध में 84 वोट पड़े। अब ये बिल कानून का रूप लेगा। अब तीन तलाक देने पर आरोपी को तीन साल की जेल होगी। 

आखिर क्या स्थिति रही तीन तलाक पर कानून की?  
दरअसल, पिछली लोकसभा ने इसे पारित कर दिया था लेकिन कांग्रेस ने इसे राज्यसभा में लटका दिया था। संसद के ऊपरी सदन में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का बहुमत नहीं होने के कारण यह विधेयक क़ानून का रूप नहीं ले सका था।
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क्या दिक्कतें रहीं बिल को लेकर 
ट्रिपल तलाक़ पर क़ानूनी पाबंदी लगाने का पुरज़ोर विरोध कर रहे मुस्लिम और सेक्यूलर सदस्य ट्रिपल तलाक़ को गैरज़मानती अपराध की श्रेणी में रखने के पक्ष में नहीं थे। वैसे ट्रिपल तलाक का विरोध बड़ी तादाद में मुस्लिम महिलाएं ही कर रही थीं। उन महिलाओं में पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी की पत्नी सलमा अंसारी भी शामिल रहीं। तीन तलाक़ की प्रथा को अमानवीय और बकवास क़रार देते हुए सलमा अंसारी कट्टरपंथी पुरुषों को क़ुरआन पढ़ने की सलाह दे चुकी हैं। 

तीन तलाक पर मोदी सरकार को मुस्लिम महिलाओं का भी समर्थन मिला। - फोटो : फाइल

तीन तलाक को लेकर क्या कहता रहा मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड?  
सलमा अंसारी के विपरीत ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड कहता आया है कि तीन तलाक़ का मुद्दा भी पवित्र क़ुरआन और हदीस की बुनियाद पर है। इसमें किसी भी तरह का बदलाव मुमकिन नहीं और मुसलमान किसी भी बदलाव को क़बूल नहीं कर सकता। मज़ेदार बात है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड एक साथ तीन तलाक़ को सामाजिक बुराई तो मानता है, परंतु वह इस प्राचीन परंपरा पर सामाजिक स्तर पर ही पाबंदी लगाने के पक्ष में था।

बोर्ड पहले ही तलाक़ के मामले में कोड ऑफ़ कंडक्ट जारी करके एक साथ तीन तलाक़ देने वाले का सामाजिक बहिष्कार करने का ऐलान कर चुका था। बोर्ड ने कहा कि अब निकाह के क़ुबूलनामे के वक़्त ही शौहर को यह भी क़ुबूल करना होगा कि वह एक साथ तीन तलाक़ नहीं बोलेगा। एक साथ तीन तलाक के बेज़ा इस्तेमाल को रोकने के लिए मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड मॉडल निकाहनामा में यह प्रावधान कर रहा है। 

बता दें कि 22 अगस्त 2017 में सुप्रीम कोर्ट की 5 विद्वान न्यायाधीशों, जिसमें हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई समुदाय के जज थे की संवैधानिक पीठ ने सायरा बानो समेत कई मुस्लिम महिलाओं की याचिका पर सुनवाई करते हुए मुस्लिम महिलाओं को तलाक़-तलाक़-तलाक़ की सदियों पुरानी परंपरा से निजात दिला दी थी।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का प्रभाव 
सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का सबसे ज़्यादा स्वागत ज़ाहिर तौर पर ट्रिपल तलाक़ और हलाला की विभीषिका से दो चार होने वाली देश की मुस्लिम महिलाओं ने किया था। इन महिलाओं ने खुले दिल से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ़ करते हुए उनका शुक्रिया अदा किया था।

कहा तो यह भी गया कि तीन तलाक़ के मुद्दे के चलते ही पिछले उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव में मुस्लिम महिलाओं ने अपने शौहरों के निर्देश को अंगूठा दिखाया और उनकी मर्जी के विरुद्ध भारतीय जनता पार्टी को वोट दिया था और भाजपा सवा तीन सौ सीट जीतने में कामयाब रही थी।

बहरहाल, तीन तलाक़ के मुद्दे पर केंद्र सरकार को धन्यवाद देने वाली महिलाओं में अभिनेत्री सलमा आगा भी शामिल रहीं, जिन्होंने ट्रिपल तलाक़ के अमानवीय पहलू को समाज के सामने लाने वाली पहली फिल्म 'निकाह' में यादगार अभिनय किया था।

उस फिल्म के प्रदर्शन के बाद भारतीय समाज ने शिद्दत से महसूस किया कि वाक़ई मुस्लिम महिलाओं के लिए ट्रिपल तलाक़ किसी भयावह सपने से कम नहीं है। चूंकि देश में आज़ादी के बाद कांग्रेस की सरकार रही और वह सरकार ट्रिपल तलाक़ की पैरवी करने वालों के निर्देश पर काम करती थी, इसलिए इन कुप्रथाओं को दूर नहीं किया जा सका।

तीन तलाक को लेकर भाजपा सत्ता में आने से पहले ही मुखर रही है। - फोटो : PTI

ट्रिपल तलाक, भाजपा सरकार और एक इतिहास 
ट्रिपल तलाक़ को असंवैधानिक क़रार देने के सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद से भाजपा सरकार सक्रिय हो गई थी। पार्टी ने पिछले लोकसभा चुनाव में भी इस मुद्दे को उठाया था और वोट मांगा था।

बहरहाल, ट्रिपल तलाक़ का मुद्दा पिछले कई साल से चर्चा में रहा। इस मसले ने सन् 1980 के दशक में देश विदेश में चर्चा का विषय बनने वाले बहुचर्चित शाहबानो प्रकरण की याद ताज़ा कर दी थी। उस समय भी देश की सबसे बड़ी अदालत ने तलाक़शुदा शाहबानो के पक्ष में फ़ैसला दिया था। लेकिन कांग्रेस की तुष्टीकरण की नीति ने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को बुरी तरह डरा दिया और सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को इस्लाम में दख़ल मानकर केंद्र सरकार ने नया क़ानून बनाया और सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को लागू होने से ही रोक दिया था।

इस तरह कांग्रेस के इस बेहद अमानवीय क़दम से ट्रिपल तलाक़ की गंभीर शिकार शाहबानो इंसाफ़ पाने से वंचित रह गई। यह कहने में गुरेज़ नहीं कि सन् 1986 में शाहबानो के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट के दिए गए फ़ैसले को बदलने के लिए क़ानून बनाकर राजीव गांधी की सरकार ने जो ब्लंडर किया था उसे इस बार राष्ट्रीय जनतांत्रिक सरकार संशोधित करने की कोशिश कर रही है। यानी जब सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से इस बारे में राय मांगी तो केंद्र ने साफ़ कहा कि ट्रिपल तलाक़ का धर्म से कोई संबंध नहीं, लिहाज़ा सरकार इसे ख़त्म करने के पक्ष में है। अपनी उसी लाइन ऑफ़ ऐक्शन के तहत केंद्र सरकार ने इस बिल को लोकसभा में पारित करवाया। केंद्र सरकार के फ़ैसले का नतीजा देश की मुस्लिम महिलाओं को ट्रिपल तलाक़ से मुक्ति के रूप में सामने आया है। 

क्या था शाहबानो केस? 
दरअसल, 62 वर्षीय मुस्लिम महिला शाहबानो 5 बच्चों की मां थीं। उनके शौहर ने सन् 1978 में ही तलाक़-तलाक़-तलाक़ कहते हुए उनसे पत्नी का दर्जा छीन लिया था। मुस्लिम पारिवारिक क़ानून के अनुसार शौहर बीवी की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ ऐसा कर सकता है। अपनी और बच्चों की जीविका का कोई साधन न होने के कारण शाहबानो पति से गुज़ारा लेने के लिए अदालत पहुंचीं। उस लाचार महिला को सुप्रीम कोर्ट पहुंचने में ही 7 साल गुज़र गए।

सुप्रीम कोर्ट ने सीआरपीसी की धारा 125 के तहत फ़ैसला दिया जो हर किसी पर लागू होता है, चाहे वह व्यक्ति किसी भी धर्म, जाति या संप्रदाय का हो। सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि शाहबानो को निर्वाह-व्यय के समान जीविका दी जाए लेकिन तब भी रूढ़िवादी मुसलमानों को कोर्ट का फ़ैसला मजहब में हस्तक्षेप लगा।

जाहिर है असुरक्षा की भावना के चलते उन्होंने इसका विरोध किया। लिहाज़ा, तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने उनकी मांगें मान लीं और इसे धर्म-निरपेक्षता की मिसाल के रूप में पेश किया। तब सरकार के पास 415 लोकसभा सांसदों का बंपर बहुमत था, लिहाज़ा, मुस्लिम महिला (तलाक़ अधिकार सरंक्षण) क़ानून 1986 में आसानी से पास हो गया।

क्या लिखा है इस कानून में?  
मुस्लिम महिला (तलाक़ अधिकार सरंक्षण) क़ानून के अनुसार जब मुसलमान त़लाकशुदा महिला इद्दत के समय के बाद अपना गुज़ारा नहीं कर सके तो कोर्ट उन संबंधियों को उसे गुज़ारा देने का आदेश दे सकता है जो मुस्लिम क़ानून के अनुसार उसकी संपत्ति के उत्तराधिकारी हैं। परंतु, ऐसे रिश्तेदार अगर नहीं हैं अथवा गुज़ारा देने की स्थिति में नहीं हैं, तो कोर्ट प्रदेश वक्फ़ बोर्ड को गुज़ारा देने का आदेश देगा।

इस प्रकार से मुस्लिम महिला के शौहर के गुज़ारा देने का उत्तरदायित्व और जवाबदेही सीमित कर दी गई। मुस्लिम महिला (तलाक़ अधिकार सरंक्षण) क़ानून राजीव गांधी के कार्यकाल में एक बदनुमा दाग़ की तरह माना जाता है, क्योंकि कांग्रेस के उस फ़ैसले ने एक मज़लूम मुस्लिम महिला को गुज़ारा भत्ता पाने से वंचित कर दिया और भविष्य में तलाक़ की विभीषिका झेलने वाली हर मुस्लिम महिला को और ज़्यादा लाचार कर दिया।

दरअसल, उस समय कट्टरपंथी मुसलमानों को छोड़कर हर किसी ने राजीव गांधी की तुष्टिकरण वाली नीति की आलोचना की थी। तत्कालीन सांसद मोहम्मद आरिफ खान ने इसके विरोध में इस्तीफा दे दिया था। वह क़ानून आज भी कांग्रेस के उस असली चरित्र को सामने लाता है, जिसके कारण सवा सौ साल से ज़्यादा पुरानी यह पार्टी विलेन बन गई और आज अपना अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष कर रही है। उस फ़ैसले को कांग्रेस का राजनैतिक लाभ के लिए अल्पसंख्यक वोट बैंक के तुष्टीकरण का सटीक उदाहरण माना जाता है।

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तीन तलाक कानून के मसौदे पर कांग्रेस सहित कई पार्टियां विरोध करती रही हैं। - फोटो : फाइल फोटो

क्या भाजपा की कोशिश सफल होगी? 
बहरहाल, इस बार केंद्र में भाजपा की अगुवाई वाली सरकार सही मायने में मुस्लिम महिलाओं को इंसाफ़ दिलाने की ओर अग्रसर दिखी, इसीलिए पिछले दस साल से शौहर के अमानवीय फ़ैसले की शिकार हुई सायरा बानो के पक्ष में केंद्र सरकार एक दीवार की तरह खड़ी हो गई।

ट्रिपल तलाक़ की गैरइस्लामिक परंपरा ने मुस्लिम पुरुषों को निरंकुश और बेलगाम बना दिया था। यहां तक, 'ट्रैजिडी क्वीन' मीना कुमारी (महज़बीन बानो) के साथ इस्लामिक रीति रिवाज़ से निकाह करने वाले फिल्मकार कमाल अमरोही ने मतभेद होने पर ग़ुस्से में तीन बार तलाक़ कहकर शादी तोड़ दी थी।

मीना कुमारी इससे सीरियस डिप्रेशन में चली गईं, जो अंततः उनकी मौत की वजह बनी। ऐसी ही मज़लूम सायरा बानो को केंद्र सरकार का सहारा मिला। केंद्र सरकार के विधि मंत्रालय ने इस मुद्दे को गंभीरता से लिया और अंततः मुस्लिम महिलाओं को इस परंपरा से मुक्ति दिलाने की पहल की।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।             
 

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