टीएमसी: बागी गुट का यह 'दल शोधन' कहीं उल्टा न पड़ जाए
- फोटो : फेसबुक/काकोली घोष
त्रिपुरा में रजिस्टर्ड एक गुमनाम सी पार्टी नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी आॅफ इंडिया’ पर दांव खेला गया। यह पार्टी त्रिपुरा के कुंडू दंपति और शांतनु डे ने 20 जनवरी 2023 को मजे-मजे में रजिस्टर्ड कराई थी। इसका मुख्यालय हावड़ा में है। लेकिन उसे चुनाव आयोग से मान्यता नहीं मिली है। एनसीपीआई ने उसी साल त्रिपुरा विस चुनाव में दो सीटों पर चुनाव लड़ा। सात किरणों वाली पेन की निब इस पार्टी का चुनाव चिन्ह है। चुनाव में उसे कुल जमा 822 वोट और 1.13 लाख रू. का चुनावी चंदा मिला। पति उत्तीय कुंडू और पत्नी शिवली कुंडू खुद को समाज सेवी बताते हैं। शिवली पहले कोषाध्यक्ष थीं, अब वो उससे अलग हो गई हैं। अब सवाल यह कि टीएमसी से अलग हुए 20 सांसदों के गुट को संसद में अलग मान्यता दिलाने की जगह एक अज्ञातकुलशील पार्टी में विलय का विचार कैसे और कहां से आया? ये सौदेबाजी किसने की? उत्तीय कुंडू का भाजपा से क्या सम्बन्ध है? यह चमत्कारिक विलय इतने गोपनीय ढंग से कैसे हो गया? और क्या ऐसा विलय जायज है? इस पार्टी का अध्यक्ष पद भी बागी सांसदों में से एक ज्योतिप्रकाश चटर्जी के पास कैसे चला गया और पार्टी के पूर्व उपाध्यक्ष उत्तीय कुंड़ू ने खुशी खुशी अपनी पार्टी को हाई जैक कैसे हो जाने दिया? इसके पीछे कौन सा लेन-देन अथवा अंडरस्टैंडिंग बनी? सवाल कई हैं।
फिलहाल तो भाजपाई अपने इस नवाचारी दांव पर मुग्ध हैं। लेकिन जानकार इसकी वैधानिकता और स्थायित्व पर सवाल उठा रहे हैं। पहला और अहम सवाल तो यही है कि यही है कि क्या टीएमसी के चुनाव चिह्न और टिकट पर लोकसभा पहुंचे ये सांसद ख़ुद को किसी और पार्टी के साथ जोड़ सकते हैं या नहीं? क्या संसद सदस्यों (या विधायकों) का कोई समूह ख़ुद को अलग करके दूसरे राजनीतिक दल के साथ विलय कर सकता है या नहीं? या इसके लिए जिस राजनीतिक दल से वो निर्वाचित हुए हैं उसका सहमत होना आवश्यक है?
संविधान विशेषज्ञ और लोकसभा के पूर्व महासचिव पीडीटी आचार्य के मुताबिक इस मामले में क़ानून स्पष्ट है कि किसी राजनीतिक दल का तो विलय हो सकता है लेकिन निर्वाचित सदस्यों के समूह का नहीं, भले ही उनकी संख्या दो-तिहाई से अधिक हो। बागी सांसद चूंकि सांसद तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर चुने गए हैं, इसलिए उन पर दल-बदल विरोधी कानून लागू होगा। वे अपनी मर्जी से किसी भी दूसरी पार्टी में शामिल नहीं हो सकते, अगर वे ऐसा करते हैं, तो उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा। लेकिन यदि चुनाव आयोग इन बाग़ी सांसदों के दल को ही मूल तृणमूल कांग्रेस घोषित कर देता है तब यह क़ानून लागू नहीं होगा। आचार्य के मुताबिक मौजूदा क़ानून के तहत बाग़ी निर्वाचित सदस्यों की संख्या का कोई अर्थ नहीं है। कानून कहता है कि पहले मूल पार्टी का किसी दूसरी पार्टी में विलय होगा, फिर उसके सदस्य नए दल में शामिल सकते हैं। यानी बागी सांसद भले ही ख़ुद के एनसीपीआई में विलीन होने की घोषणा कर रहे हों लेकिन क़ानूनन वे टीएमसी के सदस्य ही हैं।
इसका सीधा अर्थ यह है कि ‘दल शोधन’ का यह रास्ता भारी जोखिमों से भरा है। राजनीतिक विश्लेषकों का तो कहना है कि यदि इस कथित विलय को मंज़ूरी मिल जाती है तो इसके गंभीर राजनीतिक मायने होंगे। यानी बड़ा झटका क्षेत्रीय पार्टियों को लगेगा। यह दल शोधन उनके राजनीतिक विनाश की घंटी है। जहां तक उत्तीय कुंडू और भाजपा के रिश्तों की बात है तो बंगाल में भाजपा की बंपर जीत के बाद उत्तीय कुंडू ने 13 मई को अपने फेसबुक पेज पर पश्चिम बंगाल के नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी के साथ एक तस्वीर साझा की थी। इसका बंगाली में कैप्शन था ‘सिर्फ सपने देखने के दिन खत्म हो गए हैं, अब उन्हें सच करने का समय है।
इसी तरह टीएमसी के बागी सांसदों के विलय से पहले उत्तीय ने फेसबुक पर एक पोस्ट साझा की। इसमें ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी की तस्वीरें थीं। पोस्ट में लिखा था, अहंकार पतन का कारण बनता है। सत्ता के नशे में लोग अक्सर भूल जाते हैं कि सत्ता स्थायी नहीं होती और जनता का समर्थन ही असली ताकत है…जो आज शिखर पर हैं, उन्हें कल समय को जवाब देना होगा।”जाहिर है टीएमसी बागी गुट के विलय की पटकथा लिखने में उत्तीय और शुभेंदु की बड़ी भूमिका लगती है। दूसरी तरफ टीएमसी बागी गुटों में भी सांसद और विधायक अलग अलग राह चल रहे हैं। जबकि पार्टी पर ममता बैनर्जी की पकड़ अभी बहुत कमजोर नहीं हुई है। बहरहाल इस ‘दल शोधन’ का अंजाम क्या होगा, ये देखना दिलचस्प है। कहीं ‘धन शोधन’ की तरह यह भी भारी न पड़ जाए।
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