पश्चिम बंगाल में पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी अ.भा.तृणमूल कांग्रेस को राज्य में विधानसभा चुनाव हारे महज महीना ही हुआ है, लेकिन इन तीस दिनों में पार्टी जिस तरह तिनका-तिनका बिखर रही है, वह अपने आप में हैरतनाक और राजनीतिशास्त्र के विद्यार्थी के लिए शोध का विषय है।
ममता बनर्जी जितनी जुझारू हैं, उससे भी ज्यादा झगड़ालू नेता हैं। हर वक्त पंगा और टकराव तालियां तो बजवा सकता है, लेकिन जनता के मन में एक गंभीर और विश्वसनीय नेता की छवि निर्मित नहीं कर सकता। अगर तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की ही बात की जाए तो उसकी विचारधारा में अल्पसंख्यकों की ओर झुकी हुई धर्मनिरपेक्षता, बंगाली भाषा और अस्मिता का आग्रह तथा रेवड़ी और कल्याणकारी सरकार के साथ देश के सर्वांगीण विकास का आग्रह है, लेकिन बुनियादी तौर पर वह सत्ता प्राप्त करने और उसे बनाए रखने के गणित से ही संचालित होता है।
ममता राज से मोहभंग और नए विकल्प की तलाश
ममता उद्योगों के लिए लोगों की जमीनों के हस्तांतरण और तत्कालीन कम्युनिस्ट सरकार का तगड़ा विरोध कर 2011 में सत्ता में आईं। लेकिन बंगाल में सत्ता में जमे रहने के राजनीतिक अनुष्ठान के अलावा और कुछ नहीं हुआ। परिणामस्वरूप लोगों को ममता राज से मोहभंग होने लगा और उन्हें एक सशक्त विकल्प की तलाश थी, जो 2026 के चुनाव में भाजपा के रूप में मिला और मतदाता से उसे ही जिता दिया।
अब भले ही ममता इसका ठीकरा एसआईआर और भाजपा की साम्प्रदायिकता पर फोड़ती रहें, लेकिन सच सामने आ रहा है। ममता सरकार कुशासन के प्रति लोगों का गुस्सा उन्हें सत्ता से बेदखल करने के बाद भी थमता नहीं दिख रहा। लेकिन पार्टी में भी बगावत का सिलसिला अगर नहीं थम रहा तो इसका बड़ा कारण ममता बनर्जी का तानाशाहीपूर्ण रवैया और परिवारप्रेम है।
यही वो फांस है, जिसकी लगभग सभी क्षेत्रीय और जातिवादी पार्टियां शिकार हैं, यह जानते हुए भी कि यह प्रवृत्ति अतंत: उनके पतन का कारण बनती है। यह बात अलग है कि ऐसे नेता दीवार पर लिखी इस इबारत को नहीं पढ़ना चाहते। ममता की पार्टी में टूटन का अभिषेक भतीजे अभिषेक बनर्जी को 2021 से अपने राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में आगे बढ़ाने की कोशिशों से हो गया था। आम कार्यकर्ता में यही संदेश गया कि उसका कोई राजनीतिक भविष्य नहीं है।
अभिषेक ने भी पार्टी को तानाशाह की तरह से चलाना शुरू किया। जबकि ममता ने पार्टी में बढ़ रही आंतरिक नाराजी और कुलबुलाहट को लगातार अनदेखा किया। उसका नतीजा इस विधानसभा चुनाव में आ गया। यदि वो बीमारी का सही वक्त पर इलाज कर लेतीं तो शायद पश्चिम बंगाल के चुनावी नतीजे अलग भी हो सकते थे।
सबसे आश्चर्य की बात उन मुस्लिम विधायकों का भी ममता का साथ छो़ड़ जाना है, जिनके लिए ममता ने तुष्टिकरण का इल्जाम अपने सिर पर लिया और ये वोट बैंक अभी भी ममता बनर्जी के साथ है। टीएमसी के टिकट पर जीते 17 मुस्लिम विधायक अब बागी गुट के साथ हैं।
जिन 58 बागियों की अगुवाई कर ऋतुब्रत बनर्जी पश्चिम बंगाल विस में नेता प्रतिपक्ष बन गए हैं, वो खुद पुराने कम्युनिस्ट हैं और सीपीएम से राज्यसभा सांसद भी रह चुके हैं। हालांकि ऋतु्ब्रत पर लगे चारित्रिक आरोपों के बाद पार्टी ने उन्हें निकाल दिया था। उसके बाद ऋतुब्रत टीएमसी में आ गए और ममता दीदी के चहेते बन गए। लेकिन हम उम्र अभिषेक को ज्यादा तवज्जो मिलने के बाद उन्होंने बगावत का रास्ता चुन लिया।
यह कहना गलत नहीं होगा कि जिस तरह 2011 के विस चुनाव में ममता बनर्जी ने कांग्रेस के साथ गठबंधन बनाकर राज्य में बरसों से जमे कम्युनिस्टों को हमेशा के लिए सत्ता से बेदखल कर दिया, उसी कम्युनिस्ट पार्टी के एक पूर्व कार्यकर्ता ने टीएमसी विधायक दल को तोड़कर उस पुरानी पराजय का अपने ढंग से बदला ले लिया है।
क्या टीएमसी फिर हो पाएगी मजबूत?
अब सवाल ये कि क्या ममता अपने पार्टी की इमारत को फिर पहले की तरह मजबूत शक्ल में खड़ी कर पाएंगी, खासकर तब कि जब टूटन निचले स्तर तक पहुंच गई हो? इसका जवाब न में ज्यादा है, क्योंकि एक तो ममता की बढ़ती उम्र और दूसरे, भतीजामोह से उनका न उबर पाना। वैसे भी आने वाले पांच बरसों में भाजपा राज्य में हर स्तर पर पांव जमाने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी।
तीसरे, बांगलादेश में युनूस सरकार के समय जिस तरह अल्पसंख्यक हिंदुओं पर खुलेआम अत्याचार हुए, उस पर ममता के मौन से बंगाली हिंदू भी आक्रोशित हुए और बंगाली अस्मिता पर शायद पहली बार हिंदुत्ववादी सोच इस तरह हावी हुआ। इसे बदलना अब आसान नहीं है। ऐसे में अब टीएमसी के साथ वो ही लोग रहेंगे, जो ममता के भक्त हैं। यानी टीमएसी रहेगी तो लेकिन विपक्ष की सीमित भूमिका में। बाकी सत्ता के साथ जाएंगे।
टीएमसी के पतन का राज्य में कांग्रेस को कितना लाभ मिलेगा या कम्युनिस्टों को फिर संजीवनी मिलेगी, इस बारे में कोई भी कथन जल्दबाजी होगा। इतना तय है कि कांग्रेस अब ममता को ज्यादा भाव नहीं देगी। आगामी चुनावों में सीटों के बंटवारे में भी वह ज्यादा दबंगई से सौदेबाजी कर सकती है। राष्ट्रीय स्तर पर उनके विपक्ष का नेतृत्व करने की संभावना पर भी पानी फिर गया है। यानी विपक्ष की कमान राहुल गांधी के हाथों में ही रहेगी।
राज्य में वामपंथियों की स्थिति पहले से बेहतर हो सकती है। लेकिन पहले सी व्यापक स्वीकृति अब मुश्किल है।
यहां सबसे दिलचस्प बात भाजपा का ‘पश्चिम बंगाल माॅडल’ है। इस राज्य में विस चुनाव के पहले इसी स्तम्भ में मैंने लिखा था कि चुनाव नतीजे जो भी हों, भाजपा का बंगाल माॅडल एकदम नया होगा। वही हो भी रहा है। कुछ लोग इसे सत्ता प्राप्ति के ‘महाराष्ट्र माॅडल’ से जोड़ कर देख रहे थे, लेकिन वह सही नहीं है। महाराष्ट्र में भाजपा ने दूसरी क्षेत्रीय पार्टियों को राज्य में सत्ता में पाने के लिए तोड़ा था, लेकिन बंगाल में चूंकि उसके पास पहले ही प्रचंड बहुमत है, इसलिए टीएमसी को तोड़ने के पीछे असली मकसद संसद में ताकत बढ़ाना है न कि राज्य में। ये कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना वाला अंदाज है।
माना जा रहा है कि विधायकों के टूटने के बाद जल्द ही टीएमसी के 29 लोकसभा सांसद भी दो फाड़ हो सकते हैं। अगर 20 सांसद भी अलग हुए तो वो पृथक गुट बनाकर भाजपा में विलय कर सकते हैं। ऐसा हुआ तो लोकसभा में भाजपा के सांसदों की संख्या 240 से बढ़कर 260 तक जा पहुंचेगी। बाकी 12 का इंतजाम भी किसी और तिकड़म से किया जा सकता है। और पार्टी अपने दम पर ही बहुमत में आ सकती है, जिसे अभी अपने एनडीए सहयोगियों के भरोसे सरकार चलानी पड़ रही है।
इस सारे खटकरम पर नैतिक सवाल जरूर उठेंगे, लेकिन चूंकि भाजपा वैचारिक आवरण में व्यावहारिक राजनीतिक करती है। इसलिए वो साधन से ज्यादा साध्य को महत्व देती है। पश्चिम बंगाल से अब भाजपा को उखाड़ने के लिए किसी नए ‘राजनीतिक अवतार’ की जरूरत होगी, वो कब, कैसे जन्म लेगा, यह भविष्य की बात है।
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