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मुड़-मुड़ के न देख: नए अर्थ तलाशने का समय

सार

वृद्धावस्था की कठिनाइयां इस पर निर्भर करती हैं कि व्यक्ति ने जीवन कैसे जिया है और वह उम्र के इस पड़ाव को किस दृष्टि से देखता है। वृद्धावस्था जीवन से अलग होने का नहीं, बल्कि उसके अनुभवों को समझने व नए अर्थ तलाशने का समय है।
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जब तक कोई इन्सान खुद में और अपने काम में खुशी ढूंढ पाता है, वह कभी वृद्ध नहीं हो सकता। -अमोस ब्रॉ - फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार
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मनुष्य की उम्र बढ़ने के साथ उसके शरीर में स्वाभाविक ही कुछ बदलाव आते हैं। उसकी गति धीमी पड़ सकती है और काम करने की क्षमता पहले जैसी नहीं रह जाती। लेकिन, क्या इन बदलावों के साथ उसके जीवन का महत्व भी कम हो जाता है? वृद्धावस्था अपने आप में दुख का कारण नहीं है। इस अवस्था की कठिनाइयां काफी हद तक इस बात पर निर्भर करती हैं कि व्यक्ति ने जीवन कैसे जिया है और वह उम्र के इस पड़ाव को किस दृष्टि से देखता है।
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वृद्धावस्था जीवन से अलग हो जाने का नाम नहीं, बल्कि उसके अनुभवों को समझने व उनके अर्थ तलाशने का समय है। उम्र के साथ घटती शारीरिक शक्ति की भरपाई अनुभव और विवेक से हो सकती है। युवा व्यक्ति में ऊर्जा और तेजी हो सकती है, लेकिन हर परिस्थिति का सही आकलन करने के लिए केवल ऊर्जा पर्याप्त नहीं होती। इसके लिए धैर्य, दूरदृष्टि और निर्णयों के परिणाम समझने की क्षमता भी चाहिए। जीवन के लंबे अनुभव से बुजुर्गों में ये गुण विकसित होते हैं। पर, अक्सर उनसे सलाह लेने के बजाय उनके अनुभवों को पुराने समय की बातें कहकर टाल दिया जाता है। इससे नई पीढ़ी भी जीवन के उन अनुभवों से वंचित रह जाती है, जिन्हें किताबों से नहीं सीखा जा सकता। परिवारों में पीढ़ियों के बीच संवाद बना रहे, तो बुजुर्ग अतीत के प्रतिनिधि भर नहीं रहते, बल्कि वर्तमान को समझने और भविष्य के फैसले लेने में सहभागी बन सकते हैं। इसलिए, मनुष्य का महत्व उसकी उम्र से नहीं, उसके व्यक्तित्व, विवेक और जीवन के अनुभवों से समझा जाना चाहिए।

जिस समाज में उम्र बढ़ने को उपयोगिता समाप्त होने के बराबर मान लिया जाता है, वह अपने अनुभव के सबसे समृद्ध स्रोतों की उपेक्षा करता है। बुजुर्गों को केवल आश्रितों के रूप में नहीं, बल्कि ज्ञान, स्मृतियों और जीवन-दृष्टि से समृद्ध व्यक्तियों के रूप में देखना चाहिए। आखिरकार, वृद्धावस्था किसी दूसरे की नहीं, हम सभी की भावी कहानी है।
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