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समुंदर के तीन दरवाजे: होर्मुज, सुएज और बाब अल मंदेब, दुनिया की सांस इन्हीं रास्तों से चलती है

सार

दुनिया का नक्शा अगर ध्यान से देखो तो तीन ऐसे समुद्री रास्ते दिखते हैं जो सिर्फ पानी की लकीर नहीं हैं बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था की लाइफलाइन हैं। होर्मुज, सुएज और बाब अल मंदेब। यहां से तेल जाता है, सामान जाता है और कई बार यहीं से जंग भी गुजरती है। इन रास्तों पर हलचल हो जाए तो असर सिर्फ इसी इलाके तक नहीं रहता बल्कि पूरी दुनिया में कीमतें हिल जाती हैं और बाजार कांपने लगते हैं।
 
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होर्मुज जलडमरूमध्य - फोटो : FreePik
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विस्तार
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सबसे पहले बात होर्मुज की। फारस की खाड़ी और अरब सागर के बीच ये पतली सी पट्टी है लेकिन इसकी अहमियत बहुत बड़ी है। दुनिया का करीब 20% तेल यहीं से गुजरता है। रोजाना लगभग 17 से 20 मिलियन बैरल तेल इस रास्ते से निकलता है। ईरान एक तरफ है और ओमान दूसरी तरफ। जब भी ईरान और अमेरिका या इस्राइल के बीच तनाव बढ़ता है तो सबसे पहले इसी रास्ते का नाम सामने आता है।

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1980 से 1988 के बीच ईरान-इराक जंग में यही इलाका “टैंकर वॉर” का मैदान बना। दोनों तरफ से तेल ले जाने वाले जहाजों पर हमले हुए। नतीजा ये हुआ कि तेल की कीमतें बढ़ीं और पूरी दुनिया परेशान हो गई। फिर 2019 में भी कई तेल टैंकरों पर हमले हुए। अमेरिका ने ईरान पर आरोप लगाए, ईरान ने इनकार किया, लेकिन हालात इतने बिगड़े कि दोनों आमने-सामने आ गए। उस समय भी दुनिया को यही डर सताने लगा था कि अगर होर्मुज बंद हुआ तो क्या होगा।

और अब जो मौजूदा हालात बने हैं, उनमें ये खतरा फिर से सामने खड़ा है। अमेरिका की तरफ से समुद्री रास्तों पर दबाव बढ़ाने की बातें, ईरान की तरफ से जवाबी चेतावनियां और इस्राइल के साथ बढ़ता तनाव। इन सबके बीच होर्मुज फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है। ईरान कई बार साफ कह चुका है कि अगर उस पर सीधा दबाव बढ़ा तो वह इस रास्ते को बंद करने का कदम भी उठा सकता है।
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साफ बात है। ये सिर्फ एक धमकी नहीं है क्योंकि अगर होर्मुज पर आवाजाही रुकती है तो सिर्फ खाड़ी देशों का नहीं, पूरी दुनिया का तेल रुक जाता है। तेल महंगा होता है, ढुलाई महंगी होती है और असर हर देश के आम आदमी तक पहुंचता है। यानी होर्मुज सिर्फ एक समुद्री रास्ता नहीं है, ये दुनिया की अर्थव्यवस्था की नब्ज है और जब भी जंग का ताप बढ़ता है, सबसे पहले यही नब्ज कांपने लगती है। अब सुएज नहर को समझो। ये मिस्र में है और यूरोप को सीधे एशिया से जोड़ती है। दुनिया का करीब 10% व्यापार इसी रास्ते से गुजरता है और हर साल लगभग 20,000 जहाज यहां से निकलते हैं।

1956 में मिस्र के राष्ट्रपति गमाल अब्देल नासिर ने सुएज नहर को अपने कंट्रोल में ले लिया। इसके बाद ब्रिटेन, फ्रांस और इस्राइल ने मिलकर मिस्र पर हमला कर दिया। इसे सुएज संकट कहा जाता है। जंग हुई, लेकिन अंतरराष्ट्रीय दबाव इतना बढ़ा और आखिरकार इन तीनों को पीछे हटना पड़ा और नहर फिर मिस्र के पास ही रही, लेकिन असली बड़ा झटका 1967 में आया, जब इस्राइल और अरब देशों के बीच छह दिन की जंग हुई। इस जंग में इस्राइल ने मिस्र का सिनाई प्रायद्वीप अपने कब्जे में ले लिया और सुएज नहर का इलाका सीधे युद्ध की रेखा बन गया। हालात इतने खराब हो गए कि नहर पूरी तरह बंद कर दी गई और ये बंदी पूरे आठ साल चली यानी 1967 से 1975 तक।

इस दौरान नहर में फंसे कई जहाज वर्षों तक वहीं खड़े रहे, जिन्हें “येलो फ्लीट” कहा गया। दुनिया का व्यापार बुरी तरह प्रभावित हुआ और जहाजों को अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप का लंबा चक्कर लगाना पड़ा, जिससे समय और खर्च दोनों बढ़ गए। फिर 1973 में एक और जंग हुई, जिसे योम किप्पुर वॉर कहा जाता है। इसके बाद धीरे-धीरे हालात बदले। 1975 में मिस्र ने सुएज नहर को फिर से खोल दिया। बाद में 1978 में कैंप डेविड समझौता हुआ और 1979 में मिस्र ने औपचारिक तौर पर इस्राइल को मान्यता दी। इसके बदले में इस्राइल ने सिनाई प्रायद्वीप मिस्र को वापस कर दिया।

1967 की अरब-इस्राइल जंग के बाद ये नहर पूरे आठ साल के लिए बंद हो गई। 1975 में जाकर फिर से खुली। सोचो, एक रास्ता बंद हुआ और पूरी दुनिया के जहाजों को अफ्रीका का लंबा चक्कर लगाना पड़ा। खर्च बढ़ा, समय बढ़ा, असर हर जगह पड़ा। 2021 में एक और घटना हुई जब ‘एवर गिवन’ नाम का एक बड़ा जहाज नहर में फंस गया। सिर्फ छह दिन के जाम ने दुनिया को दिखा दिया कि ये रास्ता कितना जरूरी है। हर दिन करीब 9 से 10 बिलियन डॉलर का व्यापार रुक गया।

अब आते हैं बाब अल मंदेब पर। ये लाल सागर और अरब सागर के बीच का संकरा रास्ता है, जो यमन और जिबूती के बीच पड़ता है। देखने में छोटा लगता है, लेकिन अहमियत बहुत बड़ी है। दुनिया का करीब 10% समुद्री तेल और लगभग 12% कारोबार इसी रास्ते से गुजरता है। हर दिन करीब 6 से 7 मिलियन बैरल तेल और बड़ी संख्या में माल से भरे जहाज यहां से निकलते हैं।

यही रास्ता सुएज नहर से जुड़ता है, इसलिए अगर बाब अल मंदेब पर असर पड़ा तो सुएज भी अपने आप प्रभावित हो जाता है। मतलब एक झटका और पूरी सप्लाई की पूरी कड़ी हिल जाती है। इतिहास में भी ये इलाका कभी पूरी तरह शांत नहीं रहा। 1973 की अरब-इस्राइल जंग के दौरान इस रास्ते को बंद करने की कोशिश की गई थी ताकि इस्राइल तक जरूरी सामान न पहुंच सके। तब भी दुनिया ने देखा कि ये रास्ता बंद करने का असर सिर्फ एक देश तक सीमित नहीं रहता बल्कि पूरी दुनिया तक जाता है।

लेकिन हाल के वर्षों में इसकी अहमियत और खतरा दोनों बढ़ गए हैं। यमन की जंग के बाद हूती लड़ाके लगातार इस रास्ते को निशाना बना रहे हैं। 2016 में अमेरिका के एक युद्धपोत पर मिसाइल दागी गई थी, जिसके जवाब में अमेरिका ने भी हमला किया।

फिर 2023 और 2024 में हालात और बिगड़ गए। हूती लड़ाकों ने कई बड़े मालवाहक जहाजों पर ड्रोन और मिसाइल से हमले किए, कुछ जहाजों को कब्जे में भी लिया। इसके बाद दुनिया की कई बड़ी जहाजरानी कंपनियों ने इस रास्ते से अपने जहाज हटाने शुरू कर दिए।

नतीजा ये हुआ कि जहाजों को अफ्रीका के दक्षिणी सिरे से लंबा चक्कर लगाकर जाना पड़ा। इससे हर यात्रा में करीब 10 से 15 दिन ज्यादा लगने लगे और ईंधन का खर्च भी काफी बढ़ गया। बताया जाता है कि इस वजह से समुद्री ढुलाई की लागत करीब 30% तक बढ़ गई और कई देशों में रोजमर्रा के सामान महंगे होने लगे। यानी यमन की जंग का असर सीधे दुनिया के बाजार तक पहुंच गया। आज हालत ये है कि बाब अल मंदेब सिर्फ एक समुंद्री रास्ता नहीं रहा, ये एक दबाव बनाने का जरिया बन गया है। जो इसे प्रभावित करता है, वो दुनिया की सप्लाई को प्रभावित कर सकता है।

इन तीनों रास्तों की कहानी एक जैसी है। जहां से दुनिया का सामान गुजरता है, वहीं सबसे ज्यादा तनाव भी होता है। क्योंकि जिसे इस पर कंट्रोल मिला, उसे भरपूर ताकत मिलती है।

होर्मुज, सुएज और बाब अल मंदेब, ये तीनों सिर्फ पानी के रास्ते नहीं हैं बल्कि दुनिया की सप्लाई लाइन हैं। यहां जरा सा भी तनाव होता है तो असर तेल की कीमतों से लेकर रोजमर्रा की चीजों तक पहुंच जाता है। इतिहास बार-बार यही बताता है कि जब ये रास्ते जंग का मैदान बने तो नुकसान सिर्फ लड़ने वालों का नहीं हुआ बल्कि पूरी दुनिया को उसकी कीमत चुकानी पड़ी।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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