हैती और कनाडाई मूल के लेखक थेलीसन ओरेलियन पर अपनेउपन्यास सिते सा ओऊ मूहीर को एआई से लिखने के आरोप लगे हैं। सोशल मीडिया पर वे ना केवल ट्रोल हुए हैं बल्कि उन पर गंभीर सवाल भी उठे हैं। हालांकि अपनी किताब के लिए 2026 का प्रसिद्ध प्रिक्स डु रोमन फनाक पुरस्कार जीतने वाले इस 38 वर्षीय युवा लेखक ने इन आरापों का खंडन किया है, उनका कहना है कि वे यह उपन्यास 2019 में ही लिख चुके थे।
सोचकर देखिए मात्र दो से ढाई साल के अंदर ही चैट बॉट्स ने कहानियों, कविताओं सहित लेखन की हर विधा के भीतर सृजन के ऐसे सूत्र पकड़ लिए हैं जिन्हें साधने के लिए किसी लेखक अपना समय और जीवन होम करना होता था। यह त्रासदी ही है कि वर्षों की साधना, असंख्य किताबों की यात्रा और आत्मा की गहरी अनुभूतियां एक प्रॉम्प्ट में आकर सिमट गई हैं।
अभी समस्या मानवीय और मौलिक कृतियों में कृत्रिम हस्तक्षेप से ज्यादा जो पहले से ही बचा हुआ है उसे बचाने की है। जाहिर है दुनिया में रचा गया क्लासिक साहित्यिक लेखन कंपनियों के मुनाफाखोर मंसूबों से बच जाए तो बड़ी बात हो।
आज चैट बॉट्स के आने के बाद लेखन की दुनिया एआई को लेकर स्वीकारोक्ति भाव की बजाय आमने-सामने की लड़ाई में है। अन्याय, उत्पीड़न और विषमताओं के लिए खड़े होने वाले लेखक समुदाय ने एआई चैट बॉट कंपनियों पर सीधे आरोप लगाया है कि इन चैट बॉट्स को कच्चा माल दे कौन रहा है? लिखे हुए को ही बुनकर, गुनकर और हेर-फेर के साथ प्रस्तुत कर देने में सबसे ज्यादा नुकसान एक लेखक का ही हो रहा है? आखिर कंपनियों को ये हक किसने दिया? यही वजह है कि वे मौलिक लेखन को बचाने के लिए आवाज उठा रहे हैं और इन कंपनियों को कानूनी की दहलीज पर खींच रहे हैं।
2023 में ही 13 हज़ार से अधिक लेखकों के प्रतिनिधित्व करने वाला अमेरिकी संगठन ऑथर्स गिल्ड कोर्ट पहुंच गया। संगठन ने न्यूयॉर्क की मैनहटन फेडरल कोर्ट में ओपनएआई के खिलाफ कॉपीराइट उल्लंघन का मुकदमा दायर किया। आरोप था कि चैटजीपीटी को ट्रेन करने के लिए लाखों कॉपीराइट किताबों का इस्तेमाल बिना अनुमति किया गया और उनसे डेरिवेटिव वर्क्स बनाए गए। यही नहीं मेटा को भी घेरा गया और उसके खिलाफ भी मुकदमा हुआ जिसमें कहा गया कि उसके एलएलएएमए मॉडल को ट्रेन करने के लिए हजारों किताबें उठाई गईं। जहां हिंदी जगत् में यह सवाल आश्चर्य और कौतुक के बीच है वहीं दुनियाभर के लेखक संगठन सबसे पहले अपने लिखे को बचाने के एकजुट हो चुके हैं। कंपनियों पर मुदकमे हैं और इनमें आगे आकर प्रकाशक भी साथ आए हैं।
इधर भारत में अभी भी गहरी चुप्पी है। भारत के साहित्यिक और लेखन संसार में परिदृश्य धुंधला दिखाई देता है। भारत में एआई चैट बॉट्स की मौजूदगी को लेखकों ने महसूस किया है लेकिन विरोध के स्वर मुखर नहीं हैं। ऐसा भी दिखाई देता है कि ऐसी तकनीक की उपस्थिति के प्रति उदासीनता ज्यादा है बजाय एक सार्थक हस्तक्षेप के, यानी टेक्नॉलॉजी से दूर ही हैं। यह दुनिया तकनीक और वैश्विक दुनिया के बदलावों से दूर चैट बॉट के प्रति ना संवेदनशील है ना उसे लेकर किसी तरह की आशंका व्यक्त करती है बल्कि तटस्थ ही दिखाई देती है।
दरअसल, हिंदी साहित्य में एआई को लेकर दो तरह की तस्वीर बनती दिखाई देती है एक जो विरोधाभासी लेकिन वास्तविक है। एक तरफ एआई साहित्य को वैश्विक बना रहा है, हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं को नई पहचान दे रहा है, दूसरी तरफ, वही एआई साहित्य की आत्मा, उसकी मौलिकता और लेखकों की मेहनत को कमजोर भी कर सकता है।
कुल मिलाकर चैट बॉट्स एक तरह से दोधारी तलवार की तरह सामने हैं जिसे भारतीय लेखक और प्रकाशक सामने खड़ा देख रहे हैं। एक तरफ नई संभावनाओं का द्वार, दूसरी तरफ अपनी रचनात्मक अस्मिता के खो जाने का डर। यहां एक नए द्वंद्व की स्थिति है जहां तकनीक अवसर भी है और चुनौती भी। मशीनें रचना तो कर सकती हैं, लेकिन संवेदना नहीं गढ़ सकतीं, इसलिए अब लेखकों के सामने दो रास्ते हैं या तो वे एआई से डरकर अपनी जगह खो दें, या उसे साधन बनाकर अपनी रचनात्मकता को और ऊंचाई दें।
सवाल यह है कि क्या हिंदी साहित्य लेखकों सहित अपनी रचनात्मकता को एआई कंपनियों को सौंप देगा? या फिर यह संसार एक बंधक के रूप में रहेगा जो अपने रचे हुए से एक मशीन को दूसरा वह सबकुछ रचने देगा जिस पर उसी का अधिकार नहीं होगा?
इधर दुनिया में एक तबका बॉट्स की इन क्षमताओं के बूते यह कह रहा है कि एआई लेखन को लोकतांत्रिक बना रहा है और हर व्यक्ति को अभिव्यक्ति की शक्ति दे रहा है लेकिन सवाल फिर उठता है कि जो चीज पुराने डेटा से सीखकर नया रच रही है वो क्या खाक मौलिक बना रही है। आखिर इस उठापटक में कॉपीराइट, मौलिकता और लेखकों की आय का क्या होगा? हालांकि मान लीजिए लेखन को भविष्य में आउटपुट ही मानना है तो फिर इससे जुड़ा मालिकाना हक और जिम्मेदारी एआई को ही सौंप दी जाए और यदि लेखक समाज़, लेखन को मनुष्य के जीवन संघर्ष की कीमती संपदा मानता है तो फिर मशीनी लेखन को अनुकरण मानकर नकार दे और अपने अनुभव से पैदा हुई लेखन की इस संपदा लिए एक लंबी लड़ाई के लिए तैयार हो जाए।
एआई बहुत कुछ हड़प गया है और अब डकार लेकर ऐसे जता रहा है जैसे कुछ हुआ ही नहीं. चिंता नए लिखे की नहीं बल्कि पुराने को बचाने की है।
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